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Basic concepts of Vedanta – Another perspective

अगर वेदांत दर्शन की व्याख्या पूर्णत: श्री शंकराचार्य के प्रस्थानत्रयी भाष्य के आधार पर की जाय तथा प्रकरण ग्रन्थों से ऊपर उठा जाय तो वेदान्त का दर्शन एक नए रूप मे होता है। यह व्याख्या शांकर दर्शन के सामान्यतया माने हुये सिद्धांतो से कई मूल जगहों पर मेल नहीं खाती, और इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

वेदान्त मुख्यत: जीव, जगत् और ब्रह्म की विवेचना करता है। इस व्याख्या में उनकी परिभाषा वही है जो सामान्यत: स्वीकृत है। पर उनके बीच के आपसी संबंध का विवेचन यहाँ अन्य प्रकार से किया गया है। मूल सिद्धान्त निम्नांकित हैं :-

1.   जीवों की संख्या अनंत है और वे हमेशा ही अनंत संख्या में रहेंगे। जीव ब्रह्म होते हुये भी अपने को ब्रह्म से भिन्न समझता है। इसका कारण अविद्या है। जीव का जीवत्व, इस प्रकार, अविद्या की उपस्थिति का सूचक है। चूँकि जीव हमेशा थे और हमेशा रहेंगे, इसलिए अविद्या भी अनादि और अनंत है।

2.   जीव के द्वारा अपने स्वरूप को ब्रह्म नही जानना अविद्या है। अविद्या विद्या के द्वारा नष्ट हो जाती है। विद्या बुद्धि में उत्पन्न एक प्रत्यय है। अविद्या के नष्ट होने (अर्थात् विद्या-प्रत्यय के बुद्धि में आने पर) जीव स्वयं के और जगत के स्वरूप को ब्रह्म समझने लगता है। हालाँकि, एक जीव की अविद्या नष्ट होने के बाद भी अन्य जीवों में अविद्या मौजूद रहती है। ध्यातव्य है कि अविद्या कोई धनात्मक वस्तु नहीं वरन् केवल विद्या के अभाव का नाम मात्र है।

3.   जगत सत् है अर्थात् जगत वस्तुत: है। कुछ भी असत् नहीं। जगत् का उपादान और निमित्त कारण दोनों ही ब्रह्म है। यह श्रुति प्रमाण का विषय है और यह अन्य प्रमाणों से अननुभूत है। उपादान कारण कार्य का स्वरूप होता है। स्वरूप वह होता है जिसे छोडकर वस्तु कभी रह ही नहीं सकती। जगत् ब्रह्म का कार्य है। इस प्रकार, ब्रह्म जगत् का स्वरूप है। जगत् को दो प्रकार से देख सकते हैं, कार्य दृष्टि से और कारण दृष्टि से। कार्य दृष्टि से देखने पर जगत् स्वतंत्र है, अनृत (परिवर्तनशील) है तथा असर्वात्मक है। इस प्रकार से अनुभूत जगत अविद्याकल्पित है। यही जगत्, कारण दृष्टि से देखने पर, ब्रह्म है। इस प्रकार, कार्य दृष्टि से अनुभूत जगत् अविद्याकल्पित तथा कारण दृष्टि से अनुभूत जगत् ब्रह्म है। लेकिन जगत् जो वस्तु है, वह एक ही है और वह वस्तुत: है, केवल दृष्टि में अंतर है।

4.   ब्रह्म से इस जगत् की उत्पत्ति हुई है। पर इस सृष्टि का कारण ब्रह्म में किसी कामना का होना या किसी कमी का होना नहीं है, क्योंकि यह मूल सिद्धान्त के प्रतिकूल होगा। जगत् अभी व्यक्त है तथा प्रलय के बाद और सृष्टि के पहले अव्यक्त रहता है। प्रलय के समय जीव ब्रह्म में मिल तो जाते हैं पर उनके कर्म नष्ट नहीं होते, उनकी अविद्या नष्ट नहीं होती। सृष्टि के समय जीवों की वही अविद्या ईश्वर के कर्मों की प्रेरक हो जाती है तथा माया के साथ मिलकर इस सृष्टि का कारण होती है। यही गीता 7.4 में वर्णित अहंकार है। इस प्रकार, सृष्टि माया है अर्थात त्रिगुणात्मिका है पर सृष्टि की प्रेरक अविद्या है। अविद्या किसकी? उन जीवों की जो प्रलय के समय ब्रह्म से एकीकृत तो हो गए थे पर जिनकी अविद्या नष्ट नहीं हुई थी! इस प्रकार, नामरूपात्मक जगत् और कुछ नही बल्कि त्रिगुणात्मिका माया है और यह ब्रह्म सदृश ही नित्य और सत् है।

5.   जीवों की तीन अवस्था होती है, जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति। सुषुप्त आत्मा, जो कि प्राज्ञ कहलाता है, वही जीव है जो जाग्रत और स्वप्न की उपाधियों से संस्पृष्ट होकर विश्व और तैजस या बहिष्प्रज्ञ और अंत:प्रज्ञ कहलाता है। यह प्राज्ञ ही प्रत्यगात्मा या क्षेत्रज्ञ नाम से भी जाना जाता है। बहिष्प्रज्ञ प्राज्ञ और जगत् के बीच अध्यास करता है अर्थात प्राज्ञ में जगत् के धर्मों को और जगत् में प्राज्ञ के धर्मों को देखता है। बहिष्प्रज्ञ ऐसा इसलिए कर पाता है क्योंकि उसे अविद्या है। वह अपना स्वरूप नहीं जानता। वह नही जानता कि प्राज्ञ ही ब्रह्म है। यह अध्यास अविद्या का कार्य है। अविद्या से स्वत: कोई नुकसान नही है। नुकसान तो वस्तुत: अध्यास से है। विद्या से अविद्या हट जाती है और फलस्वरूप अध्यास भी।

6.   अविद्या के नष्ट होने के बाद भी, नाम रूपात्मक जगत् रहता ही है क्योंकि यह सत् है। अंतर बस इतना है कि मुक्त जीव इसमें नानात्व नहीं देखता। वह इसमें अब्रह्मत्व या असर्वात्मत्व नहीं देखता। वह जगत् और अपने में कोई भेद नहीं देखता। वह जीव, जगत और ब्रह्म को एक ही वस्तु देखता है।

7.   मृदा और घट का दृष्टांत ब्रह्म का जगत् के प्रति उपादान कारणत्व समझाने के लिए दिया जाता है। अविद्या कल्पित जगत् का अधिष्ठान जगत् ही है जिसका उपादान कारण ब्रह्म है। कार्य दृष्टि से देखा गया जगत् अविद्या कल्पित और भ्रम है जैसे कि रज्जु में सर्प या शुक्तिका में रजत। वही जगत् कारण दृष्टि से देखने पर ब्रह्म है। इस प्रकार दोष दृष्टि में है, जगत् में नहीं। जगत् काल्पनिक नहीं है। जगत् का अब्रह्मत्व और असर्वात्मत्व काल्पनिक और अविद्याकल्पित है। इस प्रकार, अविद्याकल्पित का वास्तविक अर्थ यह है कि वस्तु ब्रह्म से भिन्न जान पड़ती है। यह अब्रह्मप्रत्यय रज्जु में सर्प के समान है।

8.   रज्जु-सर्प, शुक्तिका-रजत, द्वि-चंद्र आदि दृष्टांतों का उद्देश्य कार्य कारणत्व बताना नहीं है बल्कि नामरूपात्मक जगत के अब्रह्मप्रत्ययत्व को हटाना है। कार्य कारण अनन्यत्व को बताना मृदा-घट आदि दृष्टांतों का लक्ष्य है।

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