Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.1.24 to 1.1.27 – Light

1.1.24

ज्योतिश्चरणाभिधानात्

(ज्योति ब्रह्म है क्योंकि चरण का उल्लेख है)

शंका – (छान्दोग्य) उपनिषद् कहता है –‘अब वह (ज्योति), जो द्युलोक (स्वर्ग) से परे सर्वश्रेष्ठ उत्तम लोकों में, सभी लोकों के पृष्ठ पर (ऊपर), सभी वस्तुओं के पृष्ठ पर (ऊपर)दीपित हो रही है, वही इस पुरुष के अंतर में स्थित यह ज्योति है’ (3.13.7) – यहाँ संशय होता है कि ज्योति शब्द से आदित्य आदि की ज्योति समझना चाहिए या पर आत्मा ?प्राण शब्द के विषय के अर्थ का अंतर होने पर भी (पहले) उसके (ब्रह्म के) लक्षण उपस्थित होने के कारण (प्राण का) ब्रह्मविषयत्व कहा गया (था)। यहाँ (इस सूत्र में) यह विचार करना है कि उसके (ब्रह्म के) लक्षण ही उपस्थित हैं या नहीं। यहाँ पर क्या निष्कर्ष होना चाहिए ?

पू – ज्योति शब्द से आदित्य आदि की ज्योति ही ग्रहण करना चाहिए।

क्यों ?

(इसी अर्थ की) प्रसिद्धि के कारण। तम और ज्योति, ये दो शब्द परस्पर प्रतिद्वंद्वी प्रसिद्ध हैं। रात्रि का अंधकार जो कि चक्षु की वृत्ति का निरोधक है, तम कहा जाता है। और आदित्य आदि की किरणें जो उसकी (चक्षु की वृत्ति की) सहायता करती हैं, ज्योति कही जाती हैं। तथा (इसके अलावा) ‘दीपित होती है’ यह श्रुति भी आदित्य आदि के संदर्भ मे प्रसिद्ध है। रूप आदि से हीन ब्रह्म ‘दीपित होती है’ इस श्रुति के मुख्य अर्थ के लिए योग्य नहीं है। और द्युलोक की मर्यादा (limitation) का श्रुति में उल्लेख होने के कारण भी (ब्रह्म ज्योति शब्द का अर्थ नहीं हो सकता)। चर और अचर के बीज सर्वात्मक ब्रह्म के लिए द्युलोक की मर्यादा का होना युक्त नहीं है; पर वह ज्योति जो (ब्रह्म का) कार्य है, (और इसलिए) परिच्छिन्न (एकदेशी) है, उसके लिए द्युलोक की मर्यादा होना युक्त है। और (इस श्रुति के) ब्राह्मण अंश में कहा भी गया कि ‘ज्योति जो द्युलोक से परे (ऊपर) है’।

आक्षेप – पर चूँकि कार्य ज्योति भी सर्वत्र अनुभूत है, इसलिए इसके लिए भी द्युलोक की मर्यादा में असामंजस्य है। इसलिए इस का (ज्योति का) अर्थ प्रथमज (first born) अत्रिवृत्कृत् (unmixed) तेज होना चाहिए।

पू – नहीं। क्योंकि अत्रिवृत्कृत् तेज के प्रयोजन का अभाव है (it serves no purpose)।

आक्षेप – इसका (अत्रिवृत्कृत् तेज का) उपास्यत्व ही इसका प्रयोजन (purpose) है।

पू – नहीं। आदित्य आदि के उपास्यत्व का दर्शन तभी होता है जब वे किसी अन्य प्रयोजन में भी प्रयुक्त हों। और श्रुति भी –‘तासां त्रिवृतं त्रिवृतं एकैकां करवाणि’– यहाँ किसी एक भूत विशेष की बात नहीं करती है (वरन् सभी भूतों की बात की गयी है)। और फिर अत्रिवृत्कृत् तेज के लिए द्युलोक मर्यादा है, ऐसी कोई प्रसिद्धि भी नहीं है। इसलिए, ज्योति शब्द से त्रिवृत्कृत् (स्थूल) तेज ही अर्थ लिया जाये।

आक्षेप – क्या यह नहीं कहा गया कि (त्रिवृत्कृत्) अग्नि की ज्योति आदि (कार्य ज्योति) द्युलोक के नीचे भी अनुभूत है?

पू – यह कोई दोष नहीं। (स्थूल) ज्योति सर्वत्र गम्यमान् होने पर भी –‘द्युलोक से परे’– इस प्रकार उपासना के अर्थ में प्रदेश विशेष में ग्रहण की जाये, तो कोई विरोधाभास नहीं। परंतु निष्प्रदेश ब्रह्म के लिए प्रदेशविशेष की कल्पना की जाये, तो यह युक्त नहीं होगा।

इसके अलावा चूँकि –‘सभी वस्तुओं के ऊपर,सर्वश्रेष्ठ उत्तम लोकों में’– इस श्रुति में (ज्योति के) आधार की बहुलता (many places of residence) का उल्लेख है, इसलिए (ज्योति का अर्थ) कार्य ज्योति उपपन्न है।

इसके अलावा –‘वही (ज्योति) इस पुरुष के अंतर में स्थित यह ज्योति है’– इस श्रुति में पुरुष की कुक्षि (उदर) में स्थित ज्योति में परम ज्योति का अध्यास दर्शित है। अब अध्यास तो सारूप्य होने पर ही होता है –‘उसका (आदित्यस्थ पुरुष का) शिर भू: है, क्योंकि शिर एक होता है और भू: भी एक ही अक्षर है’– इस श्रुति के अनुसार। और कुक्षि स्थित ज्योति का अब्रह्मत्व प्रसिद्ध है। ऐसा इसलिए क्योंकि –‘तस्य एषा दृष्टि: तस्य एषा श्रुति:’– इस श्रुति के अनुसार (कुक्षि स्थित ज्योति में) उष्णता और घोष का श्रवण है।

इसके अलावा –‘यह ऐसा (entity), दृष्ट और श्रुत (seen and heard) है, ऐसे उपासना करनी चाहिए’– यह श्रुति भी है। अब यह अब्रह्म है क्योंकि (इस उपासना का) फल इस श्रुति के अनुसार –‘वह जो इस प्रकार उपासना करता है, वह चक्षुष्य और श्रुत (cynosure and famous) हो जाता है’– अल्प है जबकि ब्रह्म उपासना का फल महान वाञ्छित है।

इसके अलावा, प्राण और आकाश की तरह ब्रह्म के अन्य किसी लक्षणों का भी उल्लेख स्ववाक्य (ज्योति वाक्य) में नहीं है कि ज्योति को ब्रह्म समझा जाये।

(यहाँ तक कि) पिछले वाक्य –‘गायत्री ही यह सभी भूत है’ (3.12.1) – में भी ब्रह्म निर्दिष्ट नहीं है क्योंकि यहाँ छंद (गायत्री) का निर्देश है। अगर किसी प्रकार मान भी लिया जाये कि पिछले वाक्य में ब्रह्म निर्दिष्ट है तो भी यहाँ (ज्योतिष् वाक्य में) उसी की (ब्रह्म की) प्रत्यभिज्ञा नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि वहाँ तो (3.12.1-6) –‘उसके तीन अमृत पैर स्वर्ग में हैं’– स्वर्ग अधिकरण (residence) के रूप में प्रस्तुत है और यहाँ (ज्योतिष् वाक्य में) स्वर्ग मर्यादा (limitation) के रूप में प्रस्तुत है –‘स्वर्गलोक से परे ज्योति’। इसलिए यहाँ प्राकृत ज्योति (gross light) अर्थ ही ग्राह्य है।

सि – यहाँ कहते हैं, ज्योति से ब्रह्म ग्राह्य है।

क्यों?

चरण के उल्लेख के कारण जो कि पैर के संदर्भ मे उल्लिखित है (न कि आचरण के अर्थ में)। ऐसा इसलिए क्योंकि पिछले वाक्य में (3.12.6) (अग्रांकित मंत्र द्वारा) ब्रह्म चतुष्पाद रूप में निर्दिष्ट है –‘उतनी ही (यह सृष्टि) उसकी महिमा है, परंतु पुरुष उससे श्रेष्ठ है। सभी भूत उसके (ब्रह्म के) एक पैर हैं। उसके तीन अमृत पैर स्वर्ग में हैं’– वहाँ जो चतुष्पाद ब्रह्म के तीन अमृत पाद स्वर्गलोक से सम्बद्ध रूप में निर्दिष्ट हैं, वही यहाँ (ज्योतिष् मंत्र में) द्युसम्बद्ध रूप से निर्दिष्ट है, यह प्रत्यभिज्ञा है। इसे त्याग कर अगर प्राकृत ज्योति की कल्पना की जाए तो प्रकृत की हानि और अप्रकृत की कल्पना का दोष होगा। न केवल पूर्ववाक्य से ही ब्रह्म के प्रकरण की ज्योति वाक्य में अनुवृत्ति (प्राप्ति-संबंध) होती है बल्कि इससे (ज्योति वाक्य से) आगे वर्णित शांडिल्य विद्या में भी ब्रह्म की ही अनुवृत्ति होती है। इसलिए, ज्योति शब्द से ब्रह्म समझना चाहिए।

तुमने यह जो कहा कि –‘ज्योति दीपित होती है’– यहाँ ‘ज्योति’और ‘दीप्यते’शब्द कार्य ज्योति के अर्थ में प्रसिद्ध हैं, तो यहाँ कहते हैं – यह कोई दोष नहीं। एक बार जब हम प्रकरण की सहायता से ब्रह्म को समझते हैं तो ये दो शब्द अविशेषक रूप से प्रयुक्त होने के कारण (without specifically excluding Brahman) सांकेतिक रूप से दीप्यमान् कार्य ज्योति के द्वारा ब्रह्म को लक्षित कर सकते हैं। मंत्र में वर्णन भी है –‘जिसके तेज से इद्ध (प्रकाशित होकर) सूर्य तपता है’।

या फिर यह भी कहा जा सकता है कि यहाँ ज्योति शब्द से चक्षु की वृत्ति का अनुग्राहक तेज विवक्षित नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसका (ज्योति का) अन्य अर्थों में भी प्रयोग दृष्ट है –‘वाक् की ज्योति से बैठता है’‘घी पीने वालों का मन ज्योति हो जाता है’ – इस प्रकार। जो किसी अन्य का अवभासक है, वह ज्योति शब्द से कहा जाता है। इसलिए चैतन्यरूप ब्रह्म के लिए ज्योति शब्द उपपन्न है क्योंकि यह समस्त जगत् के अवभास का हेतु है। इसके लिए श्रुति में कहा भी है –‘वह प्रकाशित है तो सभी प्रकाशित होते हैं। उसके तेज से ये सभी प्रकाशित होते हैं’‘उस (ब्रह्म) की ही ज्योतियों की अमृत ज्योति रूप से और आयु (longevity) रूप से देव उपासना करते हैं’।

यह जो कहा था कि सर्वगत ब्रह्म के लिए द्युलोक की मर्यादा उपपन्न नहीं है, तो इसपर कहते हैं कि सर्वगत होने पर भी उपासना के लिए ब्रह्म का प्रदेश विशेष में परिग्रह विरुद्ध नहीं है।

पू – क्या यह नहीं कहा गया कि निष्प्रदेश (यहाँ निरवयव के अर्थ में) ब्रह्म के लिए प्रदेशविशेष की कल्पना उपपन्न नहीं है?

सि – यह कोई दोष नहीं। निष्प्रदेश ब्रह्म की भी उपाधि विशेष से संबंध के कारण प्रदेश विशेष की कल्पना उपपन्न है। इस प्रकार प्रदेश विशेष संबंधी ब्रह्म की उपासनायें ‘आदित्य में’‘चक्षु में’‘हृदय में’ सुनी जाती हैं। इस प्रकार – ‘विश्व के पृष्ठ पर’– इस आधार के बहुत्व का कथन उपपादित (सिद्ध) हुआ।

यह जो कहा कि स्वर्ग से परे ज्योति कार्य (ज्योति) है क्योंकि वह उष्णता और घोष से अनुमित (ज्ञात) कुक्षिस्थ कार्य ज्योति में अध्यस्त है, तो यह कथन भी अयुक्त है क्योंकि पर ब्रह्म को (के लिए) नामादि प्रतीकत्व के समान कुक्षिस्थ ज्योतिष्प्रतीकत्व बन सकता है। और –‘दृष्ट और श्रुत रूप में उपासीत’– इस श्रुति में विहित दृष्टत्व और श्रुतत्व प्रतीकत्व के द्वारा ही होगा।

यह जो कहा था कि अल्प फल श्रवण के कारण (ज्योति) ब्रह्म नहीं है तो यह कहना अनुपपन्न है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह कोई नियम नहीं है कि ब्रह्म का आश्रय किसी विशेष फल के लिए है और अन्य फलों के लिए नहीं। जहाँ सर्वविशेषसंबंधरहित ब्रह्म आत्मरूप से उपदेशित रहता है, वहाँ एक फल मोक्ष ही अवगत (अनुभूत) होता है। पर जहाँ गुणविशेषसंबंधयुक्त या प्रतीकविशेषसंबंधयुक्त ब्रह्म उपदेशित रहता है, वहाँ संसार गोचर अनेक उच्च-निम्न फल देखे जाते हैं –‘(ईश्वर) अन्न को खाने वाला, धन को देने वाला है। जो इसे ऐसे जानता है, वह धन प्राप्त करता है’– ऐसी श्रुति भी है।

यद्यपि ज्योति के स्ववाक्य में (3.13.7) कोई भी ब्रह्म लक्षण नहीं है, फिर भी पूर्ववाक्य में दृष्ट ब्रह्मलक्षण (यहाँ भी) ग्रहीतव्य है। इसी कारण से सूत्रकार कहते हैं –‘ज्योतिश्चरणाभिधानात्’।

पू – ज्योति संबंधी श्रुति (3.13.7) को अपने विषय से च्युत कर किसी अन्य (संदर्भ) में, सिर्फ इस कारण से कि ब्रह्म समीप के वाक्य में उद्धृत है, किस प्रकार प्रयुक्त कर सकते हैं?

सि – यह कोई दोष नहीं। ‘यदत: परो दिवो ज्योति:’ इस श्रुति में सबसे पहले पठित सर्वनाम ‘यत्’ शब्द से स्वसामर्थ्य द्वारा पूर्व वाक्य में निर्दिष्ट ब्रह्म के परामृष्ट (स्मृत) होने पर, और दिव (स्वर्ग) के साथ संबंध प्रत्यभिज्ञ होने पर ज्योति शब्द का ब्रह्मविषयत्व (अर्थात् ज्योति शब्द का अर्थ ब्रह्म है) उपपन्न है। इसलिए यहाँ ज्योति शब्द से ब्रह्म समझना चाहिए।

1.1.25

छन्दोऽभिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोऽर्पणनिगदात्तथा हि दर्शनम्

(अगर यह कहा जाय कि (पूर्ववाक्य में भी) ब्रह्म नहीं कहा गया है क्योंकि छन्द का कथन है, तो हम कहते हैं – नहीं; क्योंकि (गायत्री छन्द के द्वारा ब्रह्म में) चित्त का अर्पण कहा गया है; क्योंकि इस प्रकार के उदाहरण अन्यत्र देखे गए हैं)

पू – यह कहा गया था कि पूर्व वाक्य –‘ये सभी भूत, ये जो कुछ भी है, गायत्री ही है’– में भी गायत्री नामक छन्द के कथन के कारण, ब्रह्म का कथन नहीं है।

सि – इस शंका का निवारण करना है। पर (यह बताएं कि) जब –‘इतनी (सृष्टि) ही इसकी महिमा है’ (3.12.6) – श्रुति के द्वारा चतुष्पाद् ब्रह्म दर्शित है तो बस छन्द के कथन के कारण ब्रह्म नहीं कहा गया है, ऐसा किस प्रकार कहा जा सकता है।

पू – ऐसा नहीं। ‘गायत्री व इदं सर्वम्’ से गायत्री का आरंभ कर फिर उसी का पृथ्वी, शरीर, हृदय, वाक् और प्राण के भेद रूप से व्याख्या कर उसी के (गायत्री के) विषय में कहा गया है –‘सैषा गायत्री चतुष्पदा षड्विधा गायत्री’। एवम् ‘तावानस्य महिमा’ यह ऋचा भी व्याख्यात रूप वाली गायत्री को ही उदाहृत करती है। फिर अकस्मात् चतुष्पाद् ब्रह्म को मंत्र कैसे कह सकता है। और वहाँ जो –‘यद्वै तद् ब्रह्म’ (3.12.7) – में ब्रह्म शब्द है, वह भी छन्द का प्रकरण होने से छन्द विषयक है (अर्थात् ब्रह्म का अर्थ छन्द है)। ‘जो इस ब्रह्म उपनिषद् को जानते हैं’ (3.11.3) – यहाँ (ब्रह्म उपनिषद् की) वेद उपनिषद् व्याख्या करते हैं। इससे पता चलता है कि (गायत्री रूप) वेद भी ब्रह्म शब्द का अर्थ है। इसलिए क्या यह नहीं कहा जा सकता है कि शब्द (गायत्री छन्द) के कथन के कारण ब्रह्म का प्रकरण नहीं है?

सि – यह कोई दोष नहीं क्योंकि छन्द के द्वारा (ब्रह्म में) चित्त का अर्पण उपदिष्ट है। गायत्री नामक शब्द (छन्द) के द्वारा उसमें अनुगत (inherent) ब्रह्म में चित्त का समाधान रूप अर्पण ब्राह्मण के इस वाक्य –‘गायत्री वा इदं सर्वम्’ के द्वारा उपदिष्ट है। अब अक्षरों के संयोग मात्र गायत्री का सर्वात्मक होना तो संभव नहीं है। इसलिए यह सब में जगत्कारण ब्रह्म ही, जो गायत्री नामक अपने विकार (effect) में अनुगत (inherent) है, सर्वं खलु इदं ब्रह्म की तरह कहा गया है। आगे सूत्र 2.1.14 में यह कहा जाएगा कि कार्य कारण से अभिन्न होता है। अन्यत्र भी विकार के द्वारा (कार्य के द्वारा) ब्रह्म की उपासना दिखती है –‘ऋक्वेदी महान् उक्थ (शस्त्र) में, यजुर्वेदी अग्नि में तथा सामवेदी महाव्रत (क्रतु) में इसी (ब्रह्म) की उपासना करते हैं’। इसलिए पूर्व वाक्य में छन्द का कथन होने पर भी चतुष्पाद् ब्रह्म ही निर्दिष्ट है। और वही ब्रह्म ज्योति-वाक्य में भी अलग (fresh/new) उपासना के विधान के लिए परामृष्ट (स्मृत) होता है।

यहाँ कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि संख्या की समानता के द्वारा गायत्री शब्द के द्वारा साक्षात् (directly) ब्रह्म प्रतिपादित है। जैसे षड् अक्षर वाले पादों से गायत्री चतुष्पदा होती है, वैसे ही ब्रह्म चतुष्पाद है। अन्यत्र भी छन्दवाचक शब्द संख्या कि समानता के कारण अन्य अर्थ में प्रयुक्त देखे जाते हैं। जैसे कि –‘ये जो एक अर्थ में पाँच हैं (अग्नि, वायु आदि) और अन्य अर्थ में पाँच हैं (वाक्, चक्षु आदि), ये मिल कर दस होते हैं और कृत (पाँसा) बनते हैं’– इस श्रुति से आरंभ करने के बाद –‘यही (कृत) विराट (छन्द) है जो अन्न को खाता है’– यह श्रुति है।

इस पक्ष (दृष्टिकोण) में भी छन्द (गायत्री) नहीं वरन् ब्रह्म ही (गायत्री पद से) कहा गया है। इस प्रकार, दोनों ही दृष्टिकोण से पूर्ववाक्य में ब्रह्म का ही प्रकृत है।

 

1.1.26

भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् 

(और ऐसा होना ही चाहिए, क्योंकि तभी सभी भूतों का एक पाद में होना उपपन्न होगा)

ऐसा (कि पूर्ववाक्य में छन्द का कथन होने पर भी ब्रह्म ही प्रकृत है) एक और कारण से भी मानना होगा – चूँकि (पूर्ववाक्य में) सभी भूतों का पाद के रूप में उल्लेख है इसलिए ब्रह्म ही पूर्ववाक्य का प्रकृत है। भूत, पृथ्वी, शरीर, हृदय का निर्देश करने के बाद –‘वह यह चतुष्पदा षड्विधा गायत्री है’– यह कहा गया। ब्रह्म के अनाश्रित केवल छन्द का भूत आदि पाद होना उपपन्न नहीं है। तथा ब्रह्म से अनाश्रित होने पर –‘इतनी ही उसकी महिमा है’– यह ऋक् मंत्र (छां 3.13.7) भी उपपन्न नहीं होगा। ‘सभी भूत इसके एक पाद हैं, इसके तीन अमृत पैर द्युलोक में हैं’ – चूँकि केवल ब्रह्म अर्थ लेने पर इस श्रुति में वर्णित सर्वात्मत्व उपपन्न है, इसलिए ‘इतनी ही उसकी महिमा है’ इस मंत्र में ब्रह्म मुख्य अर्थ में विषय है।

पुरुष सूक्त में भी यह ऋक् मंत्र (तावानस्य महिमा) पर ब्रह्म को प्रस्तुत करने के लिए आता है। स्मृति भी ब्रह्म का ऐसा रूप दिखाती है (गीता 10.42)। इसके अलावा –‘यद्वै तद् ब्रह्म’ में (ब्रह्म का) निर्देश मुख्य अर्थ में तभी संभव है, जब यह अर्थ लिया जाये।

इसके अलावा –‘वे ऐसे पाँच ब्रह्म के पुरुष’– इस श्रुति में वर्णित हृदय के पाँच छिद्ररूपी ब्रह्म पुरुष का कथन तभी संगत होगा जब ब्रह्म से संबंध विवक्षित हो। इसलिए पूर्ववाक्य में ब्रह्म का (ही) प्रकृत है। इसलिए यह निर्णय होता है कि वही (पूर्ववाक्य में निर्दिष्ट ब्रह्म) ज्योति वाक्य में स्वर्गलोक से संबंधरूपी प्रत्यभिज्ञा से स्मृत होता है।

1.1.27

उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् 

(अगर यह कहा जाये कि (पूर्ववाक्य में निर्दिष्ट) ब्रह्म यहाँ (ज्योतिवाक्य में) विवक्षित नहीं है क्योंकि उपदेश का भेद है; तो हम कहते हैं; नहीं, क्योंकि दोनों ही स्थितियों में कोई विरोधाभास नहीं है)

पू – यह जो पहले कहा था कि – ‘इसके तीन अमृत पैर स्वर्ग में हैं’ – इस श्रुति में स्वर्ग सप्तमी विभक्ति में आधार के रूप में उपदिष्ट है और यहाँ (ज्योति वाक्य में) – ‘अब यह जो ज्योति स्वर्ग से परे है’ – इस श्रुति में स्वर्ग पंचमी विभक्ति में मर्यादा के रूप में प्रयुक्त है, जिस कारण से उपदेश के भेद से यहाँ प्रत्यभिज्ञा नहीं है, तो उस (संशय) का निवारण करना (शेष) है।

सि – यह कोई दोष नहीं। क्योंकि दोनों ही स्थितियों में कोई विरोध नहीं। सप्तमी विभक्ति के द्वारा या पंचमी विभक्ति के द्वारा दिये गए उपदेश में प्रत्यभिज्ञा में विरोध नहीं है। जैसे लोक में वृक्षाग्र से सम्बद्ध श्येन पक्षी  – ‘वृक्षाग्र पर श्येन’ और ‘वृक्षाग्र से परे श्येन’ – इन दोनों प्रकार से कहा जाता है; उसी प्रकार स्वर्ग में ही रहता हुआ ब्रह्म, स्वर्ग से परे उपदिष्ट होता है।

अन्य लोग कहते हैं – वृक्षाग्र से असम्बद्ध (ऊपर उड़ता हुआ) श्येन भी दोनों प्रकार से उपदिष्ट देखा जाता है – ‘वृक्षाग्र पर श्येन’ और ‘वृक्षाग्र से परे श्येन’। इसी प्रकार ब्रह्म स्वर्ग से परे होते हुये भी स्वर्ग में उपदिष्ट होता है।

इस प्रकार, पूर्वनिर्दिष्ट ब्रह्म की यहाँ (ज्योति वाक्य में) भी प्रत्यभिज्ञा है। अत: ज्योति शब्द का अर्थ परम ब्रह्म ही है, यह सिद्ध हुआ।

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