Brahm Sutra

Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.1.4 – Upanishads Reveal Brahman

तत्तु समन्वयात्

पू॰ – शास्त्र ब्रह्म के लिए प्रमाण हैं, ऐसा कैसे कहते हो? क्योंकि जै.सू. 1.2.1 के अनुसार वेद तो क्रियार्थक हैं, इसलिए अक्रियार्थक वाक्य तो अर्थहीन हुये। वेदान्त तो अक्रियार्थक है, इसलिए अर्थहीन हुये। या फिर, कर्ता, देवता आदि के बारे मे बताना वेदान्त का प्रयोजन है, इसलिए वे क्रिया विधिवाक्यों (injunctions) के अंग हैं। या फिर उपासना आदि अन्य क्रियाओं का विधान वेदान्त का प्रयोजन है। सिद्ध वस्तु का प्रतिपादन करना तो वेदान्त का प्रयोजन हो ही नहीं सकता क्योंकि सिद्ध वस्तु तो प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो का विषय है और इसीलिए उसका प्रतिपादन न तो स्वीकार्य है न ही त्याज्य। इसी कारण से ‘सोऽरोदीत्’ (वह रोया) इत्यादि वाक्य अर्थहीन न हों, इसलिए ‘विधिना’ (अर्थवाद- corroborative statements- और विधिवाक्यों मे एकवाक्यता है क्योंकि अर्थवाद विधेय- जो विधि का उद्देश्य है- की स्तुति है), जै.सू. 1.2.7। इसलिए, ‘सोऽरोदीत्’ इत्यादि वाक्य सार्थक है क्योंकि वे स्तुति अर्थक हैं। जहां तक मंत्रों का प्रश्न है, जैसे कि ‘इषेत्वा’(अन्न के लिए तुझे काटता हूँ), वे या तो क्रिया या फिर उसके साधन से संबद्ध हैं। कहीं भी विधिवाक्यों से संबंध के बिना वेदवाक्यों कि अर्थवत्ता न तो देखने मे आई है और न ही उपपन्न है। सिद्ध वस्तु के स्वरूप मे विधि नहीं हो सकती, क्योंकि विधि तो क्रियाविषयक है। इसलिए कर्म के लिए अपेक्षित कर्ता के स्वरूप, देवता आदि का प्रकाशन करने के कारण वेदान्त क्रियाविधि के अंग या हिस्सा हैं। यदि किसी अन्य कारण से यह न भी माना जाये फिर भी वेदान्त वाक्यों मे उपासना कर्मपरक है। इसलिए, ब्रह्म शास्त्रप्रमाणक नहीं है।

इसके उत्तर मे यह सूत्र कहा गया।

सि॰ – ‘तु’ पूर्वपक्ष के मत के खंडन के लिए है। सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमत् और जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय का कारण, वह ब्रह्म वेदान्त शास्त्र से ही जाना जाता है। किस प्रकार? समन्वय के द्वारा। क्योंकि सभी वेदांतवाक्यों का समन्वय तभी हो पाता है जब उन्हें ब्रह्म को अपने तात्पर्य के रूप मे माना जाय। जैसा कि ‘सदेव॰’, ‘एकम्॰’, ‘आत्मा॰’, ‘तदेतद्॰’, ‘अयमात्मा॰’ इत्यादि द्वारा स्पष्ट है। इसके अलावा, जब उपनिषद के अर्थों का समन्वय उनके ब्रह्मस्वरूप के विषय मे होने से  हो जाता है, फिर किसी अन्य अर्थ की अपेक्षा करना ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा करने से श्रुति प्रतिपादित अर्थ की हानी तथा श्रुति से अप्रतिपादित अर्थ की कल्पना करनी पड़ेगी।

वेदांतवाक्यों का तात्पर्य कर्ता के स्वरूप का प्रतिपादन करना है, ऐसा नहीं है, क्योंकि ‘तत्केन कम् पश्येत्’ (बृ 2.4.13) इत्यादि क्रिया, कारक और फल का निराकरण करने वाली श्रुतियाँ हैं (उस काल में-  अर्थात् विद्या काल में- कौन कर्ता किस करण से किस विषय को देखे)। ब्रह्म यद्यपि सिद्ध वस्तु है, फिर भी प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के बिना जाना नहीं जा सकता क्योंकि ‘तत् त्वम् असि’ इस शास्त्र के बिना ब्रह्मात्मभाव समझ मे नहीं आता। यह जो संशय था कि ब्रह्म हेय और उपादेय से भिन्न है, इसलिए अर्थहीन है, उसके उत्तर मे कहते हैं कि यह दोष नहीं है क्योंकि हेय उपादेय रहित ब्रह्मात्मभाव समझने से सभी क्लेशों का नाश होकर पुरुषार्थसिद्धि होती है। यदि देवता आदि का प्रतिपादन करने वाले वाक्य, वेदांतवाक्य के अंदर उपासना के अंग हों, तो भी विरोध नहीं है। परंतु ब्रह्म उपासना विधि का अंग नहीं हो सकता। एकत्व का विज्ञान होने पर ब्रह्म हेय उपादेय शून्य होने के करण क्रिया, कारक आदि द्वैत विज्ञान का नाश होना सर्वथा युक्त है। एकत्व के विज्ञान से नष्ट हुये द्वैत विज्ञान का पुन: संभव नहीं है कि ब्रह्म उपासना विधि का अंग है ऐसा प्रतिपादन किया जाये। यद्यपि अन्य जगहों पर बिना विधिवाक्यों के वेदवाक्यों का प्रमाणत्व नहीं दीखता, फिर भी आत्मविज्ञान का फल (मोक्ष) होने के कारण उस विषय की चर्चा करने वाले शास्त्र के प्रामाण्य को अनदेखा नही किया जा सकता। शास्त्र का प्रामाण्य अनुमानगम्य नहीं है की वह अन्य दृष्टांतों की अपेक्षा करे। इससे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्म शास्त्रप्रमाणक है (अर्थात् ब्रह्म के विषाय में शास्त्र प्रमाण हैं)।

पू॰ – अन्य कहते हैं कि यद्यपि ब्रह्म के लिए शास्त्र प्रमाण हैं, फिर भी ब्रह्म विधि के विषय उपासना का अंग है,ऐसा शास्त्र प्रस्तुत करता है। जैसे कि, यूप और आहवनीय अग्नि, जो कि लौकिक जीवन में यद्यपि अज्ञात हैं, फिर भी विधिके अंग के रूप मे शास्त्रो में प्रस्तुत किए जाते हैं। ऐसा कैसे हो सकता है (कि ब्रह्म उपासना का अंग हो जाए)? ऐसा इसलिए क्योंकि जो शास्त्रतात्पर्यविद् हैं, उनके अनुसार शास्त्रों का उद्देश्य कार्यों में प्रवृत्ति या निवृत्ति है। “वेदों का तात्पर्य (कर्तव्य) कर्म का ज्ञान कराना है” “चोदना (विधि) से तात्पर्य क्रिया (कर्तव्य) मे प्रवृत्त करना है” “विधि वह है जो इनका (पुण्य कर्मों) ज्ञान दे” “चूंकि वेद (कर्तव्य) क्रिया करने (या न करने) के लिए हैं, इसलिए वे वेद वाक्य जिनका तात्पर्य यह नहीं है, वे अर्थहीन हैं”। इसलिए वेदवाक्य तभी सार्थक हैं जब वे पुरुष को या तो किसी उद्देश्य के लिए क्रिया मे प्रवृत्त करें या निवृत्त करें, अर्थवाद ऐसे वेदवाक्यों के अंग बनकर उपयोगी हैं। और चूंकि वेदान्त वाक्य की ऐसे वेद वाक्यों के साथ समानता है, इसलिए वे सिर्फ इसी प्रकार से अर्थयुक्त हैं। जब यह सिद्ध हुआ की वेदान्त वाक्य भी विधिपरक हैं, तो यह भी युक्त है कि जैसे स्वर्ग की कामना करने वालों के लिए अग्निहोत्र आदि कर्मकांड आदि का विधान है, उसी प्रकार अमृतत्व कि कामना करने वालों के लिए ब्रह्म ज्ञान का विधान है।

 प्रतिकार॰ – क्या यह कहा नही गया था कि जिज्ञास्य मे अंतर है? कर्मकांड में धर्म (धार्मिक क्रियाएँ, क्या करना चाहिए और क्या नही) जिज्ञास्य है, जिसकी उत्पत्ति नही हुई है, पर यहाँ तो ब्रह्म जिज्ञास्य है जो कि सिद्ध सत्य है और हमेशा से उपस्थित है। इसलिए ब्रह्मज्ञान का फल धर्मज्ञान, जिसे अनुष्ठान आदि की अपेक्षा है, के फल (स्वर्ग आदि) से विलक्षण होना चाहिए।

पू॰ –  नहीं। क्योंकि, ब्रह्म तो कार्य की विधि मे अंग के रूप में प्रस्तुत है। जैसे कि विधान हैं , “आत्मा द्रष्टव्य है” “वह आत्मा जो निष्पाप है, वह अन्वेष्टव्य है और जिज्ञासितव्य है” “आत्मा पर ही उपासना करनी चाहिए” “आत्मा के लोक की ही उपासना करे” “जो ब्रह्म को जनता है वह ब्रह्म ही हो जाता है”। इस प्रकार यह आत्मा क्या है, वह ब्रह्म क्या है, ऐसी आकांक्षा होने पर उसके स्वरूप का बोध कराने के लिए “नित्य, सर्वज्ञ, सर्वगत, नित्यतृप्त, नित्यशुद्धबुद्धस्वभाव, विज्ञान स्वरूप और आनंदस्वरूप ब्रह्म” एवम् अन्य दूसरे वाक्य हैं। उस उपासना से मोक्ष का फल होता है जो कि यूँ तो अदृष्ट है पर शास्त्रो से ज्ञात होता है। पर अगर वेदांतवाक्यों को क्रियाओं (कर्तव्य) की विधि का अंग न मानें और वे वस्तु मात्र का कथन करते हैं, ऐसा जानें तो वे अर्थहीन हो जाएंगे और स्वीकृति और अस्वीकृति का कोई स्थान नहीं रहेगा। जैसे कि, “पृथ्वी सात द्वीपों से बनी है” “राजा जाता है”।

प्रतिकार॰ – वस्तु मात्र का कथन जैसे कि “यह रस्सी है साँप नहीं” भ्रम से उत्पन्न भय को दूर कर सार्थक सिद्ध होता है। उसी प्रकार असंसारी आत्मवस्तु के कथन द्वारा संसार रूपी भ्रम को दूर कर वेदांतवाक्य सार्थक हैं।

पू॰ – यह तब हो सकता, जब कि जैसे वस्तुस्वरूप का श्रवण करने से सर्प का भय समाप्त हो जाता है, वैसे ही ब्रह्मस्वरूप के श्रवण मात्र से सांसरित्व का भ्रम समाप्त हो जाता। पर ऐसा तो नहीं होता, क्योंकि जिन्होने ब्रह्म का श्रवण किया है, उनमें भी पूर्ववत् सुख, दुख आदि संसार के धर्म देखने मे आते हैं। “श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना चाहिए” इस श्रुति में श्रवण के बाद मनन और निदिध्यासन आते हैं, इसलिए ऐसा मानना चाहिए कि उपासना कि विधि के विषय के रूप में ब्रह्म शास्त्रप्रमाणक है (ब्रह्म शास्त्र मे प्रस्तुत है)।

सि ॰ – नहीं। क्योंकि कर्म और विद्या के फल अलग-अलग हैं। धर्म के द्वारा उन शरीर, वाणी और मन से किए जाने वाले कर्मों का ज्ञान होता है जो श्रुति और स्मृति से सिद्ध हैं, तथा जिसके विषय मे जिज्ञासा “अथातो धर्म जिज्ञासा” (जै॰सू॰) इस सूत्र में कही गयी है। हिंसा आदि अधर्म की भी जिज्ञासा करनी चाहिए ताकि उन्हे छोड़ा जा सके क्योंकि वे वेदों में निषेध वाक्यों के द्वारा कहे गए हैं। सुख और दुख धर्म और अधर्म के फल हैं जो कि अर्थ और अनर्थ से बने हैं, जिनके बारे में वेदवाक्य प्रमाण हैं। ये सुख और दुख, विषय और इंद्रियों के संयोग से प्रत्यक्षत: ब्रह्मा से स्थावर तक शरीर, वाणी तथा मन के द्वारा अनुभव किए जाते हैं। मनुष्य से ब्रह्मा तक सुख का क्रम  श्रुति करती है। उससे उसके हेतु धर्म का क्रम  ज्ञात होता है। धर्म के क्रम  से धर्म के अधिकारी (competent) पुरुषों का क्रम  ज्ञात होता है। यह तो प्रसिद्ध ही है कि अधिकारिता सामर्थ्य और महत्वाकांक्षा के आधार पर मांपी जाती है। जैसे कि, यज्ञ और अनुष्ठान करने वाले विद्या रूपी समाधि के कारण उत्तर पथ से जाते हैं। और केवल इष्ट, पूर्त तथा दत्त साधन वाले धूम आदि क्रम से दक्षिण पथ से जाते हैं। वहाँ भी (चन्द्र के लोक में) सुख और उसके साधनों का क्रम  “वे वहाँ जब तक उनके क्रियाओं का फल रहता है, तब तक रहते है” ऐसे शास्त्र से जाना जाता है। इसी प्रकार, मनुष्य से लेकर स्थावर तथा नारकीय जीवों तक जो छोटे सुख वर्गीकृत हैं, उन्हें भी धर्म से उत्पन्न जानना चाहिए, जिनके विषय मे वेदवाक्य प्रमाण हैं। तथा ऊँचे और नीचे प्राणियों मे दुख का क्रम  देख कर यह साफ है कि उनके कारण, जो कि अधर्म है, में भी क्रम  है तथा वे वेदवाक्यों के द्वारा वर्जित हैं। उसी प्रकार उनके अनुष्ठान करने वालों मे भी यह क्रम  ज्ञात होता है। इस प्रकार यह वेद, स्मृति तथा न्याय में प्रसिद्ध है कि यह अनित्य संसार सुख और दुख के क्रम से बना है तथा यह क्रम उन्ही लोगो को प्राप्त होता है जो की अविद्या आदि दोषों से युक्त हैं तथा यह क्रम उन्हें शरीर ग्रहण के बाद धर्म और अधर्म के अनुरूप मिलता है। यह इस श्रुति से समर्थित है “यह निश्चित है कि सशरीर (embodied being) के लिए प्रिय और अप्रिय से मुक्ति संभव नही”, यह श्रुति पूर्ववर्णित संसार की प्रकृति का एक अनुवाद (corroborative statement) है। “अशरीरी को प्रिय और अप्रिय का स्पर्श ही नहीं है” इस श्रुति द्वारा प्रिय और अप्रिय के स्पर्श का निषेध कर वस्तुत: अशरीरत्व जो कि मोक्ष ही है, उसके धर्म से उत्पन्न होने का निषेध किया है (i.e. moksh cannot be the result of virtuous deeds). क्योंकि अगर मोक्ष को धर्म से उत्पन्न मानें तो उसमे प्रिय और अप्रिय के स्पर्श का निषेध असंगत है।

पू ॰ – अशरीरत्व धर्म का फल तो हो ही सकता है न?

सि ॰ – नहीं, क्योंकि ये श्रुति “आत्मा को शरीरों के बीच अशरीरी, अनित्यों के बीच अनित्य, महान् तथा सर्वव्यापक मान कर विद्वान् शोक नही करते हैं” “वह अप्राण, अमना तथा शुभ्र है” “यह पुरुष असंग है” अशरीरत्व को स्वाभाविक बताती हैं। इस कारण अनुष्ठेय कर्म के फल से अलग मोक्ष नामक अशरीरत्व नित्य है, यह सिद्ध हुआ।  (नित्य दो प्रकार का होता है, परिणामी नित्य और पारमार्थिक नित्य) परिणामी नित्य वह है जिसके विकृत होने पर भी “वही यह है” ऐसी बुद्धि का नाश नही होता, जैसे कि जगत नित्य है ऐसा कहने वालों के मत मे पृथ्वी आदि और जैसे कि संख्यों के मत में गुण आदि। परंतु यह (मोक्ष) पारमार्थिक नित्य है जो कि कूटस्थ, व्योमवत् सर्वव्यापी, सभी क्रियाओं से रहित, नित्य तृप्त, निरवयव, स्वयं ज्योति स्वभाव है। यही वह मोक्ष नामक अशरीरत्व है जहां धर्म अधर्म अपने कार्यों के साथ (सुख दुख) नहीं हैं तथा कालत्रय भी नहीं है, जैसा कि श्रुति मे है “उसके बारे मे कहो जो धर्म – अधर्म से , कार्य-कारण से, भूत-भविष्य-वर्तमान से पृथक् है”। (चूँकि मोक्ष धर्म-अधर्म से पृथक् होने के कारण, क्रिया के फल से पृथक् है) इसलिए मोक्ष ही ब्रह्म है जिसके बारे में जिज्ञासा प्रस्तुत थी। यदि मोक्ष कर्तव्य कर्म के पूरक (supplementary) के रूप में उपदिष्ट होता या फिर साध्य होता (something to be achieved), तो फिर अनित्य हो जाता। ऐसा होने पर, मोक्ष अन्य बहुत सारे क्रम से सज्ज अनित्य कर्मफलों के बीच स्थित एक प्रकार का बहुत अच्छा फल हो जाता। लेकिन जो मोक्ष मे विश्वास करते हैं वे तो इसे नित्य मानते हैं। इसलिए कार्य के अंग के रूप में ब्रह्म का उपदेश करना अयुक्त है।

और, “ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म हो जाता है” “पर (हिरण्यगर्भ) भी जिससे अवर है, उस ब्रह्म को देखने पर सभी कर्मों का नाश हो जाता है” “वह जो ब्रह्म के आनंद (जो कि ब्रह्म का स्वरूप है) को जनता है, किसी से भय नहीं करता” “जनक, तुमने अभय (ब्रह्म) प्राप्त किया है” “इसने अपने को ही ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसा जाना, और यह सर्व हो गया” “एकत्व दर्शी को मोह और शोक कहाँ” ये श्रुतियाँ ब्रहविद्या के बाद मोक्ष दिखाती हैं तथा बीच मे किसी भी अन्य क्रिया की अनुपस्थिति बताती हैं। इसी प्रकार ब्रह्मदर्शन और सर्वात्मभाव के मध्य कर्तव्य की अनुपस्थिति उदाहृत है, “इसे (आत्मा को) होकर गाता है’ इसमें खड़े होने और गाने की क्रियाओं के बीच मे उस कर्ता ने अन्य कोई क्रिया नहीं की, ऐसा पता चलता है। “आप हमारे पिता हैं  और आप हमें अविद्या रूप सागर के पार पहुँचाते हैं” “मैंने भग्वत्तुल्य पुरुषों से केवल सुना है (अनुभव नही) कि आत्मा को जानने वाला शोक से पार हो जाता है। भगवन मैं शोक कर्ता हूँ, मुझे शोक से पार कर दीजिये” “भगवान सनत्कुमार ने दग्धपाप (नारद) को तमस (अविद्या) के पार (ब्रह्म) दिखाया” इन श्रुतियों के द्वारा यह दर्शित है कि आत्मज्ञान का फल और कुछ नहीं, बस मोक्ष के प्रतिबंध की निवृत्ति है। इसी प्रकार न्याय से समर्थित आचार्य गौतम का सूत्र है “दुख, जन्म, प्रवृत्ति-धर्म और अधर्म, दोष (मोह आदि) एवम् मिथ्या अज्ञान, इनमें बाद वाले कारण का नाश होने पर पहलेवाले कार्य का नाश होता है”। ब्रह्म और आत्मा के ऐक्य के विज्ञान से मिथ्या अज्ञान का नाश होता है।

पर यह ब्रह्म आत्मैक्य विज्ञान संपद् (एक प्रकार की उपासना) नही है।  “मन अनंत है, विश्वेदेव अनंत हैं, (इसलिए मन मे विश्वेदेव कि दृष्टि करने के कारण) इसके द्वारा वह अनंतलोक जीतता है” इस श्रुति के अनुसार मन में विश्वेदेव दृष्टि संपद है। यह एकत्व विज्ञान अध्यास रूप भी नही है, जैसे कि, “मन ब्रह्म है, ऐसी उपासना करो” “आदित्य ब्रह्म है- ऐसा आदेश है” इनके द्वारा मन एवम् आदित्य में ब्रह्म दृष्टि अध्यास है। यह विज्ञान किसी विशेष क्रिया पर आधृत उपासना भी नही है, जैसे कि “वायु निश्चय ही विलय का स्थान है” “प्राण निश्चय ही विलय का स्थान है”। न ही यह (आत्मैकत्व विज्ञान) यज्ञ में प्रयुक्त किसी अंग की किसी प्रकार की शुद्धि है, जैसे कि अर्घ्य को देखना (by the wife of sacrificer for the purification of oblation). यदि ब्रह्म आत्मैक्य विज्ञान को एक प्रकार का संपद् माना जाय तो ‘तत् त्वम् असि’’अहम् ब्रह्म अस्मि’ ‘अयम् आत्मा ब्रह्म’इत्यादि वाक्य जिनका तात्पर्य बहम और आत्मा के एकत्व को बताना है, इन श्रुतियों के शब्दो का अर्थ बाधित होगा। तथा ‘भिद्यते हृदय ग्रंथि:’ आदि वाक्य जो (ब्रह्म आत्मैक्य विज्ञान के)अविद्या निवृत्ति रूपी फल का बोध कराते हैं, उनका विरोध हो जाएगा। “जो ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्म हो जाता है” ऐसे वाक्य जो आत्मा के ब्रह्मभाव को बताते हैं, संपद् आदि की दृष्टि से अयुक्त हो जाएंगे। इसलिए, ब्रह्म आत्मैक्य विज्ञान संपद् रूप नहीं है। इसी कारण ब्रह्मविद्या पुरुष के कार्य पर आश्रित नही है।

तब किस पर आश्रित है?

प्रत्यक्ष आदि प्रमाण में वस्तुज्ञान के समान, वस्तु पर ही आश्रित है (प्रत्यक्ष में, हम एक घर को घर ही देखते हैं कुछ और नही क्योंकि ज्ञान वस्तु, घर, पर आश्रित है। ब्रह्म या ब्रह्मज्ञान की किसी प्रकार कार्य के साथ संबंध की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

ब्रह्म जानना, इस क्रिया, का कर्म है, इसलिए ब्रह्म का कार्य के साथ संबंध हो सकता है। नहीं, क्योंकि श्रुति है, “वह जाने हुये से अलग है, वह न जाने हुये से भी अलग है” “जिसके द्वारा यह सब जाना जाता है, उसे किस प्रकार जाने”। इनके द्वारा ब्रह्म जानना इस क्रिया का कर्म है, इसका निषेध किया गया है। इसी प्रकार ब्रह्म के उपासना क्रिया का कर्म होने का भी निषेध है। जैसे कि “वह जो वाक् से नहीं कहा जाता, वह जिससे वाक् प्रेरित होती है” इस श्रुति से ब्रह्म को इंद्रियों का अविषय बताया गया और फिर “उसी को तू ब्रह्म जान, उसे नही जिसकी लोग उपासना करते हैं”।

पू ॰ – यदि ब्रह्म (ज्ञान का) विषय नहीं है तो ब्रह्म शास्त्र द्वारा प्रस्तुत (शास्त्रयोनित्वात्) है, यह कहना अयुक्त हुआ न।

सि ॰ – नहीं। क्योंकि शास्त्र का उद्देश्य अविद्या से कल्पित भेद को हटाना है। शास्त्र ब्रह्म को ‘इदम्’ रूप से ज्ञान के विषय के रूप में बताना नहीं चाहता, वरन् ब्रह्म प्रत्यगात्मा होने के कारण अविषय है ऐसा बताते हुये अविद्या के द्वारा कल्पित वेद्य-वेदितृ-वेदना (knowable-knower-knowledge) भेद को दूर करता है। और श्रुति भी है “जो ऐसा समझता है कि ‘ब्रह्म ज्ञात नहीं है’ उसने ब्रह्म को ठीक से जाना है और जो ऐसा समझता है कि ‘मैंने ब्रह्म को जान लिया है’ उसने ब्रह्म को जाना ही नहीं” “दृष्टि के साक्षी को तू देख नहीं सकेगा और ज्ञान को जो जानने वाला है उसे तू जान नहीं सकेगा” इत्यादि। मोक्ष के तो अनित्य होने का प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि इसी से अविद्या के द्वारा कल्पित संसारित्व (जन्म मृत्यु का बंधन) दूर होकर आत्मा का नित्य मुक्त स्वरूप ज्ञात होता है।

जिनके मत में मोक्ष उत्पाद्य (किसी क्रिया का फल) है, उनके लिए मोक्ष का मानसिक, वाचिक, शारीरिक कर्मों की अपेक्षा रखना तर्कपूर्ण है। अगर मोक्ष किसी का विकार माना जाए, उनके लिए भी यही मत तर्कपूर्ण रहेगा। इन दोनों मतों में (उत्पाद्य, विकार्य) मोक्ष निश्चित रूप से अनित्य रहेगा। क्योंकि दही आदि विकार या घट आदि उत्पाद तो अनित्य ही होते हैं। और जिस मत में ब्रह्म प्राप्य वस्तु है, उस मत में भी मोक्ष को कार्य की अपेक्षा नहीं है क्योंकि मोक्ष आत्मस्वरूप होने के कारण प्राप्य ही नहीं है। अगर ब्रह्म को आत्मा से अलग मानें तो भी ब्रह्म प्राप्य नहीं है क्योंकि ब्रह्म आकाश की तरह सर्वव्यापी होने से ब्रह्म सबको नित्य प्राप्त है। मोक्ष संस्कार्य (जिसकी शुद्धि की जा सके) भी नहीं है कि वह क्रिया की अपेक्षा करे। संस्कार्य पदार्थ मे गुण मिलाने से या दोष दूर करने से संस्कार होता है। मोक्ष मे गुण मिलाने से संस्कार संभव नहीं है क्योंकि मोक्ष तो उस ब्रह्म का स्वरूप है जिससे श्रेष्ठ कुछ नहीं। दोष दूर कर मोक्ष का संस्कार करना भी संभव नाही क्योंकि मोक्ष तो ब्रह्म का ही स्वरूप है, जो कि नित्य शुद्ध है।

पू ॰ – यद्यपि मोक्ष आत्मा का धर्म है, फिर भी यह ढका हुआ है और यह तब प्रगट होता है जब आत्मा को क्रिया के द्वारा संस्कृत किया जाये, जैसे कि दर्पण की चमक उसे रगड़ कर साफ करने के बाद होती है।

सि ॰ – नहीं। आत्मा को क्रिया का आश्रय मानना ठीक नहीं। क्रिया अपने आश्रय को विकृत किए बिना रह ही नहीं सकती। (अगर आत्मा को क्रिया का आश्रय माने तो) आत्मा क्रिया से विकार को प्राप्त होगी और अनित्य हो जाएगी जो कि “यह आत्मा अविकारी है” इन वाक्यों के विरोध मे होगा। श्रुति से विरोध अनिष्ट है। इसलिए आत्मा का आश्रय लेकर क्रिया का होना संभव नहीं। और दूसरे का आश्रय लेकर होने वाली क्रिया आत्मा को उससे असम्बद्ध होने के कारण संस्कृत कर ही नहीं सकती।

पू ॰ – पर यह तो सामान्य अनुभव की बात है कि देह पर आश्रित स्नान, आचमन, यज्ञोपवीत आदि क्रियाओं से देही (आत्मा) की शुद्धि होती है।

सि ॰ – नहीं। संस्कार तो देह आदि से युक्त अविद्या के द्वारा समझी हुई आत्मा मे होता है क्योंकि स्नान, आचमन आदि क्रियाओं का देह के साथ संबंध प्रत्यक्ष है। यह युक्त है कि संस्कार देह पर आश्रित किसी वस्तु का होता है जो कि अविद्या से आत्मा समझी जा रही है। चिकित्सा के द्वारा धातुओं (पित्त, वात्त, कफ) की साम्यता होने पर वह वस्तु जिसमें ‘मैं निरोग हूँ’ ऐसी बुद्धि उत्पन्न होती है , जो देह के साथ सम्बद्ध है, जो अपने आप को देह से एक मानती है, वही वस्तु आरोग्य का फल पाती है। उसी प्रकार स्नान, आचमन, यज्ञोपवीत के द्वारा जिस वस्तु में ‘मैं शुद्ध संस्कृत हुआ’यह बुद्धि आती है, वही वस्तु संस्कृत होती है। वह वस्तु तो देह से निश्चय ही सम्बद्ध है। मैं-इस ज्ञान के विषय प्रत्ययी अहंकर्ता से सारी क्रियाएँ होती हैं और वह ही उनके फल भी भोगता है। जैसा कि मंत्र भी है “उनमें से एक स्वादिष्ट फल खाता है जबकि दूसरा बिना खाते हुये देखता है”।  “मनीषी इंद्रिय और मन से युक्त आत्मा को भोक्ता कहते हैं”। और “सभी भूतों में एक ही देव सर्वव्यापी, गूढ़, सबका अंतरात्मा, कर्म का अध्यक्ष (साक्षी), सभी मे वास करने वाला, साक्षी, केवल जानने वाला, निर्गुण दोषरहित है। “वह सर्वव्यापक, दीप्तिमान, कार्यरहित, व्रणरहित और पाप से अस्पृष्ट है। ये दोनों मंत्र दर्शाते हैं कि ब्रह्म मे किसी अतिशय (extreme, either positive or negative) का प्रवेश नहीं है (अर्थात्, कुछ भी ब्रह्म से श्रेष्ठ या तुच्छ नहीं है) और वह नित्य शुद्ध है। मोक्ष तो ब्रह्म रूप है इसलिए संस्कार्य नहीं है। और इन चार के अलावा (उत्पाद्य, प्राप्य, विकार्य, संस्कार्य) अन्य किसी भी प्रकार से मोक्ष का क्रिया के साथ संबंध दिखाना संभव ही नहीं है। इसलिए, मोक्ष में ज्ञान के सिवा क्रिया से लेश मात्र भी संबंध नही बनता।

पू ॰ –पर ज्ञान भी तो एक तरह की मानसिक क्रिया ही है।

सि ॰ – नहीं। क्योंकि ज्ञान क्रिया से भिन्न है। क्रिया वह है जो पुरुष के संकल्प के अधीन है तथा जिसका विधान (injunction) वस्तु के स्वरूप से निरपेक्ष हो। जैसे कि “पुजारी को उस देवता का ध्यान करना चाहिए जिसके लिए हवि ग्रहण की गयी” “संध्या का मन से ध्यान करे” इनमे और अन्य स्थानो में क्रिया का विधान है। ध्यान अर्थात् चिंतन यद्यपि मानसिक है, फिर भी पुरुष अपने अधीन होने से करने, न करने, अन्यथा करने के लिए स्वतंत्र है। पर ज्ञान तो प्रमाणजन्य (प्रत्यक्ष, अनुमान आदि) है। और प्रमाण तो वस्तु के यथार्थ स्वरूप को ग्रहण करता है। अतः ज्ञान वस्तु के अधीन होने के कारण करने, ना करने, अन्यथा करने के योग्य नहीं। ज्ञान विधि के अधीन नहीं, पुरुष के अधीन भी नहीं। अतः ज्ञान के मानसिक होने पर भी ध्यान से उसका बड़ा भेद है। जैसे कि, “हे गौतम! पुरुष अग्नि है” “हे गौतम! स्त्री अग्नि है” इनमें पुरुष और स्त्री में अग्नि की बुद्धि मानसिक है। वह विधि से जन्य होने के कारण क्रिया है और पुरुष के अधीन है। पर प्रसिद्ध अग्नि में जो अग्निबुद्धि होती है, वह न विधि के अधीन है न ही पुरुष के, वह तो प्रत्यक्ष दिखाई देने वाली अग्नि के अधीन है। अत: वह ज्ञान ही है, क्रिया नहीं। इसी प्रकार अन्य प्रमाण, जैसे कि अनुमान आदि, के बारे मे समझना चाहिए। अत: ज्ञान विधेय (विधि से सम्बद्ध) नही है, ऐसा सिद्ध है, तो फिर ब्रह्मात्मविषयक ज्ञान भी विधि के अधीन नहीं है। यद्यपि ज्ञान के साथ आज्ञा सूचक क्रिया (वेदान्त में) दीखती है, पर वे पत्थर पर गिरे अस्त्र कि धार के समान कुंठित है क्योंकि उनका उद्देश्य वह है जो मानव कि पहुँच के बाहर है क्योंकि उस ज्ञान का उद्देश्य (ब्रह्म) ना तो हेय (स्वीकार्य) है न ही उपादेय (अस्वीकार्य)।

पू ॰ – फिर “आत्मा का दर्शन करना चाहिए, श्रवण करना चाहिये” इत्यादि विधि के समान वाक्यों का क्या अर्थ है?

सि ॰ – विषय में मनुष्य की जो स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, उससे उसे विमुख करना ही इनका उद्देश्य है। जो पुरुष बाह्य विषयों में ‘इष्ट वस्तु मुझे प्राप्त हो, अनिष्ट न प्राप्त हो’ इस प्रकार बहिर्मुख हो प्रवृत्त होता है, वह उन विषयों से परम पुरुषार्थ (मोक्ष) प्राप्त नहीं कर सकता। उस परम पुरुषार्थ की इच्छा वाले को “आत्मा का दर्शन करना चाहिए” इत्यादि वाक्य शरीर और इंद्रिय समूह की स्वाभाविक प्रवृत्ति के विषय शब्द आदि से हटा कर उसकी चित्त वृत्ति के प्रवाह को प्रत्यगात्मा की तरफ प्रवृत्त करते हैं। आत्मस्वरूप के अन्वेषण मे प्रवृत्त हुये उस पुरुष को “यह सब कुछ आत्मा ही है” “परंतु जब उसके लिए सब आत्मरूप हो गया तब वह किससे किसको देखे और किससे किसको जाने” “जो जाननेवाला है, उसे किससे जाना जाय” “यह आत्मा ब्रह्म है” इत्यादि श्रुतियाँ अहेय और अनुपादेय आत्मतत्व का उपदेश करती हैं। आत्मज्ञान होने पर कर्तव्य कर्म कुछ शेष नही रह जाता, इसलिए आत्मज्ञान से कुछ ग्रहण या त्याग नहीं होता, ऐसा जो संशय है, वह ठीक है, हम उसका अंगीकार करते हैं। ब्रह्म और आत्मा के ऐक्य का ज्ञान होने पर कर्तव्य कर्म का नाश हो जाता है और कृतकृत्यता होती है, यह हमारे लिए (वेदांतियों) भूषण है। इस बारे में “’यह आत्मा मैं हूँ’ ऐसा जो पुरुष जान लेता है, वह किस इच्छा से तथा किसके लिए शरीर से संतप्त हो” यह श्रुति तथा “हे अर्जुन, इसे जानकर बुद्धिमान बनो तथा कृतकृत्य हो जाओ” यह स्मृति है। इस कारण उपासना की विधि के विषय के रूप से ब्रह्म का बोध नहीं है।

कुछ लोग ऐसा कहते हैं (प्रभाकर) कि प्रवृत्ति विधि (injunction), निवृत्ति विधि (prohibition) और उनके अंग (subsidiary) को छोडकर केवल वस्तु का प्रतिपादन करने वाला कोई वेदभाग नहीं है। यह सही नही, क्योंकि उपनिषद से ज्ञेय पुरुष किसी अन्य का शेष (subsidiary) नहीं हो सकता। यह नहीं कहा जा सकता कि ब्रह्म नहीं है या फिर न ही इसे अनुभव किया जा सकता है, क्योंकि केवल उपनिषदों से ही ज्ञात जो असंसारी पुरुष ब्रह्म उत्पाद्य आदि चार विकारों से अलग है और अपने ही संदर्भ मे स्थित है और इसलिए किसी अन्य का अंग नहीं; क्योंकि “नेति, नेति इस प्रकार जो आत्मा उपदिष्ट है, वह यह है” इस श्रुति मे आत्मशब्द है, अतः आत्मा का निषेध नहीं किया जा सकता क्योंकि निषेधकर्ता का भी आत्मा वही है।

पू ॰ – आत्मा “मैं” प्रत्यय का विषय है, इसलिए यह आत्मा सिर्फ उपनिषद् से ही जानी जाती है, यह कथन तो अयुक्त हुआ न?

सि ॰ – नहीं। क्योंकि बताया गया कि आत्मा उसका भी साक्षी है। “मैं” इस प्रत्यय का विषय जो कर्ता है, उससे भिन्न उसका साक्षी, सभी भूतों मे स्थित, सम, एक, कूटस्थ, नित्य, विधिकांड (कर्मकांड) और तर्कशास्त्र मे किसी से जाना नहीं गया है। इसलिए इस आत्मा का निषेध नहीं किया जा सकता और न ही उसे विधि वाक्यों का अंग बताया जा सकता है। चूँकि वह सबका आत्मा है, इसलिए न हेय है न उपादेय है। पुरुष को छोडकर अन्य सभी विकारी पदार्थ विनाशी हैं। पुरुष तो विनाश के कारण के न होने से अविनाशी है, क्रिया के कारण के न होने से कूटस्थ नित्य है, इसलिए नित्यशुद्धबुद्धमुक्त स्वभाव है। इसलिए “पुरुष से परे कुछ भी नहीं, वह सबकी काष्ठा और परम गति है”। “उस उपनिषद् गम्य पुरुष को पूछता हूँ” इस श्रुति में पुरुष का विशेषण “औपनिषदम्”, उपनिषदों से ही पुरुष का प्रधानतया ज्ञान होता है, ऐसा मानने से उत्पन्न होता है। इसलिए वेदभाग सिद्ध वस्तु को नहीं बताता, यह कथन साहसमात्र है।

जहां तक शास्त्रतात्पर्यविदों का कथन है “कर्म का बोध करने में उनका उपयोग है” इत्यादि, चूँकि ये धर्म जिज्ञासा का विषय हैं इसलिए उन्हें विधि और निषेध शास्त्र के संबंध में समझना चाहिए। और “वेद क्रियार्थक हैं, अतः अक्रियार्थक वाक्य अर्थहीन हैं” इस वाक्य को ध्रुव सत्य मानने वालों के लिए सिद्ध वस्तुओं के बारे में दिये गए सारे उपदेश अर्थहीन होंगे। यदि प्रवृत्ति विधि और निवृत्ति विधि से अलग सिद्ध वस्तु ,धर्म के लिये उपयोगी होने के कारण, शास्त्र उपदेश करता है, तो कूटस्थ नित्य सिद्ध वस्तु का उपदेश क्यों नहीं करेगा? केवल उपदिष्ट होने से ही तो सिद्ध वस्तु क्रिया नहीं हो जाती॰

पू ॰ – यद्यपि सिद्ध वस्तु क्रिया नहीं है, पर वस्तु के बारे में उपदेश क्रिया के लिए ही तो है। इस प्रकार यह क्रिया का साधन बन जाता है।

सि ॰ – नहीं, क्योंकि जब वस्तु क्रिया के लिए प्रस्तुत की जाती है तबभी उपदिष्ट वस्तु के पास क्रिया की सहायता की शक्ति होती है। वह क्रिया का अंग बन जा सकती है। पर यह नहीं कहा जा सकता है कि सिद्ध वस्तु अनुपदिष्ट है।

पू ॰ – सिद्ध वस्तु का उपदेश होता भी हो, तो तुमको क्या लाभ होगा?

सि ॰ – (दधि आदि पदार्थों की तरह) अज्ञात आत्मवस्तु का उपदेश होना ठीक ही है। उसके ज्ञान से संसार के कारणभूत मिथ्या अज्ञान का नाश होता है। इस कारण इसकी उपयोगिता क्रिया के सहायक वस्तुओं के उपदेश की उपयोगिता के समतुल्य ही है। “ब्राह्मण का हनन नहीं करना चाहिए” इत्यादि निवृत्ति का उपदेश है, जो न तो क्रिया है न ही हरिया का साधन है। यदि अक्रियार्थक वाक्य अर्थहीन होते, तो उपरोक्त वाक्य अर्थहीन हो जाएगा। वह तो अनीष्ट होगा। ‘न’ का धातु ‘हन्’ के संयोग से प्राप्त अर्थ एक क्रियाहीनता (औदासीन्य) है जो मारने की क्रिया, जो कि रागत: उत्पन्न हो, से निवृत्त करता हो। इस अर्थ से भिन्न किसी और अर्थ की यहाँ कल्पना नहीं की जा सकती। ‘न’ का तो स्वभाव ही सम्बद्ध वस्तु के अभाव का बोध कराना है। इस अभाव का बोध क्रियाहीनता का कारण है। और यह अभावबुद्धि राग का नाश (destroying the natural proclivity to kill) कर स्वयं नष्ट हो जाती है, जैसे कि लकड़ी को जलाकर अग्नि स्वयं बुझ जाती है। इसलिए, हम ऐसा समझते हैं कि “प्रजापति की प्रतिज्ञा” इत्यादि को छोडकर अन्य निषेध वाक्यों का अर्थ क्रियाहीनता है जो क्रिया के लिए प्रेरित उद्वेग से विमुख करता है। इसलिए “अक्रियार्थक वाक्य अर्थहीन हैं” यहाँ अर्थहीनता अर्थवाद (corroborative statements), जैसे कि पौराणिक कथाओं से, जो कि किसी पुरुषार्थ की प्राप्ति नही कराते, के लिए है। और यद्यपि यह संशय था कि क्रिया के बारे में विधि जिन वाक्यों मे न हो वे निरर्थक होंगे जैसा कि “सात द्वीपों वाली पृथ्वी”, पर उस संशय का निराकरन कर दिया गया क्योंकि “यह रस्सी है साँप नहीं” इत्यादि वाक्यों की उपयोगिता प्रमाणित है।

पू ॰ – जिसने ब्रह्म के बारे मे सुना है उसमें भी पहले के समान सांसारिकता रहती है, इसलिए रस्सी के स्वरूप के समान ब्रह्म स्वरूप का कथन सार्थक नहीं है।

सि ॰ – इसका उत्तर ऐसा है- जिसको ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसा अनुभव हुआ है, उसमें पहले के समान संसारित्व है, यह नहीं सिद्ध कर सकते, क्योंकि वेदप्रमाण से उत्पन्न ब्रह्मात्मभाव का सांसारित्व से विरोध है। शरीर आदि मे आत्मबुद्धि रखने वाले पुरुष मे दुख, भय आदि देखने में आते हैं। टीपी वेदप्रमाण से उत्पन्न ‘ब्रह्म आत्मा है’ इस ज्ञान का अनुभव होने पर उस आत्मबुद्धि के हटने पर मिथ्याज्ञान से उत्पन्न होने वाले दुख, भय उसमे हो सकते हैं, ऐसी कल्पना नही की जा सकती। यह धन मेरा है, ऐसा अभिमान करने वाले धनी गृहस्थ को उस धन की चोरी से दुखी होना देखा जाता है, पर यदि वही पुरुष संसार का त्याग कर धन मे अभिमान छोड़ दे, तो उसे धन की चोरी से होने वाला दुख नही होता। इसी प्रकार कुंडल पहननेवाले में ‘मैंने कुंडल पहने हैं’ इस अभिमान से उत     पणन होनेवाला सुख देखा जाता है, पर यदि वही पुरुष कुंडलरहित हो जाए या उसे कुंडलत्व का अभिमान न रहे तो ‘कुंडल पहने हैं’ इस अभिमान से होनेवाला वही सुख उसे नही होता। यही बात “अशरीर को प्रिय और अप्रिय स्पर्श नही करते” इस श्रुति मे भी कही गयी है। शरीर के नष्ट होने पर ही अशरीरत्व होता है, जीते जी नही हो सकता, यह कहना ठीक नही। क्योंकि सशरीरत्व तो मिथ्या अज्ञान के कारण है। ‘शरीर ही मैं हूँ’ इस अभिमान रूप मिथ्या अज्ञान को छोड़ अन्य किसी कारण से आत्मा में सशरीरत्व की कल्पना नही की जा सकती। कोई कर्म इसका कारण नही है, इसलिए अशरीरत्व नित्य है, ऐसा तो हम कह ही चुके हैं।

पू ॰ – आत्मा द्वारा किए गए धर्म और अधर्म से सशरीरत्व प्राप्त होता है न?

सि ॰ – नही। चूँकि आत्मा का शरीर के साथ संबंध असिद्ध है, इसलिए धर्म या अधर्म आत्मा द्वारा किए गए हैं, यह बात असिद्ध है। आत्मा और शरीर के संबंध के कारण धर्म और अधर्म की उत्पत्ति तथा धर्म और अधर्म के कारण शरीर और आत्मा के संबंध की उत्पत्ति एक अन्योन्याश्रय (circular argument) होगा। और यह माने कि इनका परस्पर कार्य कारण भाव अनादि है तो वह भी अंध परंपरा होगी। आत्मा कभी कर्ता नहीं हो सकती क्योंकि उसका तो क्रिया के साथ कोई संबंध ही नहीं है।

पू ॰ – पर क्या राजा मे कर्मचारियों से सन्निधि मात्र से (निकटता) कर्तृत्व नहीं होता?

सि ॰ – नहीं। राजा के कर्तृत्व होना युक्त है क्योंकि राजा और कर्मचारियों मे धन देने के कारण संबंध है। पर ऐसे किसी कारण की आत्मा का शरीर के साथ कारण की कल्पना नहीं की जा सकती। लेकिन मिथ्या अभिमान तो संबंध का प्रत्यक्ष कारण है। इस प्रकार यह भी सिद्ध हुआ कि आत्मा किस प्रकार sacrificer है (अर्थात जब तक मिथ्या अभिमानत्व है)।

पू ॰ – इस बारे में, (प्रभाकर) कहते हैं कि आत्मा का अपने से भिन्न शरीर में अभिमान, गौण है न कि मिथ्या।

सि ॰ – नहीं। यह बात तो प्रसिद्ध है कि गौण- मुख्य ज्ञान तो उसी को होता है जिसे दो वस्तुओं के बीच का अंतर ज्ञात हो। जिस व्यक्ति को, जैसे अयाल आदि से युक्त सिंह शब्द और प्रत्यय (ज्ञान) और उससे भिन्न क्रूरता शूरता आदि सिंह के गुणों से युक्त पुरुष भी ज्ञात है, उस व्यक्ति को सिंहगुणसमपन्न व्यक्ति में होनेवाला सिंहशब्द और सिंह ज्ञान गौण होते हैं। पर जिसे वस्तुओं का भेद ज्ञात नहीं, उसे नहीं। ऐसे व्यक्ति को तो यह अज्ञान से ही होता है। मंद अंधकार में, ‘यह स्थाणु है’ इस ज्ञान के अभाव में, पुरुष शब्द और प्रत्यय (ज्ञान) स्थाणु में होते हैं, और जैसे शुक्ति में ‘यह रजत है’ यह शब्द और प्रत्यय निश्चित होते हैं, उसी प्रकार शरीर में ‘मैं’ ऐसा शब्द और प्रत्यय आत्मा और अनात्मा के विवेक के न होने से होता है, उसे गौण कैसे कहा जाए। ऐसा देखा जाता है आत्मा और अनात्मा के विवेक को जानने वाले पंडित जन भी, सामान्य गड़ेड़ियों कि तरह, शब्द और प्रत्यय का ऐसा प्रयोग करते हैं जो शरीर और आत्मा को एक ही कर देता है। इसलिए, आत्मा को देह से भिन्न मनाने वालों का शरीर मे होनेवाला ‘मैं’ प्रत्यय (ज्ञान) मिथ्या है, गौण नहीं।

इससे यह सिद्ध हुआ कि सशरीरत्व मिथ्या प्रत्यय से होता है, अत: ज्ञानी को जीते जी अशरीरत्व प्राप्त होता है। ब्रह्मज्ञानी के संबंध में, ‘जिस प्रकार ऐसी सर्प कि त्वचा वल्मीक में फेंकी हुई पड़ी रहती है, उसी प्रकार विद्वान् ने जिसमें अभिमान त्याग दिया है, वह शरीर पड़ा रहता है’। वह अशरीर है, मरण रहित है, प्राण है, ब्रह्म है, स्वयंप्रकाश है और “नेत्ररहित होता हुआ भी नेत्रसहित के समान आदि” यह श्रुति भी है। स्मृति भी स्थितप्रज्ञ का लक्षण कहती हुई यही दिखलाती हैं कि विद्वान् का प्रवृत्ति के साथ कोई संबंध नही है। इसलिए ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसा जिसने अनुभव किया है, वह पहले के समान संसारी नहीं रहता। जो पूर्वा के समान संसारी है, उसे ब्रह्मात्मभाव का अनुभव नाही किया, यह समझना चाहिए।

पूर्वपक्षी ने जो यह कहा था कि श्रवण के बाद मनन और निदिध्यासन के आने से यह सिद्ध है कि ब्रह्म विधि का अंग है तथा ब्रह्मज्ञान ब्रह्मस्वरूप के अनुभव के लिए नहीं है, यह सही नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि श्रवण के ही समान मनन और निदिध्यासन भी ब्रह्म के अनुभव के लिय हैं। यदि ब्रह्म किसी और स्रोत से जानकार किसी और कर्म मे प्रयुक्त होता तो यह विधि का अंग बन सकता था। लेकिन ऐसा तो है नहीं। इसलिए ब्रह्म किसी उपासना की विधि के अंग के रूप मेंशास्त्र से ज्ञात नही है। इसलिए यह सिद्ध है कि ब्रह्म एक स्वतंत्र वस्तु की तरह शास्त्र मे ज्ञात है क्योंकि तभी वेदांतवाक्यों का समन्वय होता है। ऐसा होने से ही ‘अथातो॰’ करके इस ब्रहविषयक पृथक् शास्त्र का होना युक्त है। यदि उपासना की विधि का विषय होता तो ‘अथातो धर्म जिज्ञासा’ ऐसा शास्त्र होने के कारण पृथक् शास्त्र का आरंभ न होता। यदि होता भी तो ‘अब क्रतु अर्थ और पुरुषार्थ कि जिज्ञासा’ की तरह ‘अब बचे हुये धर्म की जिज्ञासा की तरह’ इस प्रकार आरंभ होता (न कि ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ की तरह)। ब्रह्म और आत्मा के एवेत्व के अनुभव की प्रतिज्ञा पूर्वमीमांसा मे नहीं है, इससे उसके लिए ‘अथातो ब्रहमजिज्ञासा’ इस प्रकार नए शास्त्र का आरंभ युक्त है।

इसलिए ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसा ज्ञान होने तक ही सब विधि और अन्य प्रमाण हैं। क्योंकि हेय और उपादेय से रहित अद्वैत आत्मतत्व का ज्ञान होने पर प्रमाण, जिनका न तो कोई विषय है न ही कोई प्रमाता, ही नही हो सकते। और कहते हैं-“ ‘सत् ब्रह्म मैं हूँ’, ऐसा बोध होने पर पुत्र देह आदि का बाध होता है और गौण और मिथ्या आत्मा असत् होते हैं, तो फिर कोई भी व्यवहार कैसे हो सकता है?” “जिस आत्मा का ज्ञान करना है उसके पहले आत्मा प्रमाता बन सकता है, प्रमाता के स्वरूप का ज्ञान होने पर वही पापरहित हो जाता है” “जिस प्रकार ‘मैं देह हूँ’ यह प्रत्यय (ज्ञान) कल्पित होने पर भी प्रमाण माना जाता है, उसी प्रकार प्रत्यक्ष आदि लौकिक प्रमाण भी आत्मज्ञान होने तक ही प्रमाण हैं”।

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