रात का-सा था अंधेरा,
बादलों का था न डेरा,
किन्तु फिर भी चन्द्र-तारों से हुआ था हीन अम्बर!
स्वप्न था मेरा भयंकर!
क्षीण सरिता बह रही थी,
कूल से यह कह रही थी-
शीघ्र ही मैं सूखने को, भेंट ले मुझको हृदय भर!
स्वप्न था मेरा भयंकर!
धार से कुछ फासले पर
सित कफन की ओढ चादर
एक मुर्दा गा रहा था बैठकर जलती चिता पर!
स्वप्न था मेरा भयंकर!

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2 thoughts on “

  1. मुझे पुकार लो

    इसीलिए खड़ा रहा
    कि तुम मुझे पुकार लो!

    ज़मीन है न बोलती,
    न आसमान बोलता,
    जहान देखकर मुझे
    नहीं ज़बान खोलता,
    नहीं जगह कहीं जहाँ
    न अजनबी गिना गया,
    कहाँ-कहाँ न फिर चुका
    दिमाग-दिल टटोलता;
    कहाँ मनुष्‍य है कि जो
    उमीद छोड़कर जिया,
    इसीलिए अड़ा रहा
    कि तुम मुझे पुकार लो;
    इसीलिए खड़ा रहा
    कि तुम मुझे पुकार लो;

    तिमिर-समुद्र कर सकी
    न पार नेत्र की तरी,
    वि‍नष्‍ट स्‍वप्‍न से लदी,
    विषाद याद से भरी,
    न कूल भूमि का मिला,
    न कोर भेर की मिली,
    न कट सकी, न घट सकी
    विरह-घिरी विभावरी;
    कहाँ मनुष्‍य है जिसे
    कभी खाली न प्‍यार की,
    इसीलिए खड़ा रहा
    कि तुम मुझे दुलार लो!
    इसीलिए खड़ा रहा
    कि तुम मुझे पुकार लो!

    उजाड़ से लगा चुका
    उमीद मैं बाहर की,
    निदाघ से उमीद की,
    वसंत से बयार की,
    मरुस्‍थली मरीचिका
    सुधामयी मुझे लगी,
    अँगार से लगा चुका
    उमीद मैं तुषार की;
    कहाँ मनुष्‍य है जिसे
    न भूल शूल-सी गड़ी,
    इसीलिए खड़ा रहा
    कि भूल तुम सुधार लो!
    इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!
    पुकार कर दुलार लो, दुलार कर सुधार लो!

    बच्चन

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  2. नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
    नेह का आह्वान फिर-फिर!

    वह उठी आँधी कि नभ में,
    छा गया सहसा अँधेरा,
    धूलि धूसर बादलों नें
    भूमि को इस भाँति घेरा,
    रात-सा दिन हो गया, फिर
    रात आई और काली,
    लग रहा था अब न होगा
    इस निशा का फिर सवेरा,
    रात के उत्‍पात-भय से
    भीत जन-जन, भीत कण-कण
    किंतु प्राची से उषा की
    मोहनी मुसकान फिर-फिर,
    नेह का आह्वान फिर-फिर,

    वह चले झोंके कि काँपे
    भीम कायावान भूधर,
    जड़ समेत उखड़-पुखड़कर
    गिर पड़े, टूटे विटप वर,
    हाय, तिनकों से विनिर्मित
    घोंसलों पर क्‍या न बीती,
    डगमगाए जबकि कंकड़,
    ईंट, पत्‍थर के महल-घर;
    बोल आशा के विहंगम,
    किस जगह पर तू छिपा था,
    जो गगन पर चढ़ उठाता
    गर्व से निज तान फिर-फिर!
    नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
    नेह का आह्वान फिर-फिर!

    क्रुद्ध नभ के वज्र दंतों
    में उषा है मुसकराती,
    घोर गर्जनमय गगन के
    कंठ में खग पंक्ति गाती;
    एक चिडिया चोंच में तिनका
    लिए जो गा रही है,
    वह सहज में ही पवन
    उंचास को नीचा दिखाती!
    नाश के दुख से कभी
    दबता नहीं निर्माण का सुख
    प्रलय की निस्‍तब्‍धता से
    सृष्टि का नव गान फिर-फिर!
    नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
    नेह का आह्वान फिर-फिर!

    बच्चन

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