Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.2.1 to 1.2.8 – The Entity Known Everywhere

1.2.1

सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्  

(चूँकि वह जो सर्वत्र प्रसिद्ध है, उसका उपदेश है, इसलिए ब्रह्म उपास्य है)

शंका – उपनिषद् में कहा गया है – ‘यह सब कुछ ब्रह्म ही है क्योंकि यह ब्रह्म से ही जन्म लेता है, उसी में स्थित है और उसी में विलीन होता है । (ब्रह्म की) शांत होकर उपासना करनी चाहिए। पुरुष क्रतुमय (product of resolves) है। इस लोक में पुरुष का जैसा क्रतु (resolution, संकल्प) होता है, मरने के बाद वह वैसा ही हो जाता है। उसे क्रतु करना चाहिए’ – ‘वह मनोमय है, प्राणशरीर है’ – यहाँ संशय है कि मनोमयत्व आदि धर्मों के द्वारा शारीर आत्मा (जीव) के उपास्यत्व का उपदेश है अथवा पर ब्रह्म का। यहाँ क्या निष्कर्ष होना चाहिये ?

पू – (यह) शारीर (ही होना चाहिए)।

क्यों?

कार्य-करण (body – senses) का अधिपति होने के कारण मन आदि से उसका (शारीर का) संबंध प्रसिद्ध है, पर – ‘अप्राण, अमन, शुभ्र’ – आदि श्रुति के अनुसार पर ब्रह्म का (संबंध प्रसिद्ध) नहीं है।

आक्षेप – जब ‘सर्वं खल्विदम् ब्रह्म’ में ब्रह्म अपने वाचक शब्द ‘ब्रह्म’ से ही कहा गया है, तो फिर यहाँ किस प्रकार शारीर आत्मा के उपास्यत्व की आशंका संभव है?

पू – यह कोई दोष नहीं। यह वाक्य ब्रह्म की उपासना की विधि (injunction) के लिए नहीं है।

तो फिर किस लिए है?

शम की विधि (injunction) के लिए है क्योंकि – ‘यह सब कुछ ब्रह्म ही है क्योंकि यह ब्रह्म से ही जन्म लेता है, उसी में स्थित है और उसी में विलीन होता है । (ब्रह्म की) शांत होकर उपासना करनी चाहिए’ – यह कहा गया है। यहाँ यह कहा गया है कि चूँकि यह सब कुछ विकारजात ब्रह्म ही है, क्योंकि यह उसी से जन्म लेता है, उसी में स्थित है और उसी में विलीन होता है – और सभी का एकात्मत्व होने से राग आदि संभव नहीं है – इसलिए शांत होकर उपासना करनी चाहिए। और अगर यह वाक्य शमविधिपरक है तो इसी के द्वारा ब्रह्म उपासना का नियम संभव नहीं है क्योंकि उपासना तो – ‘उसे क्रतु करना चाहिए’ – इस वाक्य के द्वारा विधीत है। क्रतु संकल्प, ध्यान के अर्थ में है। उसके (क्रतु के) विषय (object) में – ‘मनोमय, प्राणशरीर’ – जो जीव के लिंग हैं, ऐसा सुना जाता है (object of kratu is, thus, jiv)। इसलिए हम कहते हैं कि यह उपासना जीव विषयक है। ‘सर्वकर्मा, सर्वकाम’ इत्यादि भी जो सुना जाता है वह अनंत जन्मों के क्रम से जीव में संभव है। ‘हृदय के अंतर में, धान और जौ के दाने से भी अणु यह मेरा आत्मा है’ – इस श्रुति के द्वारा भी अंकुश के अग्र के समान माप वाला जीव, न कि अपरिच्छिन्न (unlimited) ब्रह्म, ही हृदयायतन (heart as abode) अणीयस्त्व के द्वारा अवकल्पित है।

आक्षेप – लेकिन ‘पृथ्वी से भी बड़ा’ – आदि (श्रुति) तो परिच्छिन्न (जीव) के लिए अवकल्पित नहीं हो सकती है।

पू – यहाँ हम कहते हैं कि अणीयस्त्व (minuteness) और ज्यायस्त्व (vastness) दोनों एक ही (वस्तु) के आश्रित नहीं हो सकती है क्योंकि यह विरोधाभास होगा। अगर किसी एक का स्वीकार करना हो तो पहले सुने होने के कारण अणीयस्त्व का आश्रय लेना युक्त है; ज्यायस्त्व तो (जीव के) ब्रह्म भाव की अपेक्षा (दृष्टिकोण) से उल्लिखित हो सकता है। इस प्रकार (श्रुति के) जीव विषयक निश्चित होने के कारण – ‘एतद् ब्रह्म’ – ऐसा जो श्रुति के अंत में ब्रह्म का संकीर्तन है, वह भी प्रकृत के परामर्श के कारण, जीव विषयक ही है (that is, the word ‘Brahman’ in ‘एतद् ब्रह्म’ relates to jiva)। इस प्रकार, मनोमयत्व आदि धर्म (युक्त रूप) के द्वारा जीव उपास्य है।

सि – ऐसा प्राप्त होने पर हम कहते हैं – परम ब्रह्म ही मनोमयत्व आदि धर्म (युक्त रूप) के द्वारा उपास्य है।

क्यों?

सर्वत्र प्रसिद्ध उपदेश के कारण। क्योंकि यह युक्त होगा कि सभी वेदांतों में प्रसिद्ध ब्रह्म शब्द, जिसका आलंबन (connotation) जगत्कारण है, जो कि – ‘सर्वं खल्विदम् ब्रह्म’ – वाक्य के आरंभ में श्रुत है, वही मनोमयत्व आदि विशिष्ट धर्मों के द्वारा उपदिष्ट है। इस प्रकार प्रकृत की हानि और अप्रकृत की प्रक्रिया भी नहीं होगी।

पू – क्या हमने यह नहीं कहा कि वाक्य के उपक्रम में ब्रह्म (का उल्लेख) शम की विधि के लिए विवक्षित है न कि स्वयम् (ब्रह्म) की विवक्षा के लिए?

सि – यहाँ हम कहते हैं – यद्यपि ब्रह्म शम-विधि-विवक्षा के लिए निर्दिष्ट है, फिर भी मनोमयत्व आदि के उपदेश के कारण ब्रह्म ही संनिहित (निकट, उपस्थित, प्राप्त) है, जीव न तो संनिहित है और न ही स्व शब्द के द्वारा कहा गया है। यही वैषम्य है (यही जीव और ब्रह्म में यहाँ भेद है)।

1.2.2

विवक्षितगुणोपपत्ते च

(और इसलिए भी ब्रह्म उपास्य है क्योंकि विवक्षित गुण ब्रह्म के लिए ही संभव हैं)

कहने की इच्छा का विषय (इष्ट) विवक्षित (कहलाता) है। यद्यपि अपौरुषेय वेद में वक्ता के अभाव के कारण इच्छा-अर्थ संभव नहीं है, फिर भी (इच्छा-अर्थ) उपदान-फल के द्वारा उपचरित होता है। लोक में भी शब्द का जो अर्थ उपादेय (स्वीकार्य) हो, वही अर्थ विवक्षित कहा जाता है तथा जो अनुपादेय हो, वो अर्थ अविवक्षित कहा जाता है। उसी प्रकार वेद में भी उपादेयत्व के द्वारा अभिहित विवक्षित कहा जाता है तथा अन्य अविवक्षित कहा जाता है। इस प्रकार, उपदान (acceptability) और अनुपादान तो वेद वाक्य के तात्पर्य और अतात्पर्य के द्वारा जाना जाता है। इसलिए यहाँ जो सत्यसंकल्प आदि विवक्षित गुण उपासना में उपादेयत्व के द्वारा उपदिष्ट हैं, वे पर ब्रह्म में ही संभव हैं। सृष्टि-स्थिति-संहार में अप्रतिबद्ध शक्ति के कारण परमात्मा में ही सत्यसंकल्प अवकल्पित किया जा सकता है और ‘सत्यकाम, सत्यसंकल्प’ आदि परमात्म गुण के कारण ही – ‘आत्मा जो कि अपहतपाप्मा है’ – इस श्रुति में प्रयुक्त हैं। ‘आकाशात्मा’, जो कि आकाशवत् आत्मा के अर्थ में है, के द्वारा यह दिखाया गया है कि सर्वगतत्व आदि धर्म के द्वारा ब्रह्म का आकाश से साम्य है। ‘पृथ्वी से भी महान्’ आदि के द्वारा भी यही दर्शित है। अगर (आकाशात्मा की) – आकाश इसका आत्मा है – इस प्रकार भी व्याख्या करें, तब भी सर्वजगत्कारण सर्वात्मा ब्रह्म का आकाशात्मत्व संभव है। इन्ही कारणों से ‘सर्वकर्मा’ आदि भी (संभव हैं)। इस प्रकार, यहाँ विवक्षित उपास्य गुण ब्रह्म में ही संभव हैं।

यह जो कहा कि – ‘मनोमय, प्राणशरीर’ – यह जीव लिंग हैं और इसलिए ब्रह्म में संभव नहीं हैं, तो हम कहते हैं कि यह फिर भी ब्रह्म के लिए संभव हैं। (ऐसा इसलिए) क्योंकि ब्रह्म के सर्वात्मत्व के कारण मनोमयत्व आदि, जो जीव से संबन्धित हैं, ब्रह्म से संबन्धित हो जाते हैं। इसी प्रकार ब्रह्म के विषय में श्रुति-स्मृति है – ‘तुम स्त्री हो, तुम पुरुष हो, तुम कुमार वा कुमारी हो। तुम दण्ड के द्वारा जाते हुये जीर्ण (पुरुष) हो, तुम ही जन्म लेने के बाद विश्वतोमुख हो’ – गीता 13.14’ – आदि। ‘अप्राण, अमन, शुभ्र’ आदि श्रुति शुद्ध-ब्रह्म-विषया है और ‘मनोमय: प्राणशरीर:’ सगुण-ब्रह्म-विषया है, यही अंतर है।

इस प्रकार विवक्षित गुणों की उपपत्ति (deduction) से परम ब्रह्म ही उपास्यत्व के द्वारा उपदिष्ट है, ऐसा समझा गया।

1.2.3

अनुपपत्तेस्तु न शारीर:

(शारीर विवक्षित नहीं है क्योंकि यह अर्थ संभव नहीं है)

पिछले सूत्र के द्वारा ब्रह्म में विवक्षित गुणों की उपपत्ति कही गयी। इस (सूत्र) के द्वारा शारीर में उनकी (विवक्षित गुणों की) अनुपपत्ति कही जाती है; ‘तु’ शब्द अवधारणा (emphasis) के अर्थ में है। (पहले) कहे हुये न्याय (logic) के द्वारा ब्रह्म ही मनोमयत्व आदि गुण वाला है। शारीर जीव मनोमयत्व आदि गुण वाला नहीं है, कारण – ‘सत्यसंकल्प’ ‘आकाशात्मा’ ‘अवाकी’ ‘अनादर’ ‘पृथ्वी से भी महान’ – और इसी जाति के अन्य गुणों का शारीर में सामंजस्य संभव नहीं है। शारीर का अर्थ, (जो) शरीर में है।

पू – क्या ईश्वर शरीर में नहीं होते हैं?

सि – सत्य है। (ईश्वर) शरीर में होते हैं। पर केवल शरीर में ही नहीं होते; क्योंकि – ‘पृथ्वी से महान’ ‘अन्तरिक्ष से महान’ ‘आकाशवत् नित्य और सर्वगत्’ – श्रुतियों के द्वारा (ईश्वर के) व्यापकत्व (pervasiveness) का श्रवण है। परंतु जीव तो शरीर में ही होता है क्योंकि उसके भोग के अधिष्ठान शरीर से अन्यत्र वृत्ति (जीविका स्थिति) का अभाव है।

1.2.4

कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च

(और क्योंकि कर्म (object) और कर्ता (subject) का कथन है)

चूँकि – ‘यहाँ से जाने के बाद मैं इसे (ब्रह्म, एतम्) प्राप्त करूँगा’ – श्रुति के द्वारा कर्ता और कर्म (someone attaining and something attained) का कथन है, इस कारण से भी (यहाँ) मनोमयत्व आदि गुण वाला (कथन से) शारीर (विवक्षित) नहीं है। ‘एतम्’ शब्द के द्वारा प्रकृत मनोमयत्व आदि गुण वाला उपास्य आत्मा का कर्म (object) के रूप में प्राप्य रूप से कथन है। ‘मैं इसको प्राप्त करूँगा’ – इस पद से उपासक शारीर कर्ता के रूप में कहा गया है। अब जब अन्य गति (more reasonable standpoint) उपलब्ध है तो एक ही वस्तु के लिए कर्म और कर्ता का कथन युक्त नहीं है। इसी प्रकार उपास्य और उपासक का भाव भी भिन्न अधिष्ठान में ही रहता है। इसलिए भी शारीर मनोमयत्व आदि (धर्म) विशिष्ट (युक्त) (उपास्य) नहीं है (बल्कि उपासक है)।

1.2.5

शब्दविशेषात्

(शब्द (विभक्ति) में भिन्नता के कारण (मनोमयत्व आदि गुणविशिष्ट शारीर नहीं है))

चूँकि समान प्रकरण में दूसरी श्रुति (श॰ ब्रा॰) में – ‘जैसे व्रीहि वा यव वा श्यामाक वा श्यामाक तंडुल हो, वैसे ही यह हिरण्मय पुरुष अंतरात्मन् में है’ – शब्द का (विभक्ति का) विशेष (भेद) है, इसलिए भी मनोमयत्व आदि गुण (वाला) शारीर से अन्य है। शारीर आत्मा का अभिधायक सप्तम्यंत शब्द ‘अंतरात्मन्’ है, उससे विशिष्ट (भिन्न) प्रथमांत ‘पुरुष’ शब्द मनोमयत्व आदि विशिष्ट आत्मा का अभिधायक है। इसलिए दोनों का भेद समझा जाता है।

1.2.6

स्मृतेश्च

(और स्मृति में भी यही निर्णीत है)

और स्मृति भी शारीर और परमात्मा का भेद दिखाती है – गीता 18.61।

पू – यह शारीर नामक वस्तु, जो परमात्मा से अन्य है, तथा जो ‘अनुपपत्तेस्तु न शारीर:’ इत्यादि के द्वारा प्रतिषिद्ध (निषिद्ध) है, यह (शारीर) कौन है? श्रुति तो – ‘इससे अन्य कोई श्रोता नहीं, इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं’ –  के (वाक्य के) द्वारा परमात्मा से अन्य आत्मा का वारण (निषेध) करती है। और स्मृति भी – ‘क्षेत्रज्ञम् चापि मां विद्धि’ – के द्वारा परमात्मा से अन्य आत्मा का वारण करती है।

सि – सत्य है। परं आत्मा ही देह, इंद्रिय, मन, बुद्धि, उपाधि के द्वारा परिच्छिद्यमान (delimited) हो अज्ञों के द्वारा शारीर (इस प्रकार) उपचरित होता है। ठीक उसी प्रकार जैसे घट, कर आदि उपाधि के वश अपरिच्छिन्न नभ परिच्छिन्नवत् अवभासित होता है। उसी दृष्टिकोण (अपेक्षा) से ‘तत् त्वम् असि’आत्मैकत्व उपदेश के ग्रहण के पूर्व कर्म-कर्ता आदि भेद व्यवहार विरुद्ध नहीं है। आत्मैकत्व के ग्रहण पर तो बंध-मोक्ष आदि सर्व व्यवहार की परिसमाप्ति ही हो जाती है।

1.2.7

अर्भकोकस्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्यत्वादेवम् व्योमवच्च

(अगर यह कहा जाये कि आश्रय की अल्पता के कारण परमात्मा का कथन नहीं है, तो हम कहते हैं, नहीं, क्योंकि ऐसा तो व्योम की ही तरह उपासना के लिए किया गया है)

अर्भक अर्थात् अल्प और ओकस् अर्थात् नीड़। तुमने यह जो कहा था कि – ‘यह मेरा आत्मा हृदय के अंतर में है’ – श्रुति के द्वारा परिच्छिन्न (limited) आयतन (abode) के कारण तथा – ‘व्रीहि वा यव से भी अणु’ – श्रुति के द्वारा स्व-शब्द से अणीयस्त्व (minuteness) के कथन के कारण यहाँ अंकुशाग्र मात्र शारीर जीव ही उपदिष्ट है; उसका परिहार करना है।

यहाँ हम कहते हैं – यह कोई दोष नहीं। देश से परिच्छिन्न (spatially limited) (वस्तु) के लिए किसी भी प्रकार (दृष्टिकोण) से सर्वगतत्व का कथन संभव नहीं है। परंतु सर्वगत (वस्तु) के लिए तो सर्वदेश में विद्यमानत्व के कारण परिच्छिन्न देश का कथन भी किसी (खास) दृष्टिकोण में संभव ही है। जैसे समस्त वसुधा के अधिपति के लिए भी अयोध्या के अधिपति का कथन (हो सकता) है।

पू – किस अपेक्षा (दृष्टिकोण) से सर्वगत ईश्वर के लिए अर्भक ओक (tiny abode) और अणीयस्त्व (minuteness) का कथन है?

सि – यहाँ कहते हैं, निचाय्य (द्रष्टव्य) होने के कारण (ऐसा कहा जाता है)। अणीयस्त्व आदि गुणवान् ईश्वर हृदय-कमल में निचाय्य द्रष्टव्य उपदिष्ट होता है, जैसे शालिग्राम में हरि। वहाँ (हृदय कमल में) ही बुद्धि इसका (ईश्वर का) विज्ञान (अनुभव) ग्रहण कर्ता है; ईश्वर सर्वगत होने पर भी वहाँ (हृदय कमल में) उपास्यमान् होने पर प्रसन्न होते हैं। इसे व्योम के समान देखा जाना चाहिए। जिस प्रकार सर्वगत होने पर भी व्योम सूचीपाश (eye of needle) की अपेक्षा अर्भक ओक और अणीय कहा जाता है, उसी प्रकार ब्रह्म भी (ऐसा कहा जाता है)। इस प्रकार, निचाय्यत्व की अपेक्षा ब्रह्म का अर्भकोकत्व और अणीयस्त्व है, पारमार्थिकत: नहीं। चूँकि ब्रह्म हृदयायतन (heart as abode of Brahman) है तथा हृदय हर शरीर में भिन्न है और शुक (parrot) आदि भिन्न आयतन वाले, अनेक, सावयवत्व, अनित्य आदि हैं, इसलिए ब्रह्म को भी ये दोष होंगे, इस शंका का भी यहाँ परिहार कर दिया गया (क्योंकि भिन्न आश्रय वाला आकाश भी पारमार्थिकत: भिन्न नहीं होता है)।

1.2.8

संभोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात्

(अगर यह कहते हो कि ईश्वर को भोग की प्राप्ति होगी, तो हम कहते हैं – नहीं, क्योंकि यहाँ विशेषता (भिन्नता) है)

पू – व्योमवत् सर्वगत ब्रह्म का सभी प्राणियों के हृदय से संबंध के कारण तथा चित्-रूप के द्वारा शारीर से अविशिष्टत्व (अभेद) के कारण, (ब्रह्म को) सुख-दुख आदि का भोग भी (जीव के) समान ही होगा।

एकत्व के कारण भी (ब्रह्म को सुख-दुख आदि का भोग भी (जीव के) समान ही होगा) – ‘इससे अन्य कोई विज्ञाता नहीं’ – श्रुति के द्वारा पर आत्मा से अन्य कोई संसारी नहीं है। इसलिए पर ब्रह्म ही भोग को प्राप्त होता है।

सि – नहीं। क्योंकि एक विशेषता (difference) है। केवल सभी प्राणियों के हृदय से संबंध के कारण तथा चित्-रूप के कारण ब्रह्म के लिए शारीर के समान भोग का प्रसंग नहीं हो सकता क्योंकि एक विशेषता है। शारीर और परमेश्वर के बीच एक विशेषता है। एक कर्ता, भोक्ता, धर्म-अधर्म का साधन तथा सुखी-दुखी है और एक उसके विपरीत अपहतपाप्मा (free from sin) गुण वाला है। दोनों में इस विशेषता के कारण, एक का ही भोग है, दूसरे का नहीं। यदि केवल संनिधि (proximity) मात्र से, वस्तु शक्ति का ध्यान रखे बिना (without considering the intrinsic nature of thing), कार्य (effect) के साथ संबंध को प्रस्तुत किया जाएगा तो आकाश आदि के लिए भी (जलते हुये काठ से सामीप्य के कारण) दाह का प्रसंग उपस्थित हो जाएगा।

यह शंका और परिहार सर्वगत लेकिन अनेकात्मा-वादियों (those who believe that aatma is many and all-pervasive) के लिए भी तुल्य है।

यह जो कहा था कि ब्रह्म के एकत्व के कारण, अन्य आत्मा के अभाव से, शारीर के भोग के द्वारा ब्रह्म के भोग का प्रसंग होता है, तो यहाँ कहते हैं – देवों के प्रिय (मूर्ख), तुमसे यह पूछा जाना चाहिए कि तुमने यह अध्यवसित (निश्चित) कैसे किया कि अन्य आत्मा का अभाव है?

पू – ‘तत्त्वमसि’ ‘अहं ब्रह्मास्मि’ ‘नान्योऽस्ति विज्ञाता’ – श्रुतियों के अनुसार।

सि – तो फिर शास्त्र का अर्थ शास्त्र के अनुसार ही करना चाहिए, अर्ध-जरतीय रूप से नहीं। ‘तत्त्वमसि’ शास्त्र अपहतपाप्मत्व आदि विशेषण वाले ब्रह्म को शारीर की आत्मा रूप से उपदेश कर शारीर के लिए भी उपभोक्तृत्व का वारण (निषेध) करता है। फिर किस प्रकार उसके (शारीर के) उपभोग से ब्रह्म के उपभोग का प्रसंग उपस्थित हो सकता है?

जब तक शारीर और ब्रह्म के एकत्व का ग्रहण नहीं है, तब तक मिथ्याज्ञान के कारण शारीर का उपभोग है, पर उसका (भोग का) परमार्थ रूप ब्रह्म से संस्पर्श नहीं है। अज्ञानियों के द्वारा तलमलिनता आदि युक्त आकाश विकल्पित करने पर भी परमार्थत: (वस्तुत:) आकाश तलमलिनता वाला नहीं होता है। इसीलिए कहते हैं – ‘नहीं, क्योंकि यहाँ विशेषता (भिन्नता) है’। एकत्व होने पर भी विशेषता के कारण शारीर के उपभोग के द्वारा ब्रह्म के उपभोग का प्रसंग नहीं होता है। मिथ्याज्ञान और समयग्ज्ञान में विशेषता है ही। उपभोग मिथ्याज्ञान के द्वारा कल्पित है; एकत्व समयग्ज्ञान के द्वारा दृष्ट है। मिथ्याज्ञान कल्पित उपभोग के द्वारा समयग्ज्ञान दृष्ट वस्तु स्पर्श नहीं होती। इसलिए, उपभोग के गंध की भी ईश्वर में कल्पना नहीं की जा सकती है।

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