Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.1.2 – Origin etc. of the Universe

जन्माद्यस्य यत:

 ऐसा कहा गया कि ब्रह्म की जिज्ञासा करनी चाहिए। फिर उस ब्रह्म के लक्षण क्या हैं? भगवान सूत्रकार कहते हैं- जन्म अर्थात् उत्पत्ति है जिनके आदि में, वे जन्म आदि। यह तद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि समास है। और इस समास का अर्थ है, जन्म-स्थिति-नाश। जन्म का उल्लेख पहले किया गया है क्योंकि यह सामान्य स्थिति के अनुसार है तथा श्रुति वाक्यों के अनुसार भी। जैसा कि श्रुति कहती है- ‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते’ (तै 3.1)। इस वाक्य में जन्म, स्थिति और लय का क्रमश: दर्शन होता है। सामान्य स्थिति भी ऐसी ही है क्योंकि जन्म से अस्तित्व मे आए हुये धर्मों की ही स्थिति और लय का होना संभव है।

अस्य (इदम् का) जो कि इदं का रूप है, उससे उस पदार्थ का निर्देश है जो प्रत्यक्ष उपस्थित है (ब्रह्मांड)। षष्ठी विभक्ति जन्म आदि धर्म से धर्मी के संबंध को बताती है।

यत: से कारण का निर्देश है। नाम रूप से व्याकृत (प्रकट हुआ), अनेक कर्ता भोक्ता से संयुक्त,क्रिया और फल का आश्रय आधार, जिसमें देश, काल और निमित्त (space, time and causation) नियमित व्यवस्थित हैं, मन से भी जिसकी रचना के स्वरूप का विचार नहीं हो सकता, ऐसे जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और नाश जिस सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् कारण से होते हैं, ‘वह ब्रह्म है’ यह समझना चाहिए।

अन्य भाव विकारों का भी इन तीनों मे ही (जन्म, स्थिति और लय) अंतर्भाव है, इसलिए इन तीनों का ही यहाँ ग्रहण किया गया है। यास्क मुनि के द्वारा ‘जायते, अस्ति’ (जन्म लेता है, स्थित है, बढ़ता है इत्यादि) इत्यादि छ: विकारों को ग्रहण किया जाए तो यह आशंका हो सकती है कि ये तो केवल जगत के स्थिति काल मे ही संभव हैं और इसलिए मूल कारण से जगत के जन्म, स्थिति और लय को इंगित नहीं किया गया है। कोई यह शंका न करे, इसलिए जिस ब्रह्म से इस जगत का जन्म, जिसमे इसकी स्थिति तथा जिसमें इसका लय कहा गया, वे ही, जन्म, स्थिति और लय यहाँ गृहीत होते हैं।

पूर्वोक्त विशेषणों से युक्त जगत् की, उक्त विशेषण ईश्वर को छोड़ अन्य से- अचेतन प्रधान से, अचेतन परमाणुओं से, अभाव से (शून्य से), संसारी (हिरण्यगर्भ) से, उत्पत्ति आदि की संभावना नहीं की जा सकती। इसी प्रकार स्वभाव से भी (अपने आप)जगत् की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती क्योंकि वे पुरुष जो कार्य करना चाहते हैं, उन्हे विशिष्ट देश, काल और निमित्त पर आश्रित होना पड़ता है।

ईश्वर को जगत् का कारण मानने वाले (नैयायिक), इसी अनुमान (inference) को, संसारी (जीव) से भिन्न ईश्वर की सत्ता है, इसका साधन मानते हैं।

पू- क्या इस जन्मादि सूत्र में भी उसी अनुमान को प्रस्तुत नहीं किया गया है?

सि- नहीं। वेदान्त वाक्यों रूपी फूलों को गूँथना सूत्रों का प्रयोजन है। सूत्रों से वेदान्त वाक्यों का उदाहरण देकर विचार किया जाता है। वाक्यार्थ विचार से जो तात्पर्य निश्चित होता है, उससे ब्रह्मानुभव प्राप्त होता है, अनुमान आदि प्रमाणों से नहीं।

लेकिन जगत् के जन्म आदि को बताने वाले वेदान्त वाक्यों के रहने पर, उनके अर्थ में दृढ़ता के लिए, उन वाक्यों के अनुकूल अनुमान प्रमाण हैं क्योंकि श्रुति ने खुद सहायता के लिए तर्क को अंगीकार किया है। जैसे कि- ‘श्रवण करने योग्य है, मनन करने योग्य है'(बृ 2.4.5)- यह श्रुति और ‘जैसे पंडित और मेधावी गांधार देश को प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार आचार्यवान् पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है’ (छा 6.14.2) यह श्रुति अपने प्रति पुरुष बुद्धि को सहायक दिखाती है। धर्मजिज्ञासा मे श्रुति आदि ही प्रमाण हैं पर ब्रह्मजिज्ञासा में यथासंभव श्रुति आदि और अनुभव आदि प्रमाण हैं क्योंकि ब्रह्मज्ञान सिद्धवस्तुविषयक है (ऐसी वस्तु जो पहले से ही है) और ब्रह्मज्ञान की चरम सीमा अनुभव है। धर्म में अनुभव आदि प्रमाण नहीं हैं पर उसमें श्रुति आदि ही प्रमाण हैं। इसके अतिरिक्त, कर्तव्य की उत्पत्ति पुरुष के अधीन है। इसलिए लौकिक कर्म करना या न करना या दूसरे प्रकार से करना करता के अधीन है। जैसे घोड़े पर जाता है या पैदल जाता है या अन्य प्रकार से जाता है या नहीं जाता है। अति रात्र मे षोडशी को ग्रहण करता है या नहीं ग्रहण करता है या सूर्योदय से पहले होम करता है या सूर्योदय के बाद होम करता है। इस प्रकार विधि, निषेध, विकल्प, उत्सर्ग (सामान्य नियम) तथा अपवाद धर्म के विषय में अर्थयुक्त हैं। परंतु सिद्धवस्तु इस प्रकार है या इस प्रकर नहीं है, है अथवा नहीं है, ऐसे विकल्पों का विषय नहीं है। विकल्प पुरुष बुद्धि की अपेक्षा करते हैं। सिद्ध वस्तु का यथार्थ ज्ञान पुरुष बुद्धि की अपेक्षा नहीं करता, वह तो सिद्ध वस्तु के अधीन है। एक स्थाणु मे स्थाणु है या पुरुष है या अन्य है, यह ज्ञान यथार्थ ज्ञान नहीं होता। यह मिथ्या ज्ञान है। स्थाणु ही है यह तत्व ज्ञान है क्योंकि वह वस्तु के अधीन है। उसी प्रकार, सिद्ध वस्तु का प्रामाण्य वस्तु के अधीन है। अत: सिद्ध हुआ कि ब्रह्मज्ञान भी वस्तु के अधीन ही है, क्योंकि उसका विषय सिद्धवस्तु ही है।

पू- यदि ब्रह्म सिद्ध वस्तु है तो वह अन्य प्रमाणो का विषय तो है ही, इसलिए वेदान्त वाक्यों का विचार तो अनर्थक ही है।

सि- नहीं। चूंकि ब्रह्म इंद्रियों का विषय नहीं है, इसलिए अन्य प्रमाणो के द्वारा ब्रह्म का जगत् के साथ संबंध पता नहीं चलता। इंद्रिय विषयों को तो समझ लेती हैं पर ब्रह्म को नहीं। अगर ब्रह्म इंद्रियों का विषय होता तो जगत् ब्रह्म से संबद्ध है, यह ज्ञान होता। और यह जगत् जब इंद्रियों के द्वारा गृहीत होता भी है तब भी उसका संबंध ब्रह्म के साथ है अथवा किसी और के साथ, ऐसा निश्चय नहीं किया जा सकता। इसलिए ‘जन्मादि’ सूत्र अनुमान दर्शित करने के लिए नहीं बल्कि वेदांतवाकयों के प्रदर्शन के लिए है।

वे कौन से वाक्य हैं जिंका ब्रह्म के लक्षणरूप से विचार करना अभीष्ट है? ‘भृगु वारुणि पिता वरुण के पास गया और कहा- भगवन्! ब्रह्म का उपदेश कीजिये’  ऐसा उपक्रम करके कहते हैं – ‘यतो वा- जिससे यह भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसमें जीते हैं, जिसके प्रति जाते हैं और जिसमें प्रवेश करते हैं, उसको ठीक-ठीक जानने की इच्छा का, वह ब्रह्म है’ (तै 3.1)। उसका निर्णय वाक्य यह है-‘आनंद से ही नि: संदेह भूत उत्पन्न होते हैं, जन्म लेकर आनंद से पालित होते हैं और आनंद मे ही लीन होते हैं’ (तै 3.6)। नित्य शुद्ध, नित्य बुद्ध और नित्य मुक्त सर्वज्ञ स्वरूप जो कारण है, उसके विषय मे इस प्रकार के स्वरूप लक्षणों का निर्देश करने वाले दूसरे वाक्य भी उद्धृत करने चाहिए।

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