Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.2.9 to 1.2.10 – The Eater

1.2.9

अत्ता चराचरग्रहणात्

(चर और अचर के ग्रहण के कारण, (परमात्मा ही) अत्ता (eater) है)

शंका – कठोपनिषद् में हम यह पढ़ते हैं – ‘जिसके लिए ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों ओदन (चावल, आहार) बन जाते हैं तथा मृत्यु जिसके लिए उपसेचन (curry) है, वह जहाँ है, उसे कौन जानता है’। यहाँ ओदन और उपसेचन के उल्लेख के कारण किसी अत्ता (eater) की प्रतीति होती है। यह अत्ता कौन हो सकता है? अग्नि, जीव अथवा परमात्मा? (किसी एक पर) विशेष अवधारणा (conclusive distinction) न होने कारण यह संशय होता है। ग्रंथ में (कठोपनिषद् में) तीनों, अग्नि, जीव और परमात्मा के विषय में प्रश्न का उपन्यास (presentation) है। यहाँ क्या निष्कर्ष होना चाहिए?

पू – अग्नि अत्ता है।

क्यों?

‘अग्नि अन्न को खाने वाला है’ – ऐसी श्रुति है और ऐसी प्रसिद्धि भी है। या फिर – ‘उनमें से एक भिन्न स्वाद के फलों को खाता है’ – ऐसा दर्शन के कारण जीव भी अत्ता हो सकता है। पर – ‘अन्य बिना खाते हुये देखता है’ – ऐसा दर्शन के कारण परमात्मा अत्ता नहीं हो सकता है, यह निष्कर्ष है।

सि – हम कहते हैं – यहाँ परमात्मा ही अत्ता होने के योग्य है।

क्यों?

चर और अचर के ग्रहण के कारण। चर-अचर, स्थावर-जंगम यहाँ मृत्यु-रूप उपसेचन के साथ खाद्य (वस्तु के रूप में) उल्लिखित हैं। परमात्मा के अलावा कोई अन्य इस प्रकार के आहार का पूर्णरूपेण अत्ता नहीं हो सकता। परमात्मा के लिए सबका अत्ता होना संभव है क्योंकि सभी विकारजात का (everything) (उसी में) उपसंहार होता है (during dissolution, everything is withdrawn into परमात्मा)।

पू – परंतु चर-अचर का ग्रहण तो यहाँ कहा (ही) नहीं गया है। फिर किस प्रकार चर-अचर का ग्रहण सिद्धवत् (like an established fact) हेतु रूप में (as a ground for establishing परमात्मा as eater) प्रस्तुत कर रहे हो?

सि – यह कोई दोष नहीं क्योंकि जब मृत्यु को उपसेचन द्वारा कहा गया तो इसी के साथ सभी प्राणी-निकाय का यहाँ प्रस्तुतीकरण हो गया और क्योंकि ब्राह्मण और क्षत्रिय (का उल्लेख जीवों में) प्रधान होने के कारण (सभी जीवों का) प्रदर्शनत्व के लिए संभव है।

तुमने यह जो कहा कि – ‘अन्य बिना खाते हुये देखता है’ – ऐसे दर्शन के कारण परमात्मा का अत्तृत्व संभव नहीं है; तो यहाँ कहते हैं – इस (श्रुति के) दर्शन में (परमात्मा के) कर्म-फल-भोग का प्रतिषेध है क्योंकि यह संनिहित (निकट, near at hand) है। यह (श्रुति) विकार के संहार (dissolution of everything) का प्रतिषेधक नहीं है क्योंकि सभी वेदांतों में ब्रह्म सृष्टि-स्थिति-संहार के कारण-रूप में प्रसिद्ध है।

इसलिए यहाँ परमात्मा का ही अत्ता होना योग्य है।

1.2.10

प्रकरणाच्च

(और प्रकरण के कारण भी (यह युक्त है))

‘न जायते म्रियते वा विपश्चित’ – इत्यादि श्रुति के कारण यह परमात्मा का प्रकरण है, इस कारण से भी परमात्मा ही यहाँ अत्ता होने के योग्य है। और यही न्यायपूर्ण (logical) है कि प्रकृत का ग्रहण किया जाय। और – ‘वह जहाँ है, उसे कौन जानता है’ – इस (श्रुति) के द्वारा परमात्मा का लिङ्ग दुर्विज्ञानत्व (भी) है।

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