Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.1.3 – Scripture as Source of Knowledge of Brahman

शास्त्रयोनित्वात्

ब्रह्म में जगत् का कारणत्व दिखलाने से उसकी सर्वज्ञता सूचित हुयी, अब उसी को दृढ़ करते हुये कहते हैं- अनेक विद्यास्थानों से उपकृत, दीपक के समान सब अर्थों के प्रकाशन में समर्थ और सर्वज्ञकल्प महान् ऋग्वेद आदि शास्त्र का योनि अर्थात् कारण ब्रह्म है। ऋग्वेद आदि रूप सर्वज्ञगुणसंपन्न शास्त्र कि उत्पत्ति सर्वज्ञ को छोड़ कर अन्य से संभव ही नहीं है। यह तो लोकप्रसिद्ध है जब कोई शास्त्र किसी व्यक्ति विशेष से रचा जाता है तो वह व्यक्ति उस शास्त्र से ज्यादा ज्ञानवान् होता है क्योंकि शास्त्र तो उस व्यक्ति के कुछ भाग को ही निरूपित कर रहा है। तो फिर उस महान् सत्ययोनि के सम्पूर्ण सर्वज्ञत्व और सर्वशक्तिमत्त्व के बारे मे कहना ही क्या जब अनेक शाखा भेद से भिन्न देव, पशु, मनुष्य, वर्ण, आश्रम का हेतु, सर्वज्ञान का आकार, ऋग्वेद अनायास ही लीलपूर्वक उसके नि:श्वास के समान संभूत होता है जैसा कि (बृ 2.4.10) इस श्रुति से सिद्ध है।

अथवा, पूर्वोक्त ऋग्वेद आदि शास्त्र ब्रह्म के यथार्थ स्वरूप के ज्ञान मे योनि- कारण अर्थात् प्रमाण हैं, इसलिए ब्रह्म केवल वेद से ही जाना जाता है। शास्त्र प्रमाण से ही यह समझा जाता है कि ब्रह्म जगत् आदि का कारण है, यह अभिप्राय है। पूर्व सूत्रों मे ‘यतो वा’ का उदाहरण दिया गया था।

पू- जब पहले ऐसे शास्त्र का उदाहरण देते हुये सूत्रकार ने ब्रह्म शास्त्रयोनि है ऐसा कह दिया है, तब फिर इस सूत्र का प्रयोजन ही क्या है?

सि- इसपर कहते हैं कि पूर्वसूत्र में शास्त्र का स्पष्ट उल्लेख नहीं था और कोई यह शंका कर सकता था कि जगत् के जन्म का अनुमान रूप से निरूपण है। इस शंका को दूर करने के लिए यह ‘शास्त्रयोनित्वात्’ सूत्र प्रवृत्त हुआ है।

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