Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.1.28 to 1.1.31 – Pratardan

1.1.28

प्राणस्तथाऽनुगमात्

(प्राण ब्रह्म है क्योंकि यह इस प्रकार समझा जाता है)

शंका – कौषीतकी ब्राह्मण उपनिषद् में इन्द्र और प्रतर्दन की आख्यायिका इस प्रकार आरंभ होती है – ‘प्रसिद्ध दैवोदास (दिवोदास का पुत्र) युद्ध और पौरुष के द्वारा इन्द्र के प्रिय धाम को गया’। वहाँ यह सुना जाता है – ‘उसने कहा – मैं (इन्द्र) प्रज्ञात्मा प्राण हूँ। तुम मेरी आयु (longevity) और अमृत की तरह उपासना करो’। और उसके बाद में भी – ‘अब यह प्रज्ञात्मा प्राण स्वयं है जो शरीर का ग्रहण करता है (takes hold) और उसे (शयन आदि से) उठाता है’ – यह श्रुति है। और – ‘वाक् की जिज्ञासा नहीं करनी चाहिए, वक्ता को जानना चाहिए’ – यह श्रुति है। अंत में – ‘वह ऐसा प्राण ही प्रज्ञात्मा, आनंद, अजर, अमृत है’ – इत्यादि (श्रुति) है। वहाँ संशय होता है – क्या यहाँ प्राण शब्द के द्वारा वायु मात्र समझना चाहिए या देवता आत्मा (divine soul) या जीव या पर ब्रह्म समझना चाहिए?

आक्षेप – क्या ‘अत एव प्राण:’ सूत्र में यह नहीं दिखाया गया कि प्राण शब्द पर ब्रह्म के अर्थ में वर्णित है; यहाँ (प्रस्तुत सूत्र में) भी ब्रह्म का लक्षण है – आनंद, अजर, अमृत आदि; तो फिर यहाँ संशय कैसे संभव है?

शंकाकार – यहाँ कहते हैं कि अनेक लक्षण (के) दर्शन के कारण (संशय) है। केवल ब्रह्म के ही लक्षण यहाँ उपस्थित नहीं। अन्य (वस्तुओं) के लक्षण भी हैं – ‘केवल मुझे ही जानो’ ऐसा इन्द्र का वचन देवता आत्मा का लक्षण है। ‘इस शरीर का परिग्रहण कर इसे उठाता है’ यह प्राण का लक्षण है। ‘वाक् की जिज्ञासा नहीं करनी चाहिए, वक्ता को जानना चाहिए’ इत्यादि जीव का लक्षण है। इसलिए संशय उपपन्न है।

पू – वहाँ प्राण (का अर्थ) प्रसिद्ध वायु है।

सि – (ऐसी स्थिति में) यह कहा जाता है – प्राण शब्द से ब्रह्म समझना है।

क्यों?

क्योंकि यह इसी प्रकार समझा जाता है। और कहते हैं कि वाक्य को पूर्वापर सहित (the preceding and succeeding text) समझने-विचारने पर (वाक्य के) पद अर्थों का समन्वय ब्रह्म  प्रतिपादनपरक ही उपलब्ध होता है। आरंभ को देखें तो इन्द्र के द्वारा ‘वर मांगो’ ऐसा कहने पर प्रतर्दन ने परम पुरुषार्थ को कहा – ‘आप ही मेरे लिए वह वर चुनें जो आप मनुष्यों के लिए हिततम (most beneficial) मानते हों’। (अब) जब प्राण हिततम के रूप में उसे (प्रतर्दन को) उपदिष्ट है तो यह (प्राण) परमात्मा कैसे नहीं होगा? परमात्म विज्ञान के बिना हिततम की प्राप्ति अन्यत्र नहीं हो सकती – ‘उसको (ब्रह्म को) जानने से ही मृत्यु से परे होते हैं, और दूसरा कोई पंथ नहीं’ – ऐसी श्रुति भी है। तथा यह श्रुति – ‘मुझे जानने से प्राप्त लोक (मोक्ष) किसी भी कर्म से क्षत नहीं होता – न चोरी से, न भ्रूणहत्या से’ – तभी युक्त है जब ब्रह्म अर्थ ग्रहण किया जाए। ब्रह्म विज्ञान के द्वारा ही सर्वकर्मक्षय प्रसिद्ध है – ‘उस परावर (पर + अवर = कारण दृष्ट्यात्मक ब्रह्म + कार्य दृष्ट्यात्मक ब्रह्म) को देखने पर सारे कर्मों का क्षय हो जाता है, सभी संशय नष्ट हो जाते हैं तथा हृदय ग्रंथि का भेदन हो जाता है’ – इत्यादि श्रुति भी है। (प्राण का) प्रज्ञात्मत्व भी ब्रह्मपक्ष से ही (प्राण के ब्रह्म अर्थक होने पर ही) उपपन्न है। अचेतन वायु का (तो) प्रज्ञात्मत्व संभव नहीं है। तथा उपसंहार में भी – ‘आनंद, अजर, अमृत’ – आनंदत्व आदि ब्रह्म से अन्यत्र समयक् रूप से संभव नहीं है। और – ‘वह साधु कर्मों से श्रेष्ठ नहीं होता, असाधु कर्मों से हीं नहीं होता। वह उनसे साधु कर्म करवाता है जिनहे लोक से ऊपर उठाना चाहता है और वह उनसे असाधु कर्म करवाता है जिनहे वह लोक से नीचे गिराना चाहता है’ – यह श्रुति भी है। ये सब (श्रुतियाँ) पर ब्रह्म के आश्रीयमान (resorted) होने पर ही समझी जा सकती हैं, न कि मुख्य प्राण के। इसलिए (आख्यायिका में उल्लिखित) प्राण ब्रह्म है।

1.1.29

न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसंबंधभूमा ह्यस्मिन्

(अगर ऐसा कहा जाय कि प्राण ब्रह्म नहीं है क्योंकि वक्ता के आत्मा के विषय में उपदेश है, तो हम कहते हैं; नहीं; क्योंकि यहाँ अध्यात्म संबंध की प्रचुरता है)

पू – यह जो कहा कि प्राण ब्रह्म है, तो उसका आक्षेप करते हैं – प्राण शब्द का अर्थ पर ब्रह्म नहीं है।

क्यों?

क्योंकि वक्ता के आत्मा का उपदेश है। वक्ता कोई विग्रहवान् (embodied) इन्द्र नाम का देवता विशेष है जो प्रतर्दन को अपनी आत्मा के बारे में प्रथम पुरुष में – ‘मुझे ही जानो’ – से आरंभ कर – ‘मैं प्रज्ञात्मा प्राण हूँ’ – ऐसा कहता है। यह प्राण जो कि वक्ता की आत्मा के रूप में उपदिष्ट है, किस प्रकार ब्रह्म हो सकता है? ब्रह्म का वक्तृत्व संभव नहीं – ‘बिना मन और वाक् के’ – आदि श्रुतियों के अनुसार। तथा इंद्र शरीर-संबंधी धर्मों के द्वारा, जो कि ब्रह्म में असंभव हैं, अपनी प्रशंसा करता है – ‘मैंने तीन शिरों वाले त्वष्टा के पुत्र को मार डाला; सत् शास्त्र के अध्ययन से रहित यतियों को मार्कर जंगली कुत्तों को दे दिया’ – आदि श्रुतियों के अनुसार। इन्द्र का प्राणत्व बलत्व के कारण उपपन्न है – ‘प्राण ही बल है’ – ऐसा जाना जाता है। बल का देवता इन्द्र प्रसिद्ध है। ऐसा सभी कहते हैं कि जो कुछ भी बल प्रकृति है, वह इन्द्र का ही कर्म है। देवता आत्मा के लिए अप्रतिहत ज्ञान के कारण प्रज्ञात्मत्व भी संभव है। यह कहते हैं कि देवता आत्मा को अप्रतिहत ज्ञान होता है। एक बार जब यह निश्चित हो गया कि उपदेश देवता आत्मा का है तो हिततमत्व आदि वचन यथासंभव उसी विषय को विवक्षित करते हुये व्याख्यायित करने चाहिए।

सि – इस प्रकार इन्द्र की आत्मा के उपदेश के कारण प्राण ब्रह्म नहीं है, ऐसा आक्षेप किए जाने पर इसका समाधान किया जाता है – ‘यहाँ अध्यात्म संबंध की बहुलता है’। इस अध्याय में अध्यात्म संबंध अर्थात् प्रत्यगात्मा संबंध (abundance of reference to inmost Self) की अत्यंत बहुलता प्राप्त होती है।‘जब तक इस शरीर में प्राण रहता है, तब तक आयु रहती है’ – यह  (श्रुति) प्रज्ञात्मा, प्रत्यग्भूत प्राण का आयु प्रदान और उपसंहार में स्वतंत्रता दर्शाती है और किसी बाह्य देवता विशेष की स्वतन्त्रता (श्रुति) नहीं दर्शाती है। तथा – ‘प्रज्ञात्मा प्राण ही शरीर का ग्रहण कर उसे उठाता है’ – यह (श्रुति) है। ‘वाक् की जिज्ञासा नहीं करनी चाहिए, वक्ता को जानना चाहिए’ – इस से आरंभ कर – ‘लोक में जैसे रथ के आरों में नेमी अर्पित (प्रोत) स्थित रहती है और नाभी में आरा अर्पित रहते हैं, इसी प्रकार भूत मात्रा (पाँचों भूत और उनके आश्रित पाँचों शब्द आदि विषय) प्रज्ञामात्रा (इंद्रियाँ) में अर्पित हैं और प्रज्ञामात्रा प्राण में अर्पित है’ ‘वह ऐसा प्राण ही प्रज्ञात्मा, आनंद, अजर, अमृत है’ – इस प्रकार (श्रुति) विषय-इंद्रिय-व्यवहार से अनभिभूत (unaffected) प्रत्यगात्मा का उपसंहार करती है। और – ‘वह (प्राण) मेरा आत्मा है ऐसा जानना चाहिए’ – यह उपसंहार तभी साधु (justifiable) है जब प्रत्यगात्मा अर्थ ग्रहण किया जाये, न कि तब जब कोई बाह्य वस्तु ग्रहण की जाये। ‘यह आत्मा, जो सब कुछ का अनुभव करता है, ब्रह्म है’ – ऐसा अन्य श्रुति में है। इस लिए, अध्यात्म संबंध के बाहुल्य से (प्राण के द्वारा) ब्रह्म का ही उपदेश है, न कि किसी देवता आत्मा का।

फिर क्यों वक्ता की आत्मा का उपदेश है?

1.1.30

शास्त्रदृष्टया तूपदेशो वामदेववत्

(लेकिन उपदेश तो वामदेव की तरह आर्ष दृष्टि, जो शास्त्र दृष्टि अनुरूप है, से नि:सृत है)

इन्द्र नामक देवता ने, जिसने – ‘मैं ही पर ब्रह्म हूँ’ – ऐसे आर्ष दर्शन के द्वारा शास्त्रानुसार अपनी आत्मा को परम आत्मा देखा था, ‘मुझे ही जानो’ ऐसा उपदेश किया था; जैसे कि – ‘ऋषि वामदेव ने इसे (आत्मा को) वह (ब्रह्म) देख कर जाना “मैं मनु, सूर्य था”’ – क्योंकि श्रुति कहती है – ‘जिस जिस भी देवता ने इसे जाना, वह (देवता) वह (ब्रह्म) हो गया’।

यह जो कहा कि – ‘मुझे ही जानो’ – ऐसा कहकर इन्द्र शरीर धर्मों के द्वारा, त्वाष्ट्र वाढ आदि के द्वारा, अपनी आत्मा की प्रशंसा करता है – इसका परिहार करना है। यहाँ कहा जाता है – त्वाष्ट्र वध आदि विज्ञेय इंद्र की स्तुति के हेतु से उपन्यस्त (presented) नहीं है कि ‘चूँकि मैंने इन (महान्) कर्मों को किया है, इसीलिए तुम मुझे जानो’।

तो फिर क्यों कहा है?

(ब्रह्म के) विज्ञान की स्तुति के लिए कहा है। इसी कारण से त्वाष्ट्र वध आदि साहसी कर्मों का उपन्यास कर इन्हें विज्ञान की स्तुति से जोड़ा गया है – ‘इन (महान्) कार्यों को करते समय मेरा एक लोम भी क्षत नहीं हुआ; जो मुझे जानता है, उसके किसी भी प्रकार के कर्म से लोक (मोक्ष) का क्षय नहीं होता है’ –इत्यादि श्रुति (के द्वारा)। यहाँ यह कहा गया है – ‘चूँकि मैं ब्रह्मभूत हूँ, इसलिए इतने क्रूर कर्मों को करने पर भी मेरा एक लोम भी हिंसित नहीं हुआ; अन्य कोई भी जो मुझे जानता है, उसके किसी भी कर्म से लोक (मोक्ष) हिंसित नहीं होता है।

(ज्ञान की स्तुति होते हुये भी वस्तुत:) विज्ञेय (तो) ब्रह्म है जो – ‘मैं प्रज्ञात्मा प्राण हूँ’ – इस श्रुति में कहा गया है। इस प्रकार यह ब्रह्म वाक्य है।

1.1.31

जीवमुख्यप्राणलिंगान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रित्वादिह तद्योगात्

(यदि यह कहा जाये कि जीव और मुख्य प्राण के लक्षणों के कारण ब्रह्म नहीं कहा गया है, तो ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि यह त्रिविध उपासना हो जाएगी। (इसके अलावा, प्राण) (अन्यत्र) ब्रह्म अर्थ में (ब्रह्म लक्षणों की उपस्थिति के कारण) स्वीकृत है, (और वे लक्षण) यहाँ उपस्थित हैं)

पू – यद्यपि अध्यात्म संबंध की बहुलता के दर्शन से (frequency of reference to inmost Self) (यह पता चलता है कि) बाह्य देवता आत्मा का उपदेश नहीं है, फिर भी यह ब्रह्म वाक्य नहीं है।

क्यों?

क्योंकि जीव के लक्षण और मुख्य प्राण के लक्षण भी हैं। जीव का लक्षण इस वाक्य में स्पष्ट प्राप्त होता है – ‘वाक् की जिज्ञासा नहीं करनी चाहिए, वक्ता को जानना चाहिए’ – इत्यादि। यहाँ वाक् आदि करण के उपयोग में संलग्न, कार्यकरण के अध्यक्ष, जीव का विज्ञेयत्व प्राप्त होता है। और मुख्य प्राण का भी लक्षण है – ‘अब यह प्रज्ञात्मा प्राण स्वयं है जो शरीर का ग्रहण करता है और उसे (शयन आदि से) उठाता है’। शरीर धारण मुख्य प्राण का धर्म है। प्राण के संवाद (anecdote) में वाक् आदि अन्य प्राणों के विषय में सुना जाता है – ‘वरिष्ठ प्राण ने उनसे कहा “मोह को प्राप्त मत होओ। मैं ही अपनी आत्मा को पंचधा विभक्त कर इस शरीर को आश्रयण (ग्रहण) कर धारण करता हूँ”’। जो कोई ‘इमं शरीरम् परिगृह्य’ ऐसा पढ़ते हैं, उनके मत में इस जीव को या इस इंद्रियसमूह को ग्रहण कर शरीर को उठाता हूँ, ऐसी व्याख्या होगी। चेतन होने के कारण जीव के लिए प्रज्ञात्मत्व उपपन्न है। मुख्य प्राण के लिए भी (प्रज्ञात्मत्व) उपपन्न है क्योंकि यह प्रज्ञा-साधन अन्य प्राणों (इंद्रियों) का आश्रय है। जीव और मुख्य प्राण दोनों के ग्रहण करने पर प्रज्ञात्मा और प्राण की सहवृत्तिता (co-existence) से अभेद का कथन भी युक्त होता है, और स्वरूप से भेद का कथन भी युक्त होता है – ‘जो प्राण है वह प्रज्ञा है और जो प्रज्ञा है वह प्राण है’ ‘ये दोनों साथ ही शरीर में रहते हैं और साथ ही जाते हैं’ – ऐसी श्रुति भी है। अगर (प्राण का अर्थ) ब्रह्म माना जाये, तो किसका दूसरे से भेद होगा? इसलिए जीव या मुख्य प्राण या फिर दोनों ही (प्राण के) अर्थ हो सकते हैं, पर ब्रह्म (अर्थ) नहीं हो सकता।

सि – ऐसा नहीं; त्रिविधा उपासना के कारण। इस प्रकार मानने पर जीवोपासना, मुख्य प्राणोपासना और ब्रह्मोपासना, त्रिविधा उपासना की प्राप्ति होगी। पर एक ही वाक्य में त्रैविध्य अयुक्त है क्योंकि उपक्रम और उपसंहार के द्वारा (प्राण) वाक्य के एकवाक्यत्व (unity of idea) का बोध होता है। ‘मुझे ही जानो’ से उपक्रम कर – ‘मैं प्रज्ञात्मा प्राण हूँ। तुम मेरी आयु और अमृत की तरह उपासना करो’ – ऐसा कह कर अंत में – ‘वह ऐसा प्राण ही प्रज्ञात्मा, आनंद, अजर, अमृत है’ – इस प्रकार उपक्रम और उपसंहार की एकरूपता दर्शित है। (इस कारण) वहाँ अर्थों की एकता भी मानने योग्य है। चूँकि दस भूतमात्रा और दस प्रज्ञामात्रा का ब्रह्म के सिवाय अन्य किसी में अर्पण अनुपपन्न है, इसलिए ब्रह्म के लक्षण को अन्यपरत्वेन (अन्य-अर्थ-संबंधित्व-रूप से) प्राप्त नहीं करा सकते हैं। ब्रह्म लक्षण के बल पर प्राण शब्द की ब्रह्म में प्रवृत्ति का तो अन्यत्र भी आश्रयण (स्वीकार) किया गया है। यहाँ भी हिततम के उपन्यास आदि ब्रह्मलक्षण के कारण यह ब्रह्म उपदेश ही है, यह समझा जाता है।

यह जो – ‘इस शरीर को ग्रहण कर उठाता है’ – मुख्य प्राण का लक्षण दिखाया था, तो वह असत् है। प्राण का व्यापार परमात्मा पर निर्भर होने के कारण, परमात्मा में उपचरित (ascribed) हो सकता है – ‘न तो प्राण से, न तो अपान से कोई मर्त्य (mortal) जीता है। (वह तो) किसी अन्य के द्वारा जीता है, जिस पर ये दोनों (प्राण और अपान) आश्रित हैं’ – यह श्रुति भी है।

यद्यपि ‘वाक् की जिज्ञासा नहीं करनी चाहिए, वक्ता को जानना चाहिए’ इत्यादि के द्वारा जीव लक्षण वर्णित है, फिर भी ब्रह्म पक्ष का निवारण (exclusion) नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ ‘तत् त्वम् असि’ आदि श्रुतियों के द्वारा जीव की ब्रह्म से अत्यंत भिन्नता नहीं है। बुद्धि उपाधिकृत विशेष (distinction) के आश्रय से (on account of) ब्रह्म ही जीव, कर्ता, भोक्ता कहा जाता है। उसी उपाधिकृत विशेष के परित्याग के द्वारा ब्रह्म स्वरूप दिखाने के लिए – ‘वाक् की जिज्ञासा नहीं करनी चाहिए, वक्ता को जानना चाहिए’ – (इस श्रुति के द्वारा) प्रत्यगात्मा के अभिमुख करने के लिए उपदेश है, वह विरुद्ध नहीं होता है। क्योंकि ‘वाक् जिससे काही जाती है पर जो वाक् से नहीं कहा जाता, उसे तुम ब्रह्म जानो न कि इसे जिसकी ये उपासना करते हैं’ – आदि अन्य श्रुतियाँ भी वचन आदि क्रियाओं से रहित आत्मा का ब्रह्मत्व दर्शाती हैं।

फिर जो यह कहा था कि – ‘इस शरीर में साथ रहता है और साथ ही उत्क्रमण करता है’ – इस श्रुति में प्राण और प्रज्ञात्मा में भेद दर्शन के कारण ब्रह्मवादी (का कथन) उपपन्न नहीं है (क्योंकि ब्रह्मवादी के लिए तो भेद नहीं); तो यह कोई दोष नहीं। बुद्धि और प्राण, जो क्रमश: ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति के श्रय हैं, और प्रत्यगात्मा के दो उपाधि हैं, उनमें भेद का निर्देश उपपन्न (ही) है। इन दोनों उपाधियों से उपहित (युक्त) प्रत्यगात्मा में स्वरूप से अभेद है, इसलिए ‘प्राण ही प्रज्ञात्मा है’ यह एकीकरण भी अविरुद्ध है।

अथवा सूत्र का खंड ‘नो पासा त्रैविध्यादाश्रित्वादिह तद्योगात्’ का यह अन्य अर्थ है (वृत्तिकार): ब्रह्मवाक्य में जीव और मुख्य प्राण के लक्षण होने पर भी कोई विरोधाभास नहीं है।

कैसे?

त्रिविधा उपासना के कारण। यहाँ प्राणधर्म, प्रज्ञाधर्म और स्वधर्म के द्वारा ब्रह्म की त्रिविध उपासना विवक्षित है। वहाँ – ‘आयु अमृत की उपासना करो, आयु प्राण है’ – ‘इस शरीर का ग्रहण करके उठाता है’ – ‘शरीर को प्राण उठाता है,  जिससे इसी को उक्थ समझ कर उपासना करे’ – ये सब प्राणधर्म हैं। ‘अब जिस प्रकार इस प्रज्ञा के द्वारा सभी भूत एक हो जाते हैं, वह बताते हैं’ – ऐसा उपक्रम कर – ‘वाक् ही इसकी (प्रज्ञा की) (आधी) अंग हुई, भूतमात्रा पीछे प्रतिविहित हुई। जीव प्रज्ञा के द्वारा वाक् पर आरूढ़ होकर वाक् से सभी नामों को प्राप्त करता है’ – इत्यादि प्रज्ञाधर्म हैं। ‘वे पहले वर्णित दस भूतमात्रा प्रज्ञा में स्थित हैं, दस प्रज्ञामात्रा भूत में स्थित है; यदि भूतमात्रा न हो तो प्रज्ञामात्रा नहीं हो सकते और अगर प्रज्ञामात्रा न हो तो भूतमात्रा नहीं हो सकते; दोनों में से एक से कोई रूप सिद्ध नहीं हो सकता; परस्पर सापेक्ष होने से ये नाना नहीं हैं’।   ‘लोक में जैसे रथ के आरों में नेमी अर्पित (प्रोत) स्थित रहती है और नाभी में आरा अर्पित रहते हैं, इसी प्रकार भूत मात्रा (पाँचों भूत और उनके आश्रित पाँचों शब्द आदि विषय) प्रज्ञामात्रा (इंद्रियाँ) में अर्पित हैं और प्रज्ञामात्रा प्राण में अर्पित है, वह ऐसा प्राण ही प्रज्ञात्मा है’ – इत्यादि ब्रह्म धर्म हैं। इस प्रकार ब्रह्म की ही उपाधिद्वय धर्म के द्वारा और स्वधर्म के द्वारा एक उपासना त्रिविधा विवक्षित है। अन्यत्र भी ‘मनोमय: प्राणशरीर:’ इत्यादि में मन-प्राण उपाधि धर्मके द्वारा ब्रह्म की उपासना मनी गयी है; यहाँ भी अन्य धर्म के द्वारा उपासनायुक्त हो सकती है, क्योंकि वाक्य के उपक्रम और उपसंहार से एकार्थत्व का ज्ञान होता है और प्राण, प्रज्ञा तथा ब्रह्म के धर्मों का भी ज्ञान होता है। इस प्रकार, यह ब्रह्म वाक्य है, यह सिद्ध हुआ।

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