Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.1.1 – Deliberation on Brahman

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा

जिस वेदान्त मीमांसा शास्त्र कि हम व्याख्या करना चाहते हैं, उसका यह आदि सूत्र है। यहाँ अथ शब्द क्रम के अर्थ मे समझा जाना चाहिए न कि आरंभ के अर्थ में, क्योंकि ब्रह्म जिज्ञासा कोई वस्तु नहीं जिसका आरंभ किया जा सके। और ‘मंगल’अर्थ का तो वाक्य के अर्थ मे समन्वय ही नहीं होता। इसलिए अन्य अर्थ में प्रयुक्त हुआ अथ शब्द श्रवण द्वारा मंगल का प्रयोजक होता है।

जब यह निश्चय हो गया कि अथ शब्द क्रम के अर्थ में प्रयुक्ता हुआ है तो यह भी कहना चाहिए कि ब्रह्म जिज्ञासा का पूर्वप्रकृत क्या है अर्थात् वह क्या है जिसके होने पर ही ब्रह्म जिज्ञासा संभव है। जैसे धर्म जिज्ञासा पूर्व प्रकृत के रूप में वेदाध्ययन कि अपेक्षा रखती है, उसी प्रकार ब्रह्मजिज्ञासा भी नियम से पूर्व मे रहने वाली जिस वस्तु की अपेक्षा रखती है, उसे कहना चाहिए। यहाँ स्वाध्याय को पूर्वप्रकृत नहीं कह सकते क्योंकि वह तो ब्रह्मजिज्ञासा और धर्मजिज्ञासा दोनों मे ही समान है।

पू- कर्मकांड के ज्ञान को ब्रह्मजिज्ञासा का पूर्वप्रकृत माना जा सकता है।

सि- नहीं। जिसने वेदान्त का अध्ययन किया है, उसमे धर्मजिज्ञासा के पहले भी ब्रह्मजिज्ञासा उत्पन्न हो सकती है। और यहाँ उस प्रकार के किसी क्रम की अपेक्षा नहीं है जैसा हृदय आदि के अवदान (बली देते समय अंगों को आहुति मे डालने का क्रम) में, क्योंकि वहाँ क्रम का आदेश है। ऐसा इसलिए क्योंकि धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा में शेषशेषीभाव (पूर्ण और उसके भाग का भाव) या अधिकृताधिकार (एक मे सिद्धि से दूसरे मे सिद्धि) को मानने का कोई प्रमाण नहीं है।

ब्रह्मजिज्ञासा और धर्मजिज्ञासा के फल और जिज्ञास्य (विषय) में भेद है। धर्मज्ञान का फल तो अभ्युदय (भौतिक समृद्धि) है और वह अनुष्ठान की अपेक्षा रखता है। परंतु ब्रह्मविज्ञान का फल तो नि:श्रेयस (मोक्ष) है तथा उसे अन्य अनुष्ठान की अपेक्षा भी नहीं है। धर्मजिज्ञास्य जो है, वह वह ज्ञान काल मे नहीं होता, वह उत्पन्न होने वाला है तथा पुरुष के प्रयत्न पर निर्भर है। लेकिन ब्रह्मजिज्ञास्य जो है, वह तो नित्य है तथा पुरुष के प्रयत्न के अधीन नहीं है (क्योंकि वह पहले से ही उपस्थित सत्य है)।

वेदवाक्यों की प्रवृत्ति के भेद के कारण भी। जो वेदवाक्य धर्म में प्रमाण हैं, वे पुरुष को धर्म में प्रवृत्त कराते हुये ही बोध कराते हैं। वेदवाक्य तो पुरुष को बोध ही कराते हैं। बोध वेदवाक्य से ही हो जाने पर, वे पुरुष को बोध में प्रवृत्त नहीं करते। जैसे इंद्रिय और विषय के स्पर्श से ही पदार्थ ज्ञान हो जाता है, उसी प्रकार। इसलिए, जिसके बाद ब्रह्मजिज्ञासा का उपदेश किया जाता है, ऐसा कोई असाधारण कारण कहना चाहिए।

इस संदर्भ मे कहते हैं- नित्या-अनित्य वस्तु विवेक, इस लोक और परलोक में विषय-भोग के प्रति विराग, शम, दम आदि साधन संपत्ति तथा मुमुक्षुत्व। यदि यह हो तो धर्मजिज्ञासा के पहले या बाद में भी ब्रह्मजिज्ञासा हो सकती है और ब्रह्मज्ञान भी हो सकता है। इन चार साधनो के बिना दोनों ही नहीं हो सकते। इसलिए अथ शब्द पूर्वोक्त साधन संपत्ति से क्रम का उपदेश करता है।

अत: शब्द हेतुवाचक है। ‘जैसे खेती से उपार्जित भोग्य पदार्थ क्षी हो जाते हैं, उसी प्रकार परलोक मे पुण्य से प्राप्त किए हुये लोकों का क्षय हो जाता है’ (छान्दोग्य 8.1.6) इत्यादि श्रुति वाक्यों कल्याण के साधक अग्निहोत्र आदि के फल स्वर्ग आदि की अनित्यता दिखलाते हैं। इसी प्रकार, ‘ब्रह्मविद् परम् को प्राप्त करता है’ (तै 2.1) इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्मविज्ञान से ही परम पुरुषार्थ की प्राप्ति दिखलाती हैं। इसलिए उपरोक्त साधन संपत्ति की प्राप्ति के अनंतर ही ब्रह्म जिज्ञासा करनी चाहिए।

ब्रह्म की जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा है। आगे ‘जन्माद्यस्य यत:’ इस सूत्र में जिसका लक्षण कहा जाएगा वह ब्रह्म ही है। इस करण से यह संशय नही करना चाहिये कि ब्रह्म शब्द का ब्राह्मण जाति आदि कोई दूसरा अर्थ है।

‘ब्रह्मण:’ यह कर्मवाचक षष्ठी है शेषवाचक (संबंध) नहीं। क्योंकि जियासा को जिज्ञास्य की अपेक्षा रहती है और ब्रह्म के सिवा किसी अन्य जिज्ञास्य का निर्देश भी नहीं है।

पू- शेषवाचक षष्ठी लेने पर भी कोई विरोध नहीं, क्योंकि सामन्य संबंध तो विशेष संबंध (जैसे कि कर्मवाचक) को दिखलाता ही है।

सि- तो इस प्रकार भी ब्रह्म के प्रत्यक्ष कर्मत्व को छोडकर सामान्य संबंध द्वारा परोक्ष कर्मत्व की कल्पना करने का प्रयास व्यर्थ होगा।

पू- नहीं, यह प्रयास व्यर्थ नहीं है क्योंकि ब्रह्म के आश्रित सभी सभी पदार्थों के विचार कि प्रतिज्ञ करना प्रयोजन है।

सि- नहीं। क्योंकि प्रधान की प्राप्ति होने पर, उसकी अपेक्षा रखने वाले सभी पदार्थों कि स्वीकृति हो जाती है। ब्रह्म, ज्ञान से प्राप्त होने के लिए इष्टतम (कर्म) है, अत: वह प्रधान है। जिज्ञासा के कर्म उस प्रधान का ग्रहण होते ही जिनकी जिज्ञासा हुये बिना ब्रह्म कि जिज्ञासा नहीं होती, उन सबकी स्वीकृति हो जातीहै, इसलिए सूत्र मे उन्हे अलग से कहने की आवश्यकता नहीं है। जैसे ‘यह राजा जाता है’ ऐसा कहने से ही परिवारसहित राजा के गमन का कथन हो जाता है, इसके अनुसार। इसी प्रकार श्रुति के साथ सूत्र का संबंध करने से भी कर्मवाचक षष्ठी है।

‘यतो व इमानि भूतानि जायन्ते’ (तै 3.1) इत्यादि श्रुतियाँ ‘तद्विजिज्ञासस्व, तद् ब्रह्म’ (उसकी जिज्ञासा कर, वह ब्रह्म है) इस प्रकार ब्रह्म ही जिज्ञासा का कर्म है, ऐसा प्रत्यक्ष दिखलाती हैं और कर्मवाचक षष्ठी मानने से ही सूत्र के साथ श्रुति कि एकवाक्यता होती है। इसलिए ‘ब्रह्मण:’ यह कर्मवाचक षष्ठी है।

जानने की इच्छा जिज्ञासा है। अनुभव तक का ज्ञान सन् वाच्य इच्छा का कर्म है, क्योंकि इच्छा का विषय फल है। ब्रह्म का अनुभव ज्ञान प्रमाण से इष्ट है। ब्रह्म का अनुभव ही पुरुषार्थ है। क्योंकि उससे नि:शेष संसार कि बीजरूप अविद्या आदि अनर्थों का नाश होता है। इसलिए ब्रह्म कि जिज्ञासा करनी चाहिए।

पू- वह ब्रह्म प्रसिद्ध है या अप्रसिद्ध है? यदि प्रसिद्ध है तो उसकी जिज्ञासा करने कि आवश्यकता नहीं है, यदि अप्रसिद्ध है तो उसकी जिज्ञासा ही नहीं हो सकती।

सि- नित्यशुद्ध, नित्यबुद्ध, नित्यमुक्त स्वभाव, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिसंपन्न ब्रह्म प्रसिद्ध है। ब्रह्म षंड कि व्युत्पत्ति से ‘बृह्’ धातु के अर्थ के अनुसार नित्यशुद्ध अर्थ आदि की प्रतीति होती है और सब की आत्मा होने से ब्रह्म का अस्तित्व प्रसिद्ध है। सबको आत्मा के अस्तित्व का ज्ञान होता है, ‘मैं नहीं हूँ’ ऐसा ज्ञान किसी को नहीं होता। यदि आत्मा का अस्तित्व प्रसिद्ध नहीं होता, तो सब लोगो को ‘मैं नहीं हूँ’ ऐसा ज्ञान होता। आत्मा ही ब्रह्म है।

पू- यदि ब्रह्म आत्मा होने से प्रसिद्ध है, तो वह ज्ञात ही है। इसलिये उसकी जिज्ञासा नहीं बनती है।

सि- नहीं। क्योंकि उसके विशेष ज्ञान मे मतभेद है। सामान्य जन तथा लोकायतिक मानते हैं कि चैतन्य शरीर ही आत्मा है। अन्य कहते हैं कि चेतन इंद्रियाँ आत्मा हैं। अन्य कहते हैं कि मन ही आत्मा है। कोई कहते हैं कि क्षणिक विज्ञान मात्र आत्मा है। अन्य के अनुसार आत्मा शून्य है। अन्यानुसार, शरीरादि से भिन्न आत्मा संसारी, कर्ता तथा भोक्ता है। अन्यानुसार आत्मा केवल भोक्ता ही है, कर्ता नहीं। किसी के अनुसार, जीव से भिन्न ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिसंपन्न है। आत्मा भोक्ता है, ऐसा अन्य मानते हैं। इस प्रकार, युक्ति, वाक्य और उनके आभास के आधार पर बहुत से मतभेद हैं। उनका विचार किए बिना चाहे जिस मत को ग्रहण करने वाले मोक्ष से हट जाएंगे तथा उन्हे अनर्थ भी प्राप्त होगा। इसलिए ब्रह्म जिज्ञासा के कथन द्वारा, जिसमे उपनिषद से अविरुद्ध तर्क साधन हैं और जिसका प्रयोजन मोक्ष है, ऐसे वेदांतवाक्यों की मीमांसा आरंभ करते हैं।

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