Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.1.12 to 1.1.19 – The Blissful One

1.1.12

आनन्दमयोऽभ्यासात्

पू – यह न्यायपूर्वक प्रतिपादित हुआ कि वेदांतवाक्य जो ‘जन्माद्यस्य यत:’ से आरंभ कर ‘श्रुतत्वाच्च’ तक सूत्रों के द्वारा उदाहृत हैं, वे सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् ईश्वर, जो जगत् के जन्मस्थितिलय का कारण है, का प्रतिपादन करते हैं। और यह कह कर कि सभी वेदांतों में गति (ज्ञान) समान है, यह व्याख्या की गयी कि सभी वेदान्त चेतन कारण वादी हैं (जगत् का कारण चेतन है)। तो फिर आगे के ग्रंथ का उत्थान (आरंभ) किस लिए है?

सि – (शास्त्र से) ब्रह्म दो रूपों में अवगत होता है। एक नाम-रूप-विकार-भेद-उपाधि-विशिष्ट ब्रह्म तथा दूसरा इसके विपरीत सर्वउपाधिविवर्जित ब्रह्म। ‘जब (सत्य) द्वैत जैसा होता है तो कोई किसी को देखता है, पर जब (ब्रह्मज्ञ के लिए) यह सब आत्मा हो जाता है तो कोई क्या देखे और कैसे देखे’ ‘जब अन्य को न देखता है, न सुनता है, न जानता है तो वह भूमा (अनंत) है, जब अन्य को देखता, सुनता और जानता है तो वह अल्प है, जो भूमा है वह अमृत है, जो अल्प है वह मर्त्य है’ ‘वह धीर सभी रूपों को रच कर, उन्हे नाम देकर (उनमे जीव रूप से प्रवेश कर), उन नामों को उच्चरित करता है’ ‘वह निष्कल, निष्क्रिय, शांत, निरवद्य, निरंजन, अमृत के लिए परम सेतु, वैसी अग्नि के समान जिसका ईंधन दग्ध हो, है’ ‘नेति नेति’ ‘यह न स्थूल है न अणु’ ‘कहीं न्यून है तो कहीं सम्पूर्ण’, आदि वाक्यों द्वारा सहस्रों प्रकार से विद्या और अविद्या के भेद के द्वारा ब्रह्म की द्विरूपता द्खते हैं। इस प्रकार, अविद्या अवस्था में ब्रह्म उपास्य और उपासक के द्वारा सामान्य व्यवहार मे आता है। इन ब्रह्म की उपासनाओं में कुछ अभ्युदय के लिए, तो कुछ क्रममुक्ति के लिए तो कुछ कर्मसमृद्धि के लिए होती हैं। वे उपासनाएं गुण और उपाधि के भेद के द्वारा भिन्न हैं। यद्यपि एक ही पर आत्मा, जो कि ईश्वर है, गुण विशेष से विशिष्ट उपास्य होता है, फिर भी गुण के आधार पर उपासना के फल भिन्न होते हैं (जैसे कि एक ही ईश्वर अगर सतोगुण के साथ पूजित हो और रजोगुण के साथ पूजित हो, तो फल भिन्न होंगे, यद्यपि एक ही ईश्वर उपासित हो रहा है), ‘उसे (आत्मा को) जिस जिस प्रकार से उपासना करो, वह (जीव) उस प्रकार का हो जाता है’ ‘इस लोक से जाने के बाद पुरुष वैसा हो जाता है जैसा उसने इस लोक मे चाहा था’ ‘गीता 8.6’। यद्यपि एक ही आत्मा सभी भूतों में, सभी स्थावर जंगम में गूढ रूप से है, फिर भी ‘जो आत्मा के आविस्तर (प्रकटतर – more pronounced) रूप की उपासना करता है, वह आत्मा को प्राप्त करता है’ इस वाक्य द्वारा नित्य एक रूप, कूटस्थ होने पर भी आत्मा के ऐश्वर्य और शक्ति में तारतम्य (gradation) देखा जाता है। ऐसा चित्त उपाधि के तारतम्य के कारण होता है (आत्मा के भेद के कारण नहीं)। स्मृति मे भी ‘गीता 10.41’के द्वारा यह विधान किया गया कि जहाँ भी विभूति का अतिशय है, वह ईश्वर रूप में उपास्य है। इसी प्रकार यहाँ भी, आदित्य मण्डल में हिरण्मय पुरुष पर (आत्मा) है ऐसा कहा जाएगा, क्योंकि (हिरण्मय पुरुष के) सर्व पाप रहित होने के कारण आत्मा का ही लक्षण कहा गया है। यही (व्याख्या का तरीका) ‘आकाशस्तल्लिङ्गात्’ आदि में भी द्रष्टव्य है। यद्यपि आत्म ज्ञान सद्य:मुक्ति (instantaneous liberation) देता है, फिर भी यह आत्म ज्ञान तो उपाधि विशेष के मदद के द्वारा ही दिया जाता है। इस प्रकार यद्यपि उपाधि विशेष के साथ संबंध अविवक्षित (not sought to be imparted) है, फिर भी पर और अपर ब्रह्म का उल्लेख होने के कारण (आत्म ज्ञान) इन दोनों मे से किससे सम्बद्ध है, इसमें संदेह हो सकता है। इसका निर्णय वाक्यों की गति (trend of sentences) के द्वारा करना होगा। ‘आनन्दमयोऽभ्यासात्’ भी यहाँ उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। ब्रह्म एक है फिर भी उपाधि-संबंध-अपेक्षित और उपाधि-संबंध-रहित रूप में क्रमश: उपास्य और ज्ञेय है, ऐसा वेदान्त में उपदिष्ट है, यह दिखाने के लिए आगे का ग्रंथ आरंभ किया जाता है। ‘गतिसामान्यात्’ के द्वारा अचेतन कारण का निराकरण किया गया था, अब आगे का ग्रंथ वाक्यों को ब्रह्म विषयक बताते हुए, ब्रह्म के विपरीत अन्य कारण का निषेध करता है।

पू – तैत्तिरीय उपनिषद् में अन्नमय, प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय के बारे मे बताने के बाद यह कहा गया कि ‘इस विज्ञानमय आत्मा के अंदर एक अन्य आनंदमय आत्मा है’। यहाँ संशय होता है कि ‘आनंदमय’ शब्द के द्वारा परम ब्रह्म कहा गया है जो कि ‘सत्यम् ज्ञानम् अनन्तम् ब्रह्म’ में बताया गया है या फिर अन्नमय आदि की तरह ब्रह्म से भिन्न किसी अन्य वस्तु को कहा जा रहा है। यहाँ क्या अर्थ लेना चाहिए?

वृत्तिकार – आनंदमय अमुख्य आत्मा, ब्रह्म से भिन्न, होना चाहिए। क्यों? क्योंकि यह अन्नमय आदि अमुख्य आत्मा के प्रवाह में पतित (प्रकरण में निरूपित) है।

पू – लेकिन फिर भी सभी का अंतर होने के कारण आनंदमय मुख्य आत्मा होना चाहिए।

वृत्तिकार – नहीं। क्योंकि वह (आनंदमय) प्रिय आदि अवयवों से युक्त है तथा (उपनिषद् में) उसका शारीरत्व सुना जाता है। अगर यह मुख्य आत्मा होता तो इसका प्रिय आदि के साथ संस्पर्श नहीं हो सकता था। पर यहाँ तो ‘प्रिय उसका सिर है’ आदि सुना जाता है। शारीरत्व भी सुना जाता है ‘उस पूर्ववर्णित (विज्ञानमय) का यह शारीर आत्मा (आनंदमय) है’। यहाँ पूर्ववर्णित से विज्ञानमय और शारीर आत्मा से आनंदमय अर्थ है। सशरीर का प्रिय और अप्रिय से संबंध – निषेध संभव नहीं है। इसलिए आनंदमय से संसारी आत्मा अर्थ है।

सि – यहाँ कहा जाता है – आनन्दमयोऽभ्यासात् –

(अभ्यास (repetition) के कारण आनंदमय परम आत्मा है)

परम आत्मा ही आनंदमय होने के योग्य है। क्यों? अभ्यास के कारण। परम आत्मा के संदर्भ में ही आनंद शब्द बहुत बार प्रयुक्त है। आनंदमय को प्रस्तुत कर ‘रसो वै स: (आत्मा)’ के द्वारा उसके रसत्व को बता कर ‘यह (जीव) रस को प्राप्त कर आनंदी होता है। यदि आनंद इस आकाश (हृदयाकाश) में नहीं होता तो कौन चले और कौन प्राण ले और छोड़े (breathing)। यही लोगों को आनंदित करता है’ ‘वह इस आनंद की मीमांसा है’ ‘वह इस आनंदमय आत्मा को प्राप्त करता है’ ‘ब्रह्म के आनंद को जान कर किसी से भी नहीं डरता है’ ‘उसने आनंद ब्रह्म है, ऐसा जाना’ अन्य श्रुति ‘विज्ञानमानन्दम् ब्रह्म’ में भी ब्रह्म आनंद शब्द से दृष्ट है। इस प्रकार, ब्रह्म के लिए आनंद शब्द का बहुत बार प्रयोग से यह समझा जाता है कि आनंदमय आत्मा ब्रह्म है।

तुमने यह जो कहा अन्नमय आदि अमुख्य आत्मा के प्रवाह में पतित होने के कारण आनंदमय भी अमुख्य है, तो यह कोई दोष नहीं, क्योंकि आनंदमय तो सर्वांतर है। शास्त्र मुख्य आत्मा का उपदेश करना चाहता है और इसके लिए सामान्य जन की बुद्धि का अनुसरण करता है। इसके लिए शास्त्र अत्यंत मूढ़ व्यक्तियों मे आत्मा रूप से प्रसिद्ध (वस्तुत:) अनात्मा अन्नमय शरीर को लेता है और उसके उत्तरोत्तर (प्राणमय आदि) अनात्मा को, जो पिछले से अंदर और समान है, पिछले का आत्मा कहता है (जैसे प्राणमय को अन्नमय का आत्मा कहता है यद्यपि प्राणमय भी अनात्मा है)। यह साँचे में पिघला ताम्र डाल कर प्रतिमा बनाने के जैसा है। इस प्रकार शास्त्र सर्वांतर आनंदमय, जो मुख्य आत्मा है, का सुगम तरीके से उपदेश करता है। यह तर्कपूर्ण व्याख्या है। जिस प्रकार अरुंधती दर्शन में मुख्य अरुंधती तारक को, अनेक समान अमुख्य अरुंधती  तारकों को दिखाने के बाद, अंत मे दिखाया जाता है; उसी प्रकार, यहाँ भी आनंदमय सर्वांतर होने के कारण (अरुंधती न्याय के द्वारा) मुख्य आत्मा ही है।

और तुमने यह जो कहा कि मुख्य आत्मा के लिए सिर आदि की कल्पना अयुक्त है, यह कोई दोष नहीं, क्योंकि यह कल्पना तो पहले की उपाधि (विज्ञानमय) की उपस्थिति के कारण है और यह आनंदमय का स्वभाव नहीं है। आनंदमय का शारीरत्व भी अन्नमय आदि के शारीरत्व की परंपरा से प्रदर्शित है और इसलिए संसारी (जीव) की तरह (आनंदमय का) साक्षात् शारीरत्व नहीं है। इसलिए आनंदमय परम आत्मा ही है।

1.1.13

विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात्

(अगर यह कहते हो कि आनंदमय इसलिए ब्रह्म नहीं है क्योंकि विकार शब्द (मयट् प्रत्यय) है, तो हम कहते हैं, ऐसा नहीं है, क्योंकि यहाँ विकार शब्द प्रचुरता के अर्थ में प्रयुक्त है)

पू – आनंदमय परम आत्मा हो ही नहीं सकता। क्यों? मयट् प्रत्यय, जो कि विकार सूचक है, के प्रयोग के कारण। चूँकि मयट् प्रत्यय विकार सूचक है इसलिए आनंदमय शब्द विकारार्थक है, और इस प्रकार आनंद शब्द से भिन्न है। इसलिए आनंदमय अन्नमय आदि की तरह ही विकारविषयक है।

सि – नहीं। क्योंकि स्मृति (पाणिनी व्याकरण) के अनुसार मयट् प्रचुरता के अर्थ मे भी प्रयोग होता है। स्मृति में ‘तत्प्रकृतवचने मयट्’ सूत्र से मयट् (मूल की) प्रचुरता दिखलाता है।  जैसे ‘अन्नमय यज्ञ’ में अन्नमय से अन्न की प्रचुरता कही जाती है, उसी प्रकार आनंद की प्रचुरता के कारण ब्रह्म आनंदमय कहा जाता है। (तैत्तिरीय उपनिषद् में आनंद का तारतम्य बताते समय) मनुष्य लोक से प्रारम्भ कर उत्तरोत्तर स्थानो में आनंद सौ गुना होता है, ऐसा कहकर ब्रह्मानन्द को निरतिशय (सर्वोच्च) बताने के कारण ब्रह्म की आनंद प्रचुरता सिद्ध  है। इसलिए मयट् प्राचुर्यार्थ में है (विकारार्थ में नहीं)।

1.1.14

तद्धेतुव्यपदेशाच्च

(और इसलिए क्योंकि ब्रह्म को आनंद का हेतु बताया गया है)

मयट् प्रत्यय प्राचुर्यार्थ मे इसलिए भी प्रयुक्त है क्योंकि श्रुति ‘यही (सबको) आनंदित करता है’ इस वाक्य के द्वारा ब्रह्म को आनंद का हेतु (कारण) घोषित करती है। यहाँ ‘आनंदयाति’ आनंदयति के अर्थ मे है। जो दूसरे को आनंदित करता है उसके पास आनंद की प्रचुरता है, यह प्रसिद्ध है, जैसे कि संसार में जो दूसरों को धनी करता है वह स्वयं प्रचुरधन जाना जाता है। और चूंकि मयट् प्राचुर्यार्थ के रूप मे भी प्रयुक्त हो सकता है, इसलिए आनंदमय परम आत्मा ही है।

1.1.15

मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते 

(जो ब्रह्म मंत्र मे कहा गया, वही ब्रह्म ब्राह्मण (जिसमें मंत्र की व्याख्या है) में कहा गया है)

आनंदमय परम आत्मा एक और कारण से होना चाहिए – ‘ब्रह्मविद् परम को प्राप्त करता है’ से प्रारम्भ कर ‘सत्यम् ज्ञानम् अनन्तम् ब्रह्म’ इस मंत्र में सत्य, ज्ञान, अनंत विशेषण से निर्धारित जिस ब्रह्म के बारे मे कहा गया, जिससे आकाश आदि क्रम से सारे स्थावर जंगम भूत जन्म लेते हैं, जो भूतों की सृष्टि करने के उपरांत उनमें प्रवेश कर सर्वांतर गुहा में स्थित है, जिसे जानने के लिए (तैत्तिरीय में) ‘अन्य अंतरात्मा है’ ‘अन्य अंतरात्मा है’ के द्वारा एक नए प्रकरण का आरंभ किया गया, वही मंत्र में वर्णित ब्रह्म ब्राह्मण में ‘अन्य अंतरात्मा आनंदमय है’ कहा गया है। मंत्र और ब्राह्मण में अविरोध के कारण एकार्थ युक्त है। अन्यथा (मंत्र से ब्राह्मण की भिन्नता मानने पर) प्रकृत (topic under discussion) की हानि तथा अप्रकृत का आरंभ होगा। अन्नमय आदि की तरह आनंदमय के लिए कोई अन्य अंतरात्मा नहीं कही गयी है। और भार्गवी वारुणी विद्या ‘आनंद को ब्रह्म ही जाने’ भी इसी मे (आनंदमय) निष्ठ (relates to this only) है। इसलिए आनंदमय परम आत्मा ही है।

1.1.16

नेतरोऽनुपपत्ते: 

(अन्य (जीव) परम आत्मा नहीं है क्योंकि ऐसा होना अनुपपन्न होगा)

एक और कारण से आनंदमय परम आत्मा है, इतर नहीं। यहाँ इतर का अर्थ ईश्वर से भिन्न संसारी जीव है। आनंदमय शब्द से जीव नहीं कहा जाता है। क्यों? अनुपपन्न होने के कारण। आनंदमय के प्रकृत (प्रकरण) में श्रुति कहती है ‘उसने कामना की – मैं बहुत हो जाऊँ, मैं जन्म लूँ – उसने तप किया। तप कर के उसने इन सब, यह जो कुछ भी है, का सृजन किया’। शरीर की उत्पत्ति के पूर्व अभिध्यान, सृष्टिकर्ता और (सृष्टि तथा विकार) में अभिन्नता, तथा सभी विकारों की सृष्टि परम आत्मा के अलावा किसी अन्य (जीव) में उपपन्न नहीं है।

1.1.17

भेदव्यपदेशाच्च  

((जीव और ईश्वर में) भेद के कथन के कारण)

एक और कारण से आनंदमय संसारी (जीव) नहीं है; आनंदमय के प्रकरण में ‘रसो (आनंद) वै स:। रसम् लब्धवा आनंदी भवति’ इस वाक्य के द्वारा जीव और आनंदमय का भेद कहा गया है (जीव रस को प्राप्त कर आनंदी होता है)। लब्धा (जीव) लब्धव्य (रस/आनंद) नहीं होता।

पू –  अगर लब्धा लब्धव्य नहीं होता तो फिर श्रुति और स्मृति में कहा गया ‘आत्मा अन्वेष्टव्य है’ ‘आत्म लाभ (आत्मा की प्राप्ति) से श्रेष्ठ कुछ नहीं है’ किस प्रकार युक्त है?

सि – ठीक है। फिर भी सामान्य लौकिक जनों की दृष्टि में, सत् तत्त्व अनवबोध (अज्ञान) के कारण, वाला होने पर भी, देह आदि अनात्मा में मिथ्या आत्मत्व देखा जाता है, यद्यपि आत्मा अप्रच्युत (अच्युत) आत्मभाव युक्त रहता है (अर्थात् आत्मा का आत्मभाव नष्ट नहीं होता है)। उस देहादि भूतात्मा के द्वारा तो आत्मा (परम आत्मा) के लिए ‘अनन्विष्ट:’ ‘अन्वेष्टव्य:’ ‘अलब्ध:’ ‘लब्धव्य:’ ‘अश्रुत:’ ‘श्रोतव्य:’ ‘अमत:’ ‘मंतव्य:’ ‘अविज्ञात:’ ‘विज्ञातव्य:’ आदि भेद (जीव/आत्मा) का कथन युक्त है। परमार्थत: तो सर्वज्ञ परमेश्वर के अलावा अन्य द्रष्टा या श्रोता का ‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा’ आदि के द्वारा प्रतिषेध किया गया है। परमेश्वर, अविद्याकल्पित शारीर (शरीराभिमानी), कर्ता, भोक्ता जो विज्ञानात्मा नाम से जाना जाता है, से भिन्न है (विज्ञानात्मा, इस प्रकार जीव का ही नाम हुआ)। यह भिन्नता सूत्र पर आरूढ़  चर्मखड्गधारी मायावी और परमार्थरूप भूमिष्ठ मायावी के समान है। या फिर जैसे घट-उपाधि-परिच्छिन्न आकाश अनुपाधि परिच्छिन्न आकाश से भिन्न है। विज्ञानात्मा (जीव) और परमात्मा के इसी भेद के आश्रित होकर ‘नेतरोऽनुपपत्ते:’ एवम् ‘भेदव्यपदेशाच्च’ कहा गया है।

1.1.18

कामाच्च नानुमानापेक्षा  

(काम के उल्लेख के कारण (प्रधान के जगत्कारणत्व के लिए) अनुमान की अपेक्षा (आवश्यकता) नहीं है)

आनंदमय के प्रकरण में ‘उसने कामना की – मैं बहुत हो जाऊँ, मैं जन्म लूँ’ के द्वारा कामयितृत्व का निर्देश है। इस कारण (कामयितृत्व के कारण) सांख्य द्वारा अनुमान से परिकल्पित अचेतन प्रधान आनंदमय रूप या कारण (जगत्कारण) रूप, दोनों में ही मन्तव्य (अपेक्षित) नहीं है। यद्यपि प्रधान का निराकरण ‘ईक्षतेऽर्नाशब्दम्’ सूत्र के द्वारा किया जा चुका है, फिर भी गतिसामान्यता  (concurrence of knowledge in different texts) की व्याख्या करने के लिए प्रसंगवश पूर्वसूत्र उदाहृत (1.1.16) कामयितृत्व श्रुति के आधार पर (प्रधान का) पुनः निराकरण किया जाता है।

1.1.19

अस्मिन्नस्य च तद्योगम् शास्ति   

(इसके अलावा, शास्त्र इसका (जीव का) इससे (आनंदमय से) तद्योग (तद्भाव या अभेद) बताता है)

एक और कारण से आनंदमय शब्द से न तो प्रधान वाच्य है और न ही जीव – शास्त्र प्रतिबुद्ध जीव की, प्रकृत (प्रकरण निरूपित) आत्मा, जो कि आनंदमय है, से तद्योग (अभेद) बताता है। तद्योग तदात्म (identity) योग, तद्भाव अर्थात् मुक्ति के अर्थ में है। शास्त्र इस तद्योग को इस प्रकार बताता है ‘जब इस अदृश्य, अनात्मा, अनिरुक्त, अनिलयन, अभय में प्रतिष्ठित होता है, तब अभय को प्रपट होता है। पर जब वह (साधक) इसमें थोड़ा भी अंतर करता है, तब उसको भय होता है’। इस प्रकार यह कहा जा रहा है ‘जब तक (जीव) इस आनंदमय में थोड़ा सा भी अतादात्म्य (non-identity) रूपी अंतर देखता है, तब तक संसार का भय दूर नहीं होता है; पर जब इस आनंदमय से निरंतर तादात्म्य में प्रतितिष्ठित होता है, तब संसार भय दूर हो  जाता है’। अब यह तो तभी संभव है जब आनंदमय का अर्थ परम आत्मा हो न की प्रधान या जीव। इसलिए आनंदमय परम आत्मा है, यह सिद्ध है।

शंकराचार्य का संशोधन

यहाँ यह कहना चाहिए – ‘वह पुरुष अन्नरसमय है’ ‘उस अन्नरसमय की तुलना में एक अन्य प्राणमय अंतरात्मा है’ फिर ‘एक अन्य मनोमय अंतरात्मा है’ फिर ‘एक अन्य विज्ञानमय अंतरात्मा है’ इन वाक्यों में विकार के अर्थ में मयट् प्रत्यय का प्रवाह (continuous use) है, फिर एकाएक आनंदमय के लिए ही मयट् प्राचुर्यार्थक क्यों है या फिर आनंदमय ही ब्रह्मविषयक क्यों है?

पू – क्योंकि मंत्र वर्णित ब्रह्म का प्रकरण है।

शंकर – नहीं। क्योंकि फिर तो अन्नमय आदि के लिए भी ब्रह्मत्व का प्रसंग हो जाएगा।

पू – अन्नमय आदि का अब्रह्मत्व युक्त है क्योंकि उनके लिए क्रमिक रूप से अन्य अंतरात्मा का उल्लेख है। पर आनंदमय के लिए कोई अन्य अंतरात्मा का उल्लेख नहीं है। इसलिए आनंदमय से ब्रह्मत्व मन्तव्य है, अन्यथा प्रकृत (प्रकरण) की हानि तथा अप्रकृत की प्रक्रिया का प्रसंग होगा।

शंकर – यद्यपि अन्नमय आदि की तरह आनंदमय के लिए अन्य अंतरात्मा उल्लिखित नहीं है, फिर भी आनंदमय ब्रह्म नहीं हो सकता; क्योंकि आनंदमय के प्रकृत में यह कहा गया है ‘प्रिय उसका सिर है, मोद दक्षिण पक्ष है, प्रमोद उत्तर पक्ष है, आनंद आत्मा है तथा ब्रह्म पूंछ है जो प्रतिष्ठा (stabilize/support) देता है’। इस प्रकार जो ब्रह्म ‘सत्यम् ज्ञानम् अनन्तम् ब्रह्म’ के द्वारा मंत्र वर्णित प्रकृत है, वही यहाँ ‘ब्रह्म पूंछ है जो प्रतिष्ठा देता है’ कहा गया है। यही बताने के लिए (कि ब्रह्म प्रतिष्ठा देता है) अन्नमय से लेकर आनंदमय तक पाँच कोशों की कल्पना की गयी है। फिर किस प्रकार प्रकृत (प्रकरण) की हानि तथा अप्रकृत की प्रक्रिया का प्रसंग हो रहा है।

पू – पर ‘ब्रह्म पूंछ है जो प्रतिष्ठा देता है’ के द्वारा ब्रह्म को आनंदमय का अवयव कहा गया है जैसे कि अन्नमय आदि के प्रकृत में ‘यह पूंछ है जो प्रतिष्ठा देता है’ कहा गया है। फिर यह कैसे जाना गया कि ब्रह्म यहाँ स्वतंत्र रूप से वर्णित है।

शंकर – प्रकरण में वर्णित होने के कारण।

पू – ब्रह्म को अगर आनंदमय का अवयव मानें तो भी प्रकृत की हानि नहीं होती क्योंकि ब्रह्म ही आनंदमय है।

शंकर – फिर तो एक ही ब्रह्म के अवयवी आनंदमय आत्मा होने से और साथ ही आनंदमय का पुच्छ प्रतिष्ठा अवयव होने के कारण असामंजस्य होगा। अगर इन दोनों मे से किसी एक को मानना हो तो ‘ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा’ मानना युक्त है क्योंकि यहाँ ब्रह्म शब्द आने के कारण ब्रह्म का निर्देश होना तर्कपूर्ण है। लेकिन आनंदमय के वाक्य में ब्रह्म शब्द नहीं है, इसलिए वहाँ (आनंदमय को ब्रह्म मानना) युक्त नहीं है। इसके अलावा, ‘ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा’ ऐसा कह कर यह कहा गया ‘इस विषय में (ब्रह्म के विषय में) यह श्रुति है ‘अगर कोई ब्रह्म को असत् जनता है तो वह स्वयम् भी असत् हो जाता है। अगर कोई ब्रह्म को सत् जानता है तो वे उसे उसके इस ज्ञान के कारण सत् मानते हैं’’। चूंकि यहाँ केवल ब्रह्म के सत् और असत् में विश्वास का गुण और दोष उद्धृत है तथा आनंदमय का उल्लेख नहीं है, इसलिए यह समझना चाहिए कि ‘ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा’ में ब्रह्म स्वप्रधान रूप से उल्लिखित है (appearing in its own right)। और आनंदमय के भाव अभाव (सत् असत्) के विषय मे तो कोई शंका युक्त भी नहीं है क्योंकि प्रिय, मोद आदि से विशिष्ट आनंदमय सर्वलोकप्रसिद्ध है।

पू – तो फिर क्यों स्वप्रधान सद्ब्रह्म आनंदमय के पूंछ के रूप में ‘ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा’ द्वारा निर्दिष्ट है?

शंकर – यह कोई दोष नहीं। यहाँ ब्रह्म का अवयव रूप से निरूपण उद्देश्य नहीं है। यहाँ यह बताना उद्देश्य है कि ब्रह्म, जो कि आनंद है, वह एक पूंछ के समान है और यह पूंछ के समान सहारा देता है। यहाँ यह विवक्ष्य (idea sought to be imparted) है कि ब्रह्म, जो कि आननद है, वह सभी लौकिक आनंदों का एकमात्र स्थान तथा पराकाष्ठा है। अन्य श्रुति कहती है ‘इस आनंद के एक कण से सभी भूत जीवित हैं’। अगर आनंदमय से ब्रह्मत्व मानना है तो सविशेष ब्रह्म (qualified Brahman) मानना होगा जो प्रिय आदि अवयवो वाला है। पर वाक्य के अंत में निर्विशेष ब्रह्म कहा गया है जो मन और वाणी से अगोचर है – ‘ब्रह्म के आनंद, जहां से वाणी मन के साथ लौट आती है, को प्राप्त कर विद्वान् किसी चीज़ से नहीं दर्ता है’। और फिर आनंद की प्रचुरता के कथन से दुख की उपस्थिति सूचित होती है क्योंकि संसार में किसी वस्तु की प्रचुरता अपने प्रतिलोम के अल्पत्व की अपेक्षा से होती है (अगर वह सम्पूर्ण आनंद नहीं है बल्कि आनंदमय है तो उसमे अवश्य आनंद के साथ थोड़ा दुख भी होगा)। पर श्रुति ‘जिसमें न अन्य को देखता है, न सुनता है और न जानता है, वह भूमा है’ में भूमा, जो ब्रह्म है, के सिवा सबका अभाव है, और इस प्रकार (प्रतिलोम के अल्प भाव को मानने पर) श्रुति बाधित हो जाएगी। हर शरीर में प्रिय आदि के भेद से (हर शरीर के अंदर) आनंदमय में भिन्नत्व है पर ब्रह्म सभी शरीरों मे एक ही है, अलग-अलग नहीं। जैसा कि श्रुति कहती है ‘सत्यम् ज्ञानम् अनन्तम् ब्रह्म’ तथा ‘एक ही सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा देव सभी भूतों में गूढ (hidden) है’।

और आनंदमय का तो अभ्यास (repetition) भी नहीं है। बल्कि आनंदमय के प्रतिपादिक अर्थ मात्र (आनंद) का अभ्यास देखा जाता है ‘रसो वै स:। रसम् ह्येवायम् लब्धवा आनंदी भवति। को ह्येवान्यात्क: प्राण्यात्। यदेष आकाश आनंदो न स्यात्’ ‘यह आनंद की मीमांसा है’ ‘विद्वान् ब्रह्म के आनंद को जानकर किसी से नहीं डरता’ ‘उसने ब्रह्म को आनंद जाना’। यदि आनंदमय शब्द से ब्रह्म निश्चित रूप से मन्तव्य होता तो केवल आनंद के प्रयोग मे आनंदमय के प्रयोग की कल्पना करनी होती। पर आनंदमय ब्रह्म नहीं है क्योंकि उसे प्रिय आदि सिर हैं तथा और भी यथा उक्त कारण हैं। अन्य श्रुति ‘विज्ञानम् आनंदम् ब्रह्म’ में आनंद पद, जो प्रातिपदिक अर्थ (आनंदमय) है, उसका ब्रह्म के लिए प्रयोग दर्शित है। ‘यदेष आकाश आनंदो न स्यात्’ में, इस प्रकार, आनंद से ब्रह्म मंतव्य है। यह समझना चाहिए कि आनंद शब्द आनंदमय का अभ्यास नहीं है (अर्थात् आनंद का प्रयोग आनंदमय का प्रयोग नहीं है)।

यह कहा गया था कि आनंद शब्द मयट् प्रत्यय के साथ ‘उसने आनंदमय आत्मा की प्राप्ति की’ प्रयुक्त है। पर यह आनंदमय तो ब्रह्मविषयक नहीं है क्योंकि यह विकारात्मक अनात्मक अन्नमय आदि की प्राप्ति के (प्रकरण में निरूपित) प्रवाह में पतित है।

पू – यदि आनंदमय का उपसंक्रमितव्य (प्राप्तव्य) अन्नमय आदि की तरह अब्रह्म होता तो विद्वानों के लिए ब्रह्मप्राप्ति का फल अनिर्दिष्ट (unspecified) रह जाता।

शंकर – यह कोई दोष नहीं। आनंदमय के उपसंक्रमण (प्राप्ति) के निर्देश के द्वारा विद्वानों द्वारा पुच्छ-प्रतिष्ठा-भूत ब्रह्म की प्राप्ति का फल अपने-आप निर्दिष्ट है। इसके अलावा, (ब्रह्मप्राप्ति के) फल की व्याख्या इन श्रुतियों में की गयी है ‘तै II.ix’। और तुम्हारे द्वारा, आनंदमय की सन्निधि (proximity)  में होने वाले, ‘उसने इच्छा की। मैं बहुत हो जाऊँ, मैं जन्म लूँ’ कहा गया। पर इससे आनंदमय का ब्रह्मत्व सिद्ध नहीं होता क्योंकि श्रुति ‘ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा’ में उपस्थित ज्यादा निकट शब्द ब्रह्म से सम्बद्ध हो जाती है। और चूँकि इसके बाद के ग्रंथ के ‘रसो वै स:’ आदि इसकी (ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा) अपेक्षा से हैं (stem out of this), इसलिए भी वे आनंदमय का निरूपण नहीं करते हैं।

पू – यह अयुक्त होगा कि ‘उसने इच्छा की’ में ‘वह’ ब्रह्म सूचक हो क्योंकि ‘स:’ पुल्लिंग है (और ब्रह्म तो नपुंसक लिंग है)।

शंकर – यह दोष नहीं है। ‘उस आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ’ में पुल्लिंग आत्मा के द्वारा ब्रह्म का प्रकृत है।

भार्गवी वारुणी विद्या ‘आनंद को ब्रह्म जाना’ में मयट् प्रत्यय और प्रिय आदि सिर के अनुल्लेख के कारण आनंद का ब्रह्मत्व युक्त है (अर्थात् आनंद ब्रह्म है)। इस प्रकार, जब तक ब्रह्म में विशेष (गुण/उपाधि) का आश्रय न लिया जाये, तब तक ब्रह्म में स्वत: प्रिय आदि सिर नहीं हो सकते हैं। और यहाँ सविशेष ब्रह्म का प्रतिपादन तो करना नहीं है क्योंकि मन और वाणी से अगोचरता की श्रुति है (जहां से वाणी के साथ मन लौट आता है)। इसलिए, अन्नमय आदि की ही तरह आनंदमय में भी मयट् विकारार्थक है, प्राचुर्यार्थक नहीं।

इसलिए सूत्रों की व्याख्या इस प्रकार होनी चाहिए:-

1.1.12

(आनंदमय ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा में ब्रह्म स्वप्रधान रूप मे विवक्षित है, अभ्यास के कारण) 

शंका – ‘ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा’ में ब्रह्म आनंदमय के अवयव के रूप में विवक्षित है या स्वप्रधान रूप में?

पू – पुच्छ शब्द से यह प्राप्त होता है कि अवयव के रूप में कहा गया है।

शंकर – इसलिए कहा गया ‘आनंदमयोऽभ्यासात्’; आनंदमय आत्मा, यहाँ पर (इस वाक्य में) ‘ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा’ के द्वारा स्वप्रधान ब्रह्म का उपदेश है; यह अभ्यास के द्वारा सिद्ध है; ‘वह असत् हो जाता है’ आदि से भी सिद्ध है। (आदि गुरु कहते हैं कि ‘ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा’, जो कि आनंदमय के प्रकरण मे कथित है, में स्वप्रधान ब्रह्म का उपदेश है और यह बात अभ्यास के कारण सिद्ध है और यह अभी इस सूत्र के पूर्व में ‘शंकर का संशोधन’ के रूप में प्रस्तुत है)

1.1.13

(विकार शब्द (अवयव) के कारण कहते हो कि आनंदमय ब्रह्म नहीं है तो हम कहते हैं नहीं, क्योंकि शब्द प्राचुर्य के अर्थ में प्रयुक्त है)

विकार शब्द अवयव अर्थक है, इसलिए पुच्छ अवयव शब्दार्थक होने के कारण ब्रह्म का स्व प्रधानत्व नहीं है, ऐसा कहा गया। उसके परिहार के लिए कहते हैं – यह दोष नहीं, क्योंकि अवयव शब्द प्रचुरता के दृष्टिकोण से उपपन्न है। प्राचुर्य का अर्थ है सतत उपस्थिति। अर्थात कोई शब्द जिसकी अवयव के प्रकरण मे सतत उपस्थिति हो। अन्नमय आदि का सिर से पुच्छ तक वर्णन करने के बाद आनंदमय का सिर से पुच्छ तक वर्णन करना था, और अवयव की प्रायापत्ति (प्रचुरता/सतत उपस्थिति) होने के कारण ‘ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा’ कहा गाय। यह ब्रह्म को अवयव बताने के लिए नहीं किया गया (बल्कि अंग विषय की सतत उपस्थिति के लिए किया गया)। और यह तथ्य ब्रह्म के स्वप्रधानत्व के, अभ्यास के आधार पर, कथन से भी स्पष्ट है।

1.1.14

(ब्रह्म के इस सब के (आनंदमय के भी) कारण होने कारण भी)

‘उसने इस सब का, जो कुछ भी है, सृजन किया’ में सभी विकारों का, आनंदमय सहित, कारण ब्रह्म कहा गया है। सद्ब्रह्म का, जो कि अपने विकार का कारण है, आनंदमय का मुख्य रूप से अवयव होना उपपन्न नहीं है। अन्य सूत्र भी यथासंभव पुच्छ वाक्य मे निर्दिष्ट ब्रह्म को बताते हुये द्रष्टव्य हैं। (आदि गुरु के अनुसार, इस अधिकरण के सभी सूत्र पुच्छ वाक्य से ही समझे जाने चाहिए।)          

           

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