Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.1.23 – Prana

1.1.23

अत एव प्राण:

उद्गीथ के प्रकरण में – ‘हे प्रस्तोता! अगर प्रस्ताव (स्तुति) के नियंता देवता को जाने बिना तुमने मेरे सामने उसका गान किया तो तुम्हारा मस्तक गिर जाएगा’ – इस श्रुति से आरंभ कर सुना जाता है – ‘वह देवता कौन है? उसने कहा – प्राण! यह सभी भूत प्राण की ओर जाकर उसी में प्रविष्ट होते हैं तथा फिर उसी से प्रकट होते हैं। यही प्रस्ताव का नियंता देवता है’। यहाँ संशय और निर्णय पहले (के सूत्रों) की तरह ही समझना चाहिए।

शंका – ‘सोम्य! प्राण मन से बंधा है’ ‘प्राण का प्राण’ आदि (श्रुति) में प्राण शब्द, ब्रह्म विषयक (ब्रह्म के अर्थ में) दीखता है। लेकिन लोक (भाषा) में तथा वेदों में भी (प्राण) वायुविकार रूप से प्रसिद्ध है। इसलिए यह संशय होता है कि यहाँ प्राण शब्द से कौन सा अर्थ स्वीकार करना युक्त है।

 पू – पञ्च वृत्तियों वाला वायुविकार जो प्राण कहा जाता है, वह (अर्थ ही) स्वीकार करना युक्त है क्योंकि यह कहा गया कि प्राण शब्द इसी अर्थ में ज्यादा प्रसिद्ध है।

शंका – नहीं। ब्रह्म (अर्थ) का ग्रहण ही युक्त है क्योंकि पूर्ववत् यहाँ भी उसी के लक्षण (वर्णित) हैं। यहाँ भी वाक्य शेष में (complementary portion of text) भूतों का संवेशन-उद्गमन (entry-emergence) परमेश्वर के कर्म को ही इंगित करता है।

पू – नहीं। मुख्य प्राण के लिए भी भूतों के संवेशन-उद्गमन (के प्रयोग) का दर्शन होता है – ‘जब यह पुरुष सुषुप्त होता है, तब वाक्, चक्षु, श्रोत्र, मन प्राण में विलीन हो जाते हैं। जब वह जगता है, तो ये प्राण से ही प्रकट हैं’ – यह तो प्रत्यक्ष है कि सुषुप्ति में प्राण की वृत्तियाँ परिलुप्त नहीं होने पर भी इंद्रियवृत्तियाँ परिलुप्त हो जाती हैं और प्रबोधकाल में पुन: प्रादुर्भूत होती हैं। भूतों का सार इंद्रियाँ हैं – ‘तस्य ही एष रस:’ – इस कारण से मुख्य प्राण में भी भूतों का संवेशन और उद्गमन कहा जाय तो वाक्य शेष का विरोध नहीं होता है।

फिर (एक और कारण है कि प्रकरण में) प्राण के बाद आदित्य और अन्न को क्रमश: उद्गीथ और प्रतिहार का देवता निर्देशित किया गया है। अब आदित्य और अन्न का ब्रह्मत्व तो है नहीं। इसी समानता के कारण प्राण का भी ब्रह्मत्व भी प्राप्त नहीं होता।

 इस पर सूत्रकार कहते हैं – अत एव प्राण: – (इसी कारण से, प्राण (ब्रह्म है)) –

(यह कारण) “उसके लक्षण उपस्थित हैं” पूर्वसूत्र में निर्दिष्ट है। इसी कारण “उसके लक्षण उपस्थित हैं” से प्राण शब्द से भी परम ब्रह्म ही अर्थ है। ‘ये सभी भूत प्राण में ही विलीन होते हैं और प्राण से ही प्रकट होते हैं’ इस श्रुति के द्वारा प्राण का संबंध ब्रह्म लक्षण से सुना जाता है। प्राण से सभी भूतों की उत्पत्ति और प्रलय कहा जाने के कारण यह सिद्ध होता है कि प्राण ब्रह्म है।

पू – क्या यह नहीं कहा गया कि (प्राण का) मुख्य प्राण अर्थ लेने पर भी संवेशन और उद्गमन बाधित नहीं होता है, जो कि (हमारा) सुषुप्ति और जाग्रत का अनुभव भी है?

सि – यहाँ कहते हैं कि सुषुप्ति और प्रबोध में केवल इंद्रियों का ही प्राण में संवेशन और उद्गमन देखा जाता है, समस्त भूतों का नहीं। पर यहाँ तो – सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि – के द्वारा शरीर और इंद्रिय सहित जीवों से आविष्ट (युक्त) भूत (की बात हो रही) है। अगर सभी वस्तुओं को बताती हुई श्रुति का विषय महाभूत (elements) ग्रहण किया जाए, तो भी ब्रह्मलक्षणत्व बाधित नहीं होता है।

पू – क्या ‘जब सुप्त (पुरुष) कोई स्वप्न नहीं देखता है और इस प्राण से एक होता है, तब इस प्राण में वाक् सभी नामों के साथ विलीन हो जाती है’ इस श्रुति के अनुसार इंद्रियों का विषयों के साथ, सुषुप्ति और प्रबोधकाल में, प्राण में और प्राण से विलय और प्रभव नाही सुना जाता है?

सि – वहाँ भी प्राण से ब्रह्म अर्थ ही है क्योंकि उसके लक्षण उपस्थित हैं।

और तुम्हारा यह कथन अयुक्त है कि आदित्य और अन्न के सन्निधान (समीपता) के कारण प्राण का अब्रह्मत्व (सिद्ध) है। ऐसा इसलिए क्योंकि केवल समीपता का कोई अर्थ नहीं जब कि वाक्य शेष के बल पर प्राण शब्द का ब्रह्म अर्थ निश्चित है।

और तुमने यह जो कहा कि प्राण शब्द का पञ्चवृत्ति (रूप में) प्रयोग ज्यादा प्रसिद्ध है, तो इसका उत्तर आकाश शब्द की तरह ही समझा जाना चाहिए।

इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि प्रस्ताव का देवता प्राण, ब्रह्म (अर्थ में प्रयुक्त) है।

यहाँ कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि यह सूत्र – ‘प्राण का प्राण’ और ‘सोम्य! मन प्राण से बंधा है’ – (इन श्रुतियों) को उदाहृत करता है (अर्थात् प्राण का अर्थ इन श्रुतियों मे क्या है, यह बताता है न कि ‘प्रस्ताव का नियंता देवता प्राण’ में प्राण का अर्थ बताता है)। ऐसा कहना अयुक्त है। शब्द के भेद के कारण तथा प्रकरण के कारण यहाँ संशय होना अनुपपन्न है (अर्थात् इन श्रुतियों में तो कोई संशय ही नहीं है जिसके लिए सूत्र की कोई आवश्यकता हो)। जिस प्रकार ‘पिता का पिता’ प्रयोग में यह स्पष्ट है कि दादा जो कि षष्ठी निर्दिष्ट पिता है वह प्रथमा निर्दिष्ट पिता से भिन्न है, उसी प्रकार ‘प्राण का प्राण’ में शब्द भेद के कारण यह निश्चित होता है कि प्राण शब्द से प्रसिद्ध प्राण नहीं वरन् कोई अन्य प्राण विवक्षित है। (ऐसा इसलिए) क्योंकि एक ही वस्तु – वह उसका है – इस प्रकार स्वयं से ही भिन्न निर्देशित नहीं की जा सकती है। इसके अलावा ऐसा समझना चाहिए कि किसी प्रकरण में जो निर्देशित है, उसी प्रकरण में नाम में अंतर होने पर भी वही (वस्तु) निर्दिष्ट होता है। उदाहरण के लिए, ज्योतिष्टोम प्रकरण में – ‘हर वसंत में ज्योतिष् यज्ञ करना चाहिए’ – इस श्रुति में ज्योति शब्द ज्योतिष्टोम विषयक है (अर्थात् ज्योति शब्द का अर्थ ज्योतिष्टोम है)। इसी प्रकार, परब्रह्म के प्रकरण में – ‘सोम्य! मन प्राण से बंधा है’ – यहाँ प्राण शब्द से मात्र वायुविकार किस प्रकार समझा जा सकता है? इस प्रकार संशय के अविषयत्व (असंभवत्व) के कारण ये उदाहरण युक्त नहीं हैं (अर्थात् प्रस्तुत सूत्र इन दो श्रुतियों के संदर्भ में नहीं है क्योंकि इन श्रुतियों में तो संशय हो ही नहीं सकता)। पर प्रस्ताव के देवता प्राण के विषय में संशय (उत्पन्न होता) है जिसका पूर्वपक्ष और निर्णय बताया गया।

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