Brahm Sutra

Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.1.5 to 1.1.11 – First Cause was Conscious

1.1.5

ईक्षतेर्नाशब्दम्

इस प्रकार यह कहा गया कि ब्रह्मात्म अवगति ही वेदान्त वाक्यों का प्रयोजन है और अच्छी तरह समझने के उपरांत वेदान्त वाक्यों का तात्पर्य ब्रह्म, जो कि आत्मा है, है। और वेदान्त वाक्यों का पर्यवसान (culmination) भी, क्रिया से असम्बद्ध रहते हुये, ब्रह्म में ही है। ऐसा भी कहा गया कि ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् तथा जगत् के उत्पत्ति, स्थिति और लय का कारण है। पर सांख्य और अन्य लोग कहते हैं कि एक परिनिष्ठित (pre-exisisting) वस्तु अन्य प्रमाण के द्वारा (वेदान्त से अलग) भी जानी जा सकती है। प्रधान आदि (अणु आदि) को कारण मान कर वे वेदान्त वाक्यों को इन्ही की ओर प्रयोजित बताते हैं। वे समझते हैं कि सृष्टिविषयक वेदांतवाक्य कार्य (effect) के द्वारा कारण को अनुमान (inference) के द्वारा प्रदर्शित करते हैं। वे मानते हैं कि प्रधान और पुरुष का संयोग हमेशा ही अनुमान किया जा सकता है। काणाद (वैशेषिक) इन्ही वेदान्त वाक्यों से ईश्वर के निमित्त कारण और अणु के उपादान कारण होने का अनुमान करते हैं। और कुछ तार्किक भी वाक्याभास (garbled quotations) और युक्त्याभास (sophistry) का सहारा लेकर पूर्वपक्ष में आते हैं। इसलिए पदवाक्य प्रमाण के ज्ञाता आचार्य (बादरायण)के द्वारा, वेदांतवाक्यों की ब्रह्मात्मावगति प्रयोजन प्रदर्शित करने के लिए, वाक्याभास और युक्त्याभास को पूर्वपक्ष में रख कर उनका निराकरण किया जाता है।

सांख्यों के द्वारा प्रधान, जो कि त्रिगुणात्मक, अचेतन और स्वतंत्र है, वह जगत् का कारण माना जाता है। वे कहते हैं कि – जो वेदान्त वाक्य तुम्हारे (वेदांती) अनुसार एक सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् जगत्कारण ब्रह्म के बारे में बताते हैं, वे ही वेदान्तवाक्य तो समान रूप से प्रधान के जगत्कारणत्व का प्रदर्शन करते हुये समझे जा सकते हैं। जहाँ तक सर्वशक्तिमतत्व का प्रश्न है, वह तो प्रधान का अपने विकारों के प्रति है ही, और इसी प्रकार सर्वज्ञत्व भी।

कैसे?

सांख्य: जिसे तुम ज्ञान मानते हो, वह तो सत्त्व का धर्म है ‘सत्त्वात् संजायते ज्ञानम्’ इस स्मृति के अनुसार। उसी सत्त्व के धर्म ज्ञान के द्वारा शरीर और इंद्रियों से युक्त योगी पुरुष सर्वज्ञ के रूप में प्रसिद्ध हैं। यह भी प्रसिद्ध है कि सत्त्व की उच्चतम पूर्णता सर्वज्ञत्व है। क्योंकि केवल उपलब्धि मात्र (चेतना मात्र), शरीर और इंद्रियों से हीन, पुरुष के सर्वज्ञत्व या किंचित्ज्ञत्व की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है। लेकिन त्रिगुणात्मक प्रधान के पास तो प्रधान अवस्था में भी (साम्य अवस्था में भी) सभी ज्ञान का कारण सत्त्व है, इसी कारण से वेदान्त वाक्यों में अचेतन होने पर भी प्रधान में गौण रूप से सर्वज्ञत्व कहा जाता है। जब तुम ब्रह्म के सर्वज्ञत्व की बात करते हो, तो तुम्हें भी यह स्वीकार करना होगा कि उसे सर्वज्ञ सर्वज्ञानशक्तिमान होने के कारण कहते हैं (i.e. Brahman has potential to know everything)। क्योंकि ऐसा तो है नहीं कि ब्रह्म हर काल में, सभी वस्तुओं को जानता हुआ वर्तता है। अगर ऐसा मानें कि ब्रह्म का ज्ञान नित्य है तो फिर ब्रह्म की ज्ञानक्रिया (act of knowing) के प्रति स्वतन्त्रता बाधित हो जाएगी। इसके विपरीत अगर ज्ञानक्रिया अनित्य हो तो ज्ञानक्रिया का उपराम (cease) होने पर ब्रह्म भी नहीं रह पाएगा (cease to exist)। इसलिए सर्वज्ञानशक्तिमान् होने के कारण सर्वज्ञ कहते हैं – ऐसा निष्कर्ष है। पर तुम यह कहते हो कि उत्पत्ति के पूर्व (before creation) ब्रह्म सर्वकारकशून्य है (devoid of accessory)। ज्ञानसाधन शरीर और इंद्रियों के अभाव में भी किसी को ज्ञानोत्पत्ति हो, यह अयुक्त है। पर प्रधान के लिए तो विकार (परिणाम) संभव है क्योंकि वह अनेकात्मक (composite) है और मृदा आदि की तरह उपादान कारण बन सकता है; पर एकात्मक और असंहत (uniform) होने के कारण ब्रह्म में कोई विकार हो ही नहीं सकता।

सि – तुम्हारे इन कथनों के उत्तर में यह सूत्र है –   ईक्षतेर्नाशब्दम् – “प्रधान जगत्कारण नही है क्योंकि ईक्षण से यह स्पष्ट है कि प्रधान का वेदान्तवाक्यों में कहीं उल्लेख नहीं है” –

वेदान्त के आधार पर सांख्य परिकल्पित अचेतन प्रधान जगत्कारण नहीं हो सकता है। क्योंकि वेदान्त में तो यह अशब्द है अर्थात् अनुल्लिखित है।

अशब्द कैसे है?

ईक्षण के कारण।

कैसे?

वेदान्त में ‘सदेव सोम्य इदम् अग्र आसीत् एकम् एव अद्वितीयम्’ से आरंभ कर ‘तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजो असृजत्’ है। यहाँ इदम् शब्द का अर्थ नामरूपव्याकृत जगत् है जो कि उत्पत्ति के पूर्व सत् ही था ऐसा समझ कर उस सत् शब्द का वाच्य ही ईक्षण, जो कि सृष्टित्व और तेज:प्रभृति के पहले है, करता है, ऐसा श्रुति दिखलाती है। अन्यत्र भी ‘आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्। नान्यत्किंचन मिषत्। स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति। स इमान् लोकान् असृजत्’ श्रुति ईक्षण के उपरांत ही सृष्टित्व कहती है। अन्यत्र भी श्रुति षोडशकल पुरुष की प्रस्तुति के बाद कहती है ‘उसने ईक्षण किया। उसने प्राण का सृजन किया’ यहाँ ‘यजति’ के समान ही ‘ईक्षति’ का प्रयोग संज्ञा के लिए किया गया है न कि धातु के अर्थ में। इसके फलस्वरूप अग्रांकित श्रुति के द्वारा सर्वज्ञ ईश्वर को ‘पर कारण’ कहा जा सकता है – ‘उससे, जो सामान्य रूप से सर्वज्ञ है तथा विशेष रूप से जिसका तप ज्ञानमय है, यह ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) तथा नाम, रूप तथा अन्न उत्पन्न हुये’।

तुमने यह जो कहा कि सत्त्व के धर्म ज्ञान के द्वारा प्रधान सर्वज्ञ होता है, यह अयुक्त है। क्योंकि प्रधान अवस्था में गुण साम्यता के कारण सत्त्व का धर्म ज्ञान तो संभव ही नहीं है। यदि कहो कि सर्वज्ञानशक्तिमान् होने के कारण प्रधान सर्वज्ञ है, तो यह भी अयुक्त है क्योंकि अगर गुण साम्यावस्था में सत्त्व पर आश्रित ज्ञानशक्ति के कारण प्रधान को सर्वज्ञ कहते हो तो रज और तम पर आश्रित ज्ञानप्रतिबंधकशक्ति के कारण प्रधान को किंचित्ज्ञ भी कह सकते हैं। तथा जब तक साक्षी (आत्मा) न हो तब तक सत्त्व की कोई भी वृत्ति (modification in sattva) ज्ञान नहीं कही जा सकती। और अचेतन प्रधान के पास साक्षित्व तो है नहीं। इसलिए प्रधान का सर्वज्ञत्व तो अयुक्त है। जहां तक योगियों का प्रश्न है तो वे तो चेतन हैं तथा इस कारण सत्त्व के उत्कर्ष के कारण सर्वज्ञ होते हैं, इसलिए योगियों के सर्वज्ञत्व का उदाहरण नहीं दिया जा सकता। अगर साक्षी की उपस्थिति के कारण प्रधान में इक्षितृत्व की कल्पना करते हो, जैसे कि अग्निमय पिण्ड में दग्धृत्व,तो फिर वह जिसकी उपस्थिति के कारण प्रधान मे इक्षितृत्व की कल्पना करते हो, वह ब्रह्म सर्वज्ञ तथा जगत का कारण मुख्यत: है (गौणत: नहीं), यह मानना युक्त है। फिर यह जो कहते हो कि ब्रह्म मुख्यत: सर्वज्ञ नहीं है क्योंकि अगर ज्ञानक्रिया नित्य हो तो ज्ञानक्रिया के प्रति ब्रह्म की स्वतन्त्रता असंभव होगी; इसके उत्तर में यह कहते हैं कि आपसे यह पूछा जाना चाहिए “ज्ञानक्रिया के नित्य होने से सर्वज्ञत्व की हानि किस प्रकार होती है”। क्योंकि यह तो विरोधाभास होगा कि किसी के पास सभी विषयों को अवभासित करने वाला ज्ञान नित्य रूप से है पर वह सर्वज्ञ नहीं है। अगर ज्ञान अनित्य होता, तो कोई कभी जानता और कभी नहीं जानता, और इस प्रकार असर्वज्ञ भी कहा जा सकता है। लेकिन यह दोष ज्ञान के नित्यत्व होने पर नहीं होता है।

सांख्य – ज्ञान के नित्यत्व होने पर ज्ञानविषय से स्वातंत्र्य अयुक्त हो जाएगा (Brahm cannot remain if object of knowledge is not in existence)।

सि – नहीं। क्योंकि सूर्य के संदर्भ में, जिसमें नित्य उष्णता और प्रकाश होने पर भी ‘दहति’ ‘प्रकाशयति’आदि के द्वारा क्रिया का स्वातंत्र्य वर्णित है।

सांख्य – सूर्य के दाह्य और प्रकाश्य वस्तुओं के साथ संयोग होने पर ही ‘दहति’ ‘प्रकाशयति’ कहते हैं। पर उत्पत्ति के पूर्व ब्रह्म का ज्ञानकर्म (ऑब्जेक्ट ऑफ नॉलेज) के साथ संयोग ही नहीं है। इसलिए दृष्टांत विषम है।

सि – नहीं। कर्म (ऑब्जेक्ट) के न रहने पर भी ‘सविता प्रकाशते’ कह कर सूर्य मे कर्तृत्व का आरोप करते हैं। इसी प्रकार ज्ञानकर्म के न रहने पर भी ‘तदैक्षत’ कहकर ब्रह्म में कर्तृत्व का आरोप करें, तो भी विषम नहीं होगा। श्रुति में उद्धृत ब्रह्म का इक्षितृत्व और भी युक्त है यदि इसे (इक्षितृत्व को) कर्म की अपेक्षा माना जाए।

सांख्य – यह बताओ कि उत्पत्ति के पूर्व ईश्वर के ज्ञानविषयक कर्म कौन से हैं (objects which form the content of God’s knowledge)?

सि – अव्याकृत नाम और रूप जो कि व्यक्त होने वाले हैं तथा जिनके विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि वे ब्रह्म हैं या ब्रह्म नहीं हैं, वे अव्याकृत नामरूप उत्पत्ति के पूर्व ईश्वर के ज्ञानविषयक कर्म हैं। योगशास्त्रविद् कहते हैं कि जिसके प्रसाद से योगी अतीत और भविष्य का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करते हैं, उस नित्यसिद्ध ईश्वर को सृष्टि, स्थिति और संहृति का नित्यज्ञान है, यह कहने की तो कोई आवश्यकता ही नहीं है।

फिर यह जो कहा गया कि उत्पत्ति के पूर्व शरीरादि न होने के कारण ब्रह्म को इक्षितृत्व नहीं हो सकता, यह अयुक्त है। सूर्य और प्रकाश के समान ब्रह्म तो नित्यज्ञान स्वरूप है और इसलिए ब्रह्म को ज्ञानसाधन (शरीरादि) की अपेक्षा हो, यह अयुक्त है। और अविद्यावान् संसारी (जीव) को तो ज्ञानोत्पत्ति के लिए शरीरादि की अपेक्षा रहती है पर ईश्वर को नहीं क्योंकि वह ज्ञानप्रतिबंधकारणरहित है। अग्रांकित दो मंत्र भी दर्शाते हैं कि किस प्रकार ईश्वर का ज्ञान शरीरादि से अनपेक्षित तथा बिना किसी आवरण के है ‘उसके पास कार्य (शरीर) और करण (इंद्रिय) नहीं हैं, कोई भी उसके समान या उससे उत्कृष्ट नहीं है तथा वेद उसकी परा शक्ति और स्वाभाविक क्रिया जो ज्ञान बल से उत्पन्न है उसका वर्णन करते हैं’ (श्वे VI.8) ‘वह बिना हाथ, पैर, नेत्र और श्रवण के क्रमश: ग्रहण करता है, चलता है, देखता है और सुनता है। वह सभी वेद्य को जानता है पर उसे कोई नहीं जानता है। उसे प्रथम, महान तथा पुरुष कहते हैं’ (श्वे III.19)।

सांख्य – तुम्हारे मतानुसार तो ज्ञानप्रतिबंधकारणरहित ईश्वर के अलावा कोई संसारी तो है नहीं। श्रुति कहती है ‘उसके सिवा कोई साक्षी नहीं, कोई ज्ञाता नहीं’। फिर ऐसा क्यों कहते हो कि संसारी को ज्ञानोत्पत्ति के लिए शरीरादि की अपेक्षा है पर ईश्वर को नहीं।

सि – यहाँ कहते हैं – सत्य ही ईश्वर के सिवा कोई संसारी नहीं है। फिर भी जैसे घट, कर (jar) और गुहा आदि उपाधि का आकाश से संबंध देखा जाता है उसी प्रकार देह आदि उपाधि के साथ ईश्वर का संबंध कल्पित किया जाता है। फिर उसके द्वारा कृत घट छिद्र, कर छिद्र आदि शब्दप्रत्यय व्यवहार भी लोकदृष्ट है। यद्यपि आकाश के अतिरिक्त और कुछ नहीं (both spaces are one only), आकाश मे घातकश आदि भेद तो मिथ्याबुद्धि दृष्ट हैं। उसी प्रकार देहादि उपाधि संबंध जो अविवेककृत है, उससे ईश्वर संसारी भेद मिथ्याबुद्धिदृष्ट है। आत्मा तो जैसी पहले थी वैसी ही रहती है, पर पूर्वपूर्व के मिथ्याबुद्धि के कारण (series of errors) देहादि अनात्मा में आत्मा का अभिनिवेश (identification) देखा जाता है। ऐसा संसारित्व सिद्ध होने पर, संसारी का इक्षितृत्व के लिए देहादि की अपेक्षा होना युक्त है।

यह जो कहा कि प्रधान के अनेकात्मक होने के कारण मृदा आदि की तरह उसका उपादान कारण होना युक्त है पर असंहत ब्रह्म के लिए नहीं, तो वह तो प्रधान के अशब्द होने के कारण गलत सिद्ध हो चुका है। और तर्क के द्वारा किस प्रकार ब्रह्म का कारणत्व सिद्ध है, प्रधान का नहीं, यह ‘न विलक्षणत्वादस्य’ सूत्र मेन व्याख्या किया जाएगा।

सांख्य – वेद में इक्षितृत्व का प्रयोग होने के कारण यह जो कहते हो कि अचेतन प्रधान जगत्कारण नहीं है, वह अगर दूसरी दृष्टि से देखें तो युक्त है। सामान्य बातचीत में अचेतन वस्तु को लाक्षणिक रूप से (figuratively) चेतन कहा जाता है। जैसे कि यह अनुभूत है कि जब नदी का किनारा गिरने वाला होता है तो यह कहा जाता है ‘नदी का किनारा गिरने को है’ और इस प्रकार अचेतन किनारे में चेतना उपचरित होती है। उसी प्रकार प्रधान में, अचेतन होने पर भी, उत्पत्ति की आसन्नता (imminence) से, ‘इसने ईक्षण किया’ ऐसा कह कर चेतना का उपचार किया जाता है। जिस प्रकार सामान्य जीवन में कोई व्यक्ति ‘स्नान करके भोजन कर अपराह्न में रथ से ग्राम को जाऊँगा’ ऐसा ईक्षण कर बाद मे उसी क्रम में प्रवर्तित होता है, उसी प्रकार प्रधान भी महत् आदि के रूप में क्रम से प्रवर्तित होता है, इसलिए उसमें चेतना उपचरित होती है।

सि – लेकिन इक्षितृत्व का मुख्य भाव छोड़कर औपचारिक भाव किस कारण से कल्पना कर रहे हो?

सांख्य – क्योंकि अचेतन तेज और जल में चेतना का औपचारिक प्रयोग ‘तेज ने ईक्षण किया’ (छा. VI.ii.3) ‘जल ने ईक्षण किया’ (छा. VI.ii.4) आदि श्रुति में देखा गया है। इसलिए इन्ही औपचारिक प्रयोगों के संदर्भ में उद्धृत होने के कारण यह समझा जाना चाहिए कि सत् के लिए ‘ईक्षण’ का प्रयोग औपचारिक रूप से हुआ है।

सि – इसलिए यह सूत्र कहा जाता है – ‘गौणश्चेन्नात्मशब्दात्’ –

1.1.6

गौणश्चेन्नात्मशब्दात्

(अगर यह कहते हो कि ईक्षण गौण अर्थ में लिया गया है, तो ऐसा नहीं है क्योंकि आत्म शब्द का प्रयोग किया गया है)

यह जो कहते हो कि सत् शब्द का वाच्य प्रधान है और उसमें इक्षितृत्व औपचारिक रूप से तेज और जल की तरह प्रयुक्त है, तो यह कहना असत् है।

क्यों?

आत्म शब्द के कारण। ‘सोम्य! यह सब पहले सत् ही था’ (छा. VI.ii.1) से आरंभ कर तेज, जल और पृथ्वी की सृष्टि ‘उसने ईक्षण किया’ ‘उसने तेज का सृजन किया’ इन वाक्यों में कही गयी है। उसके बाद वही इक्षितृ (seer) सत् तथा अन्य तेज, जल तथा पृथ्वी ‘देवता’ शब्द के द्वारा उल्लिखित है – ‘वह इस देवता ने ईक्षण किया’ ‘अब मैं इन तीन देवताओं में जीव रूप द्वारा, जो मैं खुद हूँ, प्रवेश कर नाम रूप से व्याकृत होऊँ’ (छा VI.iii.2)। अगर अचेतन प्रधान की इक्षितृ के रूप मे गौण भाव से कल्पना की गयी होती तो प्रधान को ही ‘स इयम् देवता’ कह कर इंगित किया गया होता क्योंकि उसी का विषय चल रहा है। लेकिन अगर वैसा होता तो वह देवता (प्रधान) जीव को आत्म शब्द से नहीं कहता। जीव चेतन है, शरीराध्यक्ष है और प्राण का धारक है, ऐसा तो जीव शब्द के प्रयोग और विश्लेषण दोनों से ही सिद्ध है। तो वह जीव अचेतन प्रधान की आत्मा कैसे हो सकता है? क्योंकि ‘आत्मा हि नाम स्वरूपम्’, अब अचेतन प्रधान का स्वरूप चेतन जीव तो हो ही नहीं सकता। हाँ, अगर इक्षितृ से चेतन ब्रह्म मुख्य रूप से ही समझा जाय, तो उसका जीव के लिए आत्म शब्द का प्रयोग युक्त है। ऐसा ही इस श्रुति में ‘वह, जो यह अत्यंत सूक्ष्म है, वही इस सबका आत्मा है। वह सत्य है। वह आत्मा है। तुम वही हो, श्वेतकेतु!’ (छा VI.vii.8)। ‘स आत्मा’ ऐसा कहकर श्रुति सत् प्रस्तुत करती है जो अत्यंत सूक्ष्म आत्मा है और इस प्रकार सत् को आत्मा कहती है। और ‘तत् त्वम् असि श्वेतकेतु’ कहकर सत् को चेतन श्वेतकेतु की आत्मा के रूप में उपदेशित करती है। लेकिन तेज और जल के संदर्भ में ‘ईक्षण’ का प्रयोग गौण रूप से है क्योंकि वे विषय हैं तथा अचेतन हैं और नाम रूप की व्याकृति में प्रयोज्य हैं (factors used in manifestation of name and form)। और न आत्म शब्द का प्रयोग ही (तेज और जल के संदर्भ में) किया गया है कि ‘ईक्षण’ का अर्थ मुख्य रूप मे ले सकने की संभावना हो। इसलिए (तेज और जल के विषय में) इक्षितृत्व नदी के किनारे की तरह गौण रूप से प्रयुक्त है, यह उपपन्न है। या फिर तेज और जल के लिए भी इक्षितृत्व मुख्य रूप से कहा जा सकता है अगर यह प्रयोग सत् अधिष्ठान की अपेक्षा से देखा जाये। पर किसी भी प्रकार से, सत् के लिए इक्षितृत्व का प्रयोग गौण रूप से नहीं है क्योंकि आत्म शब्द का प्रयोग है, ऐसा युक्त है।

सांख्य – अचेतन होने पर भी प्रधान मे आत्म शब्द संभव है क्योंकि प्रधान आत्मा के लिए सबकुछ करता है। जैसे राजा का सभी काम करने वाले भृत्य में आत्म शब्द होता है ‘ममात्मा भद्रसेन’। जिस प्रकार कोई भृत्य राजा की संधि या विग्रह (peace or waging war) के द्वारा सेवा करता है उसी प्रकार प्रधान भी उस पुरुष आत्मा की सेवा उसके लिए भोग और अपवर्ग जुटा कर करता है। या फिर एक आत्म शब्द से चेतन और अचेतन दोनों समझा जा सकता है जैसा कि ‘भूतात्मा, इंद्रियात्मा’ आदि प्रयोगो से दर्शित है। और जैसे एक ही शब्द ज्योति: का प्रयोग यज्ञ और अग्नि दोनों के अर्थों में किया जाता है। तो फिर आत्म शब्द के प्रयोग से ‘ईक्षण करता है’ इसका प्रयोग गौण रूप में नहीं हुआ है, यह कैसे अनुमान किया?

इसके उत्तर में कहते हैं – तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् –

1.1.7

तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात्

([प्रधान आत्मा शब्द का अर्थ नहीं हो सकता] क्योंकि जो उसमें [आत्मा में] निष्ठावान् है उसके लिए मोक्ष का उपदेश है)

अचेतन प्रधान आत्म शब्द का आलंबन नहीं हो सकता है। अत्यंत सूक्ष्म सत् जो कि अध्ययन का विषय है, उसके बारे में ‘स आत्मा’ ‘तत् त्वम् असि श्वेतकेतु’ के द्वारा चेतन श्वेतकेतु को मोक्ष के लिए उसकी निष्ठा का उपदेश किया गया। इसके बाद मोक्ष का उपदेश किया गया ‘आचार्यवान् पुरुष जानता है। उसके लिए तो बस उतनी ही देर है जब तक उसे मोक्ष नहीं मिलता। फिर वह सत् से एक  हो जाता है’ (छा VI.xiv.2)। अगर शास्त्र ‘तत् असि’ कहकर ‘सत्’ शब्द से अचेतन प्रधान का ग्रहण करवाता होता अर्थात् चेतन मुमुक्षु संत को ‘तुम अचेतन हो’ ऐसा कहता होता तो फिर विपरीतवादी होने के कारण शास्त्र पुरुष के लिए अनर्थकारी तथा अप्रमाण हो जाता। लेकिन निर्दोष शास्त्र के अप्रमाणक होने की कल्पना करना युक्त नहीं है। यदि प्रमाणभूत शास्त्र अज्ञ मुमुक्षु को अचेतन अनात्मा, आत्मा है, ऐसा उपदेश करेंगे, तो वह तो (शास्त्र के प्रति अपनी) श्रद्धा के कारण अंधगोलांगगूल न्याय के द्वारा उस आत्म दृष्टि का परित्याग नहीं करेगा। और इस प्रकार वह अनात्मा के अलावा आत्मा को नहीं जान पाएगा तथा मोक्ष से हट कर वह अनर्थ को प्राप्त होगा। इसलिए जिस प्रकार स्वर्गादि की प्राप्ति के इच्छुक पुरुषों को अग्निहोत्र आदि सत्य साधनों का उपदेश है, उसी प्रकार आत्मा के लिए मुमुक्षु पुरुषों के लिए ‘स आत्मा तत् त्वम् असि श्वेतकेतु’ का सत्य उपदेश है, ऐसा कहना युक्त है। इस प्रकार सत्याभिसंध पुरुष (one holding on to truth) के लिए मोक्ष का उपदेश तप्तपरशुग्रहणमोक्ष दृष्टांत के द्वारा उपपन्न है। अन्यथा अगर सत् आत्मतत्व का उपदेश अमुख्य (गौण) रूप से होता तो वह केवल संपद् मात्र होता जैसा कि ‘मैं प्राण हूँ, इस प्रकार ध्यान करो’ (ऐ I.i.2.6)। संपद् मात्र होने से इस उपदेश का फल अनित्य होता तथा इसका मोक्षोपदेश होना उपपन्न नहीं होता। इसलिए अत्यंत सूक्ष्म आत्म शब्द सत् गौण रूप से प्रयुक्त नहीं है। ‘ममात्मा भदरसेन’ में आत्मशब्द का प्रयोग गौण रूप से होना उपपन्न है क्योंकि यहाँ भृत्य और स्वामी के बीच का भेद प्रत्यक्ष है। और अगर कहीं किसी शब्द का गौण रूप से प्रयोग हुआ है, तो भी यह तो न्याय सम्मत नहीं है कि किसी अन्य जगह, जहां केवल शब्द प्रमाण है, वहाँ गौण अर्थ की कल्पना की जाए क्योंकि उससे सर्वत्र अनाश्वास (losing faith everywhere) का प्रसंग उपस्थित हो जाएगा। और यह जो कहा कि आत्मशब्द का प्रयोग चेतन और अचेतन दोनों अर्थों में किया जा सकता है जैसे कि ज्योति: का प्रयोग क्रतु और ज्वलन दोनों के लिए होते है, यह कहना गलत है क्योंकि (एक ही संदर्भ में) एक ही शब्द का अनेकार्थ न्यायपूर्ण नहीं है। इसलिए, आत्मशब्द मुख्य रूप से चेतन विषय है और ‘भूतात्मा, इंद्रियात्मा’ में गौणरूप से चेतनत्व का उपचार करके (by ascribing consciousness) आत्मशब्द का प्रयोग है। अगर आत्मशब्द दो वस्तुओं मे समान रूप से हो तो आत्मशब्द से किसी एक वस्तु का इंगित होना तब तक संभव नहीं है जब तक कि कोई निर्धारक तत्व जैसे कि प्रकरण (context) या उपसर्ग आदि प्रस्तुत न हो। अब यहाँ अचेतन (प्रधान) के लिए कोई निश्चयात्मक कारण तो है नहीं। यहाँ प्रकृत (सब्जेक्ट मैटर) तो इक्षितृ सत् है और चेतन श्वेतकेतु भी संनिहित (नजदीक) है। इसलिए चेतन श्वेतकेतु की अचेतन आत्मा संभव ही नहीं है। इसलिए यह निश्चित है कि आत्मशब्द चेतनविषयक है। ज्योति: शब्द लौकिक प्रयोग में भी ‘वह जो ज्वलन करता है’ ऐसा समझा जाता है। पर अर्थवाद (eulogistic fancy) के द्वारा कल्पित ज्वलन सादृश्य के कारण इसका प्रयोग यज्ञ (क्रतु:) के लिए किया जाता है, इसलिए दृष्टांत विषम है। या फिर क्योंकि पूर्वसूत्र में आत्मशब्द का प्रयोग गौण (साधारण) रूप से होने की आशंका को निरस्त कर दिया गया है, इसलिए प्रधान जगत् का कारण नहीं है, इसका निराकरण करने के लिए एक स्वतंत्र कारण बताया गया है (ऐसे भी हम प्रस्तुत सूत्र की व्याख्या कर सकते हैं)। इसलिए, अचेतन प्रधान सत् शब्द वाच्य नहीं है।

अन्य और किस कारण से प्रधान सत् शब्द वाच्य नहीं है?

इसके लिए अगला सूत्र – हेयत्वावचनाच्च –

1.1.8

हेयत्वावचनाच्च

और (प्रधान परोक्ष रूप से भी नहीं कहा गया है) क्योंकि इसके हेयत्व की बात नहीं कही गयी है। 

यदि अनात्मा प्रधान ही सत् शब्द वाच्य होता तथा यही ‘स आत्मा तत् त्वम् असि’ में उपदिष्ट होता तो शास्त्र मुख्य आत्मा का उपदेश करने का इच्छुक होने के कारण

यदि अनात्मा प्रधान ही सत् शब्द वाच्य होता तथा यही ‘स आत्मा तत् त्वम् असि’ में उपदिष्ट होता तो शास्त्र मुख्य आत्मा का उपदेश करने का इच्छुक होने के कारण, प्रधान का हेयत्व (inferiority and hence rejectibility) अवश्य कहता, ताकि उसके (प्रधान के) श्रवण के उपरांत अनात्मग्य साधक उसी को आत्मा समझ प्रधान में ही निष्ठ न हो जाये। जैसे अरुंधती को दिखाने का इच्छुक पहले उसके समीप स्थित स्थूल तारक को ही अरुंधती अमुख्य रूप से कह कर ग्रहण करवाता है। फिर उसे त्याग कर अरुंधती को दिखाता है। उसी प्रकार यहाँ पर ‘न अयम् आत्मा इति’ कहा गया होता। पर ऐसा तो किया नही गया है। इसके जगह (छान्दोग्य उपनिषद् का) षष्ठ अध्याय सत् मात्र आत्म अवगति में निष्ठित होकर समाप्त हो जाता है। ‘च’ शब्द का उपयोग अतिरिक्त कारण के प्रदर्शन के लिए किया गया है कि प्रधान की कल्पना प्रतिज्ञा (assertion started with) से विरोध में है। अगर यह मान भी लिया जाए की शास्त्र में प्रधान के हेयत्व का वचन है तो भी प्रतिज्ञा (initial premise) के विरोध का प्रसंग उठता है। और वह प्रतिज्ञा यह है कि कारण के विज्ञान से सब कुछ (कार्य) का विज्ञान हो जाता है क्योंकि ‘क्या तुमने उस (वस्तु का, जो जानी जाती है केवल) उपदेश (के द्वारा) को पूछा है जिसके द्वारा अश्रुत श्रुत, अमत (unthought) मत तथा अविज्ञात विज्ञात हो जाता है; वह वस्तु केवल आदेश (उपदेश) से ही जानी जा सकती है; सौम्य, जिस प्रकार एक मृत्पिण्ड के विज्ञान से सभी मृण्मय पदार्थों विज्ञात हो जाते हैं क्योंकि विकार तो वाचारंभण और नाम मात्र ही हैं तथा केवल मृत्तिका ही सत्य है’ से प्रारम्भ कर ‘इस प्रकार सौम्य वह (सत्) आदेश से जाना जाता है’ वाक्य सुना जाता है।
अगर प्रधान, (तथाकथित) सत् जो कि सर्व भोग्य वर्ग का कारण है, हेय या अहेय वस्तु के रूप में विज्ञात हो भी जाए, तो भी भोक्तृ वर्ग (experiencer) का विज्ञान नहीं हो पायेगा क्योंकि भोक्तृ वर्ग तो प्रधान का विकार है ही नहीं। इसलिए, प्रधान सत् शब्द का वाच्य नहीं है।
और किस कारण से प्रधान सत् शब्द का वाच्य नहीं है?
(इसके लिए अगला सूत्र–स्वाप्ययात्)

1.1.9

स्वाप्ययात्

(जीव के अपनी आत्मा में विलय के कारण)

सत् शब्द वाच्य, जो कि कारण है, उसके बारे में श्रुति में यह सुना जाता है – ‘जब, इस प्रकार, पुरुष (सोते समय) ‘स्वपिति’ नाम होता है, तब, सौम्य, वह सत् से सम्पन्न हो जाता है, वह स्व (आत्मा) में अपित (विलीन) हो जाता है। इसलिए वे इसे ‘स्वपिति (सोता है)’ कहते हैं क्योंकि वह स्व में विलीन हो जाता है’ (छां VI.viii.1)। यह श्रुति पुरुष के लोकप्रसिद्ध स्वपिति नाम की व्युत्पत्ति बताती है। यहाँ ‘स्व’ शब्द के द्वारा आत्मा कहा गया है। यहाँ अर्थ यह है कि वह (पुरुष) सत् शब्द वाच्य में विलीन हो जाता है, वह वहाँ पहुँच जाता है। धातु ‘इ’ अगर ‘अपि’ उपसर्ग के बाद आए तो वह लय के अर्थ में होता है, यह तो प्रसिद्ध है और ‘प्रभवाप्ययौ’ शब्द में उत्पत्ति-प्रलय के प्रयोग से दीखता भी है। मन के प्रचार (manifestation) उपाधि विशेष से संबंध के कारण ग्रहण किए हुए इंद्रियों के विषयों के प्रभाव में जीव जब तक रहता है तब तक वह जाग्रत अवस्था में रहता है। उससे (जाग्रत अवस्था से) उत्पन्न विशिष्ट वासना के कारण जीव स्वप्न देखता है और मन शब्द वाच्य होता है। इन दोनों उपाधियों के शांत होने पर सुषुप्ति अवस्था में उपाधिकृत विशेषता के अभाव के कारण स्वात्मा में प्रलीन जैसा होता है और ‘स्व (आत्मा) में विलीन है’ कहा जाता है। जैसा कि श्रुति में हृदय शब्द के निर्वचन (derivation) से दर्शित है – वह आत्मा हृदय में है, यही इसकी व्युत्पत्ति है – हृदि अयम् ; इसलिए इसे हृदय कहा जाता है। या जैसा अशनाय, उदन्य शब्द की प्रवृत्ति के मूल से श्रुति दर्शाती है – ‘आप (जल) एव (ही) अशितम् (खाए हुये भोजन को) नयन्ते (पचाता है) (इस प्रकार, अशनाय जल को कहा जाता है)’ ‘तेज एव तत्पीतम् (drunk, उदक) नयते (dries up) (इस प्रकार, उदन्य तेज को कहा जाता है)’। इसी प्रकार, निर्वचन के द्वारा स्वपिति नाम का अर्थ दिखाया गया है ‘सत् शब्द वाच्य स्व आत्मा में (जीव) विलीन होता है’। चेतन आत्मा अचेतन प्रधान का स्वरूप नहीं हो सकता। अगर यह माना जाए कि आत्मीयता के कारण प्रधान ही ‘स्व’ शब्द के द्वारा कहा गया है तो भी चेतन का अचेतन में विलय विरुद्ध ही है। अन्य श्रुति ‘प्राज्ञ आत्मा के द्वारा पूर्णत: आच्छादित यह बाहर-अंदर कुछ भी नहीं जानता’ भी सुषुप्ति अवस्था में (जीव का) चेतन में विलय ही दर्शाती है। इसलिए जिसमें सभी चेतन विलीन होते हैं, वह चेतन सत् शब्द वाच्य जगत् का कारण है, प्रधान नहीं।

और किस कारण से प्रधान जगत्कारण नहीं है?

(इसके लिए अगला सूत्र – गतिसामान्यात् –)

1.1.10

गतिसामान्यात्

([सभी वेदांतों मे वर्णित] ज्ञान [चेतन ही जगत्कारण है] की समानता के कारण)

यदि तार्किकों की तरह वेदान्त में कारण (जगत्कारण) की भिन्न-भिन्न अवगति (comprehension) होती – कहीं चेतन ब्रह्म जगत्कारण होता, कहीं अचेतन प्रधान, कहीं अन्य कोई देव – तब शायद ‘श्रवण’ आदि के अर्थ की कल्पना प्रधान के कारणवाद (Pradhan is the cause) के समर्थन में की जा सकती होती। पर ऐसा तो है नहीं। सभी वेदान्त में चेतन की ही कारण के रूप में अवगति है। ‘जिस प्रकार जलती अग्नि से सभी दिशाओं में स्फुलिंग निकलते हैं, उसी प्रकार आत्मा से सभी प्राण निकलते हैं; प्राण से देवता (इंद्रियाँ) तथा देवताओं से लोक (sense objects)  निकलते है’ ‘उस आत्मा से, जो ऐसा है, आकाश उत्पन्न हुआ’ ‘आत्मा से ही यह सब आया’। ‘आत्मा से ही यह प्राण जन्मा’ ये सभी वेदान्त आत्मा का ही कारणत्व दर्शाते हैं। और यह कहा गया कि आत्म शब्द चेतन वचन है (आत्म शब्द चेतन वस्तु का संकेत करता है)। जिस प्रकार चक्षु आदि रूप आदि के बारे में समान ज्ञान देते हैं उसी प्रकार वेदान्त वाक्य भी, चेतन जगत्कारण है, इसके बारे में समान ज्ञान देते हैं (सभी वेदान्त एक ही बात कहते हैं कि चेतन जगत्कारण है) और यह वेदान्त की प्रामाणिकता का एक महान कारण है। इस प्रकार, ज्ञान में समानता के कारण सर्वज्ञ ब्रह्म जगत्कारण है।

और किस कारण से सर्वज्ञ ब्रह्म जगत्कारण है?

(इसके लिए अगला सूत्र – श्रुतत्वाच्च – ) 

1.1.11

श्रुतत्वाच्च

([ब्रह्म के] श्रुति में व्यक्त होने के कारण)

श्वेताश्वतर उपनिषद् के शब्दों में सर्वज्ञ ईश्वर जगत् का कारण है। सर्वज्ञ ईश्वर को प्रस्तुत कर, उपनिषद् कहता है – ‘वह कारण है। वह करणाधिप (master of senses) का भी शासक है। उसका कोई जनक नहीं। उसका कोई शासक नहीं’। इस प्रकार, सर्वज्ञ ब्रह्म जगत्कारण है, अचेतन प्रधान या कोई अन्य नहीं, यह सिद्ध है।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s