Brahm Sutra

Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.1.20 to 1.1.21 – The Being Inside

1.1.20

अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्

शंका – उपनिषद् में ‘अब यह जो आदित्य के अंदर हिरण्मय पुरुष दिखता है, जिसके स्वर्ण के केश, श्मश्रु और नख पर्यंत सब कुछ स्वर्ण का है’ ‘उसके नयन पुंडरीक के समान जो कि कपि के आसन के समान है; उसका नाम उत् है; वह पुरुष सभी पापों से ऊपर है; जो ऐसा जानकर उस पुरुष की उपासना करता है, वह सभी पापों से रहित हो जाता है’ (छां 1.6.6-8), ऐसा अधिदैवत: (अर्थात् देवता संबंधी चिंतन में) कहा गया। अब अध्यात्मत: (अर्थात् देह संबंधी चिंतन में) ‘अब यह जो अक्षि के अंतर पुरुष दिखता है’ (छां 1.7.5-8) इत्यादि कहा गया है।

तो यहाँ शंका होती है कि सूर्य मण्डल और आँखों के अंदर जो उपास्य पुरुष सुना जाता है, वह विद्या और कर्म के अतिशय (perfection) के कारण उत्कर्ष (eminence) को प्राप्त कोई संसारी (जीव) है अथवा नित्यसिद्ध परमेश्वर है। यहाँ क्या निष्कर्ष होना चाहिए?

पू – वह संसारी है। क्यों?

(श्रुति में उस के) रूप वाला सुने जाने के कारण (वह पुरुष परमेश्वर नहीं है) – आदित्य स्थित पुरुष के लिए ‘हिरण्य श्मश्रु’ इत्यादि रूप उदाहृत हैं; नयन स्थित पुरुष के लिए भी वही रूप अतिदेश के द्वारा (सदृश बोधन – by extension) प्राप्त होता है, ‘इसका (नयनस्थ पुरुष का) रूप, उसके (आदित्यस्थ पुरुष के) रूप के समान है’ (छां 1.7.5)। लेकिन ‘अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय’ इस श्रुति के अनुसार परमेश्वर का रूप वाला होना युक्त नहीं है।

(श्रुति में) आधार (place of residence) के श्रवण के कारण भी (वह पुरुष परमेश्वर नहीं है) – ‘यह जो आदित्य के अंतर में है, यह जो नयन में है’। परंतु अनाधार, स्वप्रतिष्ठित, सर्वव्यापी परमेश्वर का आधार तो उपदिष्ट नहीं हो सकता है। श्रुति भी कहती है ‘भगवन्, वह किसमें प्रतिष्ठित है? अपनी ही महिमा में’ ‘आकाश के समान नित्य सर्वगत’ (इस प्रकार परमेश्वर का निराधार होना कहा गया है)।

ऐश्वर्य की मर्यादा (limitation) के श्रुति में होने के कारण भी (वह पुरुष परमेश्वर नहीं है) – आदित्यपुरुष की ऐश्वर्यमर्यादा है ‘(वह आदित्यस्थ पुरुष) सूर्य से ऊपर के लोकों पर तथा देवों की प्रिय वस्तुओं पर शासन करता है’ तथा अक्षिपुरुष की ऐश्वर्यमर्यादा है ‘वह, जो ऐसा है, आँखों के नीचे के लोकों पर तथा मनुष्यों की प्रिय वस्तुओं पर शासन करता है’।

परंतु परमेश्वर के ऐश्वर्य की मर्यादा होना युक्त नहीं है क्योंकि श्रुति में अविशेष (without qualifications) रूप से कहा है ‘यह सर्वेश्वर है, यह भूताधिपति है, यह भूतों का पालन करने वाला है, यह विशेष रूप धारण करने वाला सब लोकों के असंभेदन (अनाश-स्थिति) के लिए सेतु के समान है और धर्म आदि मर्यादाओं का रक्षक है’।

इसलिए आदित्य और अक्षि के अंतरस्थ पुरुष परमेश्वर नहीं है।

सि – इसलिए कहते हैं –अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् –

((आदित्य और अक्षि के) अंतरस्थ पुरुष परमेश्वर है क्योंकि उसी के (परमेश्वर के) धर्मों का (गुणों का) उपदेश है)

‘यह जो आदित्य के अंतर है’ ‘यह जो अक्षि के अंतर है’ इत्यादि श्रुति में जो पुरुष वर्णित है, वह परमेश्वर है न कि संसारी (जीव) ।

क्यों?

क्योंकि उसी के धर्मों का उपदेश है। उस परमेश्वर के ही धर्मों का यहाँ उपदेश है। ‘उसका नाम उत् है’ इस प्रकार आदित्य पुरुष का नाम बताकर, ‘वह, जो ऐसा है, सभी पापों से परे है’ इस श्रुति के द्वारा उसके ‘उत्’ नाम की निरुक्ति (derivation) उसके सर्वपापमुक्त होने के कारण की गयी। फिर जिस नाम का निर्वचन (derivation) किया गया, उसी नाम का अतिदेश (extension) अक्षिपुरुष में ‘इसका (अक्षिपुरुष का) नाम वही है जो उसका (आदित्यपुरुष का) नाम है’ ऐसा कहकर किया गया। सर्वपापमुक्त तो ‘जो आत्मा है, वह सभी पापों से परे है’ आदि श्रुति के द्वारा केवल परमात्मा को ही कहा गया है। और ‘वह (अक्षिपुरुष) ऋक है, साम है, उक्त्थ (a type of hymn) है, वह यजु है, वह ब्रह्म (तीनों वेद) है’ इस श्रुति के द्वारा अक्षिपुरुष की ऋक, साम आदि से आत्मकता (identity) काही गयी है। यह तो केवल परमेश्वर के लिए ही उपपन्न है क्योंकि परमेश्वर का सर्वकारण होने से सर्वात्मक होना युक्त है। पुन: ऋक साम, जो अधिदैवत: पृथ्वी तथा अग्नि हैं तथा अध्यात्मत: वाक् तथा प्राण हैं, से आरंभ कर अधिदैवत: ‘उसके (आदित्यस्थ पुरुष के) ऋक तथा साम शरीर के दो पर्व (joints – जोड़) हैं’ यह कहा गया और फिर अध्यात्मत: ‘उसके (अक्षिपुरुष के) वही दो पर्व हैं जो आदित्यपुरुष के पर्व हैं’ यह कहा गया। यह तो उसके सर्वात्मक होने पर ही युक्त है। ‘इसलिए जब ये पुरुष वीणा पर गाते हैं तो ये उसी को गाते हैं और इस प्रकार वे धनवान् हो जाते हैं’ इस श्रुति के द्वारा यह दर्शाया गया कि लौकिक गान में भी संगीत के रूप से वही स्थित है। ऐसा तो तब ही हो सकता है जब वह पुरुष गीता दर्शनोक्त (10.41) परमेश्वर हो।

इसके अलावा, लोकों का निरंकुश शासकत्व जो उपनिषद् में वर्णित है, वह परमेश्वर को ही इंगित करता है।

तुमने यह जो कहा कि हिरण्य श्मश्रु आदि रूप वाला सुने जाने के कारण (उस पुरुष का) परमेश्वर होना उपपन्न नहीं है, तो उसके विषय में यहाँ कहते हैं – साधक के अनुग्रह के लिए, परमेश्वर के भी इच्छा के द्वारा अन्य माया रूप हो सकते हैं – जैसा कि स्मृति भी है ‘नारद, यह जो तुम मुझे सर्व-भूत-गुण युक्त देखते हो, यह माया है और मेरे द्वारा सृष्ट है। मुझे तुम ऐसा (सर्वभूतगुण युक्त) मत समझो’। और जहाँ सर्व विशेषण रहित पारमेश्वर रूप उपदिष्ट होता है, वहाँ ‘अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय’ आदि शास्त्र हैं। परंतु सर्वकारण होने से, उपासना के लिए कभी-कभी, परमेश्वर विकार-धर्म-युक्त (possessed of mundane qualities) निर्दिष्ट है – ‘सर्वकर्मा सर्वकाम सर्वगन्ध सर्वरस’ इत्यादि। इसी प्रकार से हिरण्य श्मश्रु आदि का निर्देश होता है।

और जो यह कहा कि आधार के श्रवण के कारण (पुरुष) परमेश्वर नहीं है, तो यहाँ कहते हैं – स्वमहिमा प्रतिष्ठित का भी, आधार विशेष का उपदेश, उपासना के लिए हो सकता है, क्योंकि आकाश के समान सर्वगत होने के कारण ब्रह्म सर्वगत है, यह उपपन्न है।

ऐश्वर्य मर्यादा का श्रवण भी अधिदैव और अध्यात्म के विभाग की अपेक्षा से उपासना के प्रयोजन से ही है (ऐश्वर्य की मर्यादा के रूप में नहीं)।

इस प्रकार, अक्षि और आदित्य के अंतर में (स्थित पुरुष के रूप में) परमेश्वर ही उपदिष्ट है।

1.1.21

भेदव्यपदेशाच्चान्य:

(और भेद के कथन के कारण ईश्वर (जीव से) भिन्न है)

अंतर्यामी ईश्वर, सूर्य आदि शरीर अभिमानी जीवों से भिन्न है क्योंकि श्रुति में ‘जो अदित्य में रहता है, जो अदित्य के अंतर में है, जिसे आदित्य नहीं जानता है, जिसका शरीर आदित्य है, जो सूर्य का अंतर से शासन करता है, वह अंतर्यामी अमृत (तुम्हारी) आत्मा है’ इस वाक्य से (ईश्वर और जीव के) भेद का कथन है। वहाँ ‘आदित्य के अंतर में है, जिसे आदित्य नहीं जानता है’ इन कथनों से यह स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट है कि अंतर्यामी, आदित्य आदि विज्ञानात्मा (जीव), जो जानने वाला (knower) है, से अन्य है। श्रुति की सामान्यता से (similarity of texts) यह युक्त है कि वही (आत्मा) यहाँ भी आदित्य का अंतरस्थ पुरुष है।

इसलिए परमेश्वर ही यहाँ उपदिष्ट है, यह सिद्ध है।

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