Brahm Sutra

Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.2.11 to 1.2.12 – The Two in the Cavity of the Heart

1.2.11

गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात्

(गुहा में प्रविष्ट वे दोनों आत्मा हैं क्योंकि (श्रुति में) ऐसा दर्शन है)

शंका – कठोपनिषद् में ही हम यह पढ़ते हैं – ‘ब्रह्मविद्, पञ्च-अग्नि पूजक तथा त्रिणाचिकेता, स्वयं कृत कार्यों के ऋत (अवश्यंभावी फल) को लोक (शरीर) में पीने वाले दो (वस्तुओं) के विषय में कहते हैं, जो छाया और आतप के समान (विरुद्ध) हैं तथा जिन्होंने गुहा , जो श्रेष्ठ (वस्तुओं) का परम निवास है, में प्रवेश किया है’। वहाँ संशय होता है कि क्या बुद्धि और जीव निर्दिष्ट हैं अथवा जीव और परमात्मा। अगर बुद्धि-जीव (निर्दिष्ट) हैं, तो (शरीर में) बुद्धि की प्रधानता के कारण, जीव कार्य-करण-संघात (शरीर) से विलक्षण प्रतिपादित होता है। और यह (जीव-शरीर विलक्षणत्व) यहाँ प्रतिपादितव्य भी है क्योंकि (नचिकेता के द्वारा) यह पूछा गया था कि – ‘मनुष्य की मृत्यु के बाद कोई कहता है कि यह (जीव) रहता है और कोई कहता है कि यह नहीं रहता; इसे मैं आपके द्वारा उपदिष्ट होकर जानूँ; यह वरों में मेरा तीसरा वर है’। और अगर जीव-परमात्मा (निर्दिष्ट) है, तो परमात्मा जीव से विलक्षण प्रतिपादित होता है। और यह (जीव-परमात्मा विलक्षणत्व) प्रतिपादितव्य भी है क्योंकि यह पूछा गया था – ‘धर्म-अधर्म, कृत (effect)-अकृत (cause), भूत-भविष्य से अन्यत्र (भिन्न) जिस (वस्तु) को आप देखते हैं, उसे (मुझसे) कहें’।

आक्षेप – ये दोनों ही पक्ष (बुद्धि-जीव, जीव-परमात्मा) ही यहाँ संभव नहीं हैं।

क्यों?

‘स्वयं के किए कार्यों के, लोक (शरीर) में’ – इस लिङ्ग के अनुसार ऋत-पान का अर्थ कर्म-फल-उपभोग है। वह चेतन क्षेत्रज्ञ के लिए ही संभव है, अचेतन बुद्धि के लिए नहीं। ‘पिबंतौ’ – इस द्विवचन के द्वारा श्रुति दोनों (वस्तुओं) के लिए पीना दर्शाती है। इसलिए बुद्धि-क्षेत्रज्ञ का पक्ष संभव नहीं है। और इसी कारण से क्षेत्रज्ञ-परमात्मा का पक्ष भी संभव नहीं है क्योंकि परमात्मा के चेतन होने पर भी (उनके लिए) ऋत-पान असंभव है – ‘दूसरा बिना खाते हुये देखता है’ – इस मंत्र वर्ण के कारण।

शंकाकार – यह कोई दोष नहीं। ‘छत्र वाले लोग जा रहे हैं’ – इस वाक्य में एक ही छत्री (possessor of umbrella) के द्वारा अन्य लोगों में ‘छत्र वाले लोग’ – इस प्रकार छत्रित्व का उपचार (secondary sense) होता है। इसी प्रकार, एक के ही (जीव) पीने पर ‘दोनों पीते हैं’ –ऐसा कहा जाता है।

या फिर ऐसा हो सकता है – जीव पीता है और ईश्वर पिलाता है। और चूँकि वह पिलाता है, इसलिए – ‘जो पाक (cook) करवाता है, उसमें पाक-कर्तृत्व की प्रसिद्धि का दर्शन होता है’ – इस (रूपक) के द्वारा (ईश्वर) पीता है, ऐसा कहा जाता है।

बुद्धि-क्षेत्रज्ञ का ग्रहण भी संभव है क्योंकि करण (बुद्धि) में कर्तृत्व का उपचार – ‘ईंधन पकाता है’ – ऐसे प्रयोग के दर्शन के कारण संभव है।

अध्यात्म के अधिकार (प्रकरण) में कोई अन्य दो ऋत-पान करने वाले संभव नहीं हैं। इसलिए बुद्धि-जीव है या जीव-परमात्मा है, यह संशय (होता) है। यहाँ क्या निष्कर्ष होना चाहिए?

पू – बुद्धि-क्षेत्रज्ञ (होना चाहिए)।

क्यों?

‘गुहा में प्रविष्ट’ – इस विशेषण के कारण। गुहा का अर्थ शरीर हो या हृदय, इन दोनों ही (परिस्थितियों) में बुद्धि-क्षेत्रज्ञ का गुहा में प्रविष्ट होना संभव है। (अन्य परिस्थिति के) संभव होते हुये सर्वगत ब्रह्म के लिए विशिष्ट-देशत्व की कल्पना युक्त नहीं है। ‘स्वयं के द्वारा किए गए कार्यों के (ऋत का) शरीर में’ – (यह श्रुति) कर्मफल से अनतिक्रम (it is not beyond fruits of action) दर्शाती है। परमात्मा तो सुकृत या दुष्कृत से बंधा नहीं रहता है – ‘कर्म से न वह बढ़ता है न घटता है’ –ऐसी श्रुति भी है। ‘छाया-आतप’ से चेतन-अचेतन का निर्देश संभव है क्योंकि वे छाया-आतप की तरह परस्पर विलक्षण हैं। इसलिए बुद्धि-क्षेत्रज्ञ ही यहाँ कहे गए हैं, यह प्राप्त होता है।

सि – यहाँ कहते हैं – यहाँ विज्ञानात्मा और परमात्मा कहे गए हैं।

कैसे?

क्योंकि ये दोनों ही आत्मा हैं, चेतन हैं और समान स्वभाव के हैं। संख्या के श्रवण में समान-स्वभाव-वाली-वस्तुओं की प्रतीति ही लोक में होती है। ‘इस गाय के दूसरे (जोड़े) को खोजो’ – इस कथन में, दूसरी एक गाय ही खोजी जाती है, कोई अश्व अथवा पुरुष नहीं। इसी प्रकार यहाँ ऋत-पान के लिङ्ग द्वारा विज्ञानात्मा का निश्चय होने पर द्वितीय (वस्तु) का अन्वेषण प्रारम्भ होता है तो समान-स्वभावक चेतन परमात्मा ही (द्वितीय वस्तु) प्रतीत होता है।

पू – क्या हमने यह नहीं कहा कि गुहा-प्रविष्टत्व के दर्शन के कारण परमात्मा नहीं समझा जा सकता है?

सि – हम कहते हैं कि गुहा-प्रविष्टत्व के दर्शन के कारण ही परमात्मा समझा जाना चाहिए। गुहा-प्रविष्टत्व तो श्रुति-स्मृति में अनेक बार परमात्मा ही के लिए दीखता है – ‘गुहा में प्रविष्ट, पुरातन, गह्वर में (देह रूपी गहन निकुञ्ज)’ – ‘जो गुहा के परम व्योम में स्थित को जानता है’ – ‘गुहा में प्रविष्ट आत्मा का अन्वेषण करो’ – इत्यादि। और यह तो कहा ही जा चुका है कि (ब्रह्म के) सर्वगत होने पर भी ब्रह्म की उपलब्धि के लिए विशेष देश (specific place) का उपदेश विरुद्ध (contradictory) नहीं है। सुकृत-लोक-वर्तित्व तो एक के ही (जीव) वर्तमान रहने पर भी छत्रित्ववत् दोनों के लिए (कहना) अविरुद्ध (ही) है। ‘छाया-आतप’ भी अविरुद्ध है क्योंकि (विज्ञानात्मा-परमात्मा का) संसारित्व-असंसारित्व छाया-आतप की तरह परस्पर विलक्षण है; संसारित्व अविद्याकृत है और असंसारित्व पारमार्थिक है।

इसलिए विज्ञानात्मा और परमात्मा गुहाप्रविष्ट गृहीत (ज्ञात) होते हैं।

अन्य किस कारण से विज्ञानात्मा और परमात्मा गृहीत होते हैं?

1.2.12

विशेषणाच्च

(और विशेषण के कारण भी (विज्ञानात्मा और परमात्मा गृहीत होते हैं))

और (कठोपनिषद् में उद्धृत) विशेषण भी विज्ञानात्मा-परमात्मा के लिए ही (लागू) होता है। ग्रंथ में आगे – ‘शरीर को रथ और आत्मा को रथी जानो’ – आदि (श्रुति) के द्वारा, रथ-रथी आदि रूपक की कल्पना के द्वारा, संसार और मोक्ष-मार्ग का गमन-कर्ता विज्ञानात्मा रथी (रूप में) कल्पित किया गया है। ‘वह मार्ग का अंत, विष्णु का परम पद, प्राप्त करता है’ – इस (श्रुति) के द्वारा परमात्मा को गंतव्य (के रूप में) कल्पित किया गया है। तथा पूर्व ग्रंथ में भी यही दोनों (विज्ञानात्मा-परमात्मा) मंता (thinker) और मन्तव्य (object of thought) के रूप में विशेषित हैं – ‘धीर उस दुर्दर्श, गूढ़-अनुप्रविष्ट, पुरातन, गुहा-प्रविष्ट को अध्यात्म योग के द्वारा देव मान कर हर्ष-शोक का त्याग कर देता है’ – इस श्रुति के द्वारा। और यह परमात्मा का प्रकरण भी है। और ‘ब्रह्मविद् कहते हैं’ – इस प्रकार वक्ता का विशेषण भी परमात्मा का ग्रहण करने पर ही घटित (युक्त) होता है।

इसलिए यहाँ जीव-परमात्मा ही कहे गए हैं।

यही न्याय (logic) – ‘दो सुपर्ण, साथ रहने वाले, सखा (पक्षी)’ – आदि (श्रुति) में भी (लेना) है। वहाँ भी अध्यात्म-अधिकार (आत्मा का प्रकरण) के कारण प्राकृत सुपर्ण (ordinary birds) नहीं कहे गए हैं। ‘उनमें से एक स्वादु पिप्पल खाता है’ – इसमें खाने के लिङ्ग के कारण (एक) विज्ञानात्मा होता है। ‘अन्य बिना खाते हुये देखता है’ – इसमें न खाने और चेतनत्व के कारण (दूसरा) परमात्मा होता है। आगे मंत्र में ये दोनों ही द्रष्टा और द्रष्टव्य के रूप में विशिष्ट हैं – ‘एक ही वृक्ष में पुरुष अनीशता (impotence) के कारण मोहित, निमग्न हुआ शोक करता है। जब यह अन्य जुष्ट (adored) ईश को तथा उनकी महिमा को देखता है, तो वीतशोक हो जाता है’।

अन्य कहते हैं – ‘द्वा सुपर्णा’ – यह ऋग् (मंत्र) इस अधिकरण (topic) के सिद्धान्त के अनुरूप नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि पैङ्गि-रहस्य-ब्राह्मण के द्वारा व्याख्या अन्य प्रकार से की गयी है – ‘उनमें से एक स्वादु पिप्पल को खाता है, यह सत्त्व है तथा अन्य बिना खाते हुये देखता है, यहाँ बिना खाते हुये देखने वाला ज्ञ है; इस प्रकार ये दोनों सत्त्व-क्षेत्रज्ञ हैं’। अगर यह कहते हो कि सत्त्व शब्द जीव के लिए तथा क्षेत्रज्ञ शब्द परमात्मा के लिए है, तो ऐसा नहीं है। क्योंकि सत्त्व और क्षेत्रज्ञ शब्द अन्त:करण और शारीर के लिए प्रसिद्ध हैं और क्योंकि वहीं पर व्याख्या भी की गयी है – ‘जिसके द्वारा स्वप्न देखता है वही यह सत्त्व है; अब यह जो शारीर उपद्रष्टा है वह क्षेत्रज्ञ है; ये दोनों सत्त्व-क्षेत्रज्ञ हैं’।

सि – यह (आक्षेप) भी इस अधिकरण का पूर्वपक्ष (opposition) नहीं कहा जा सकता है। यहाँ (पैङ्गि-रहस्य-ब्राह्मण में) कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि संसार-धर्म-युक्त शारीर क्षेत्रज्ञ विवक्षित नहीं है।

फिर किस प्रकार विवक्षित है?

सर्व-संसार-धर्म-रहित ब्रह्म-स्वभाव चैतन्य-मात्र स्वरूप (विवक्षित है) – ‘“बिना खाते हुये देखता है” अर्थात् “ज्ञ जो बिना खाते हुये देखता है”’ – इस वचन के कारण तथा – ‘तत्त्वमसि’ – और गीता 13.3 आदि श्रुति-स्मृति के द्वारा भी। इतने से ही (मंत्र के व्याख्यान मात्र से ही) विद्या का उपसंहार वचन है कि – ‘ये दोनों सत्त्व-क्षेत्रज्ञ हैं; इस प्रकार जानने वाले का (अविद्या रूपी) रज कुछ भी ध्वंस नहीं करता है’ – (this statement becomes justified only on the assumption that क्षेत्रज्ञ is referred as ब्रह्म)।

पू – इस पक्ष में किस प्रकार अचेतन सत्त्व में भोक्तृत्व का वचन है – ‘उसमें से एक स्वादु पिप्पल को खाता है, वह सत्त्व है’?

सि – यह श्रुति अचेतन सत्त्व के भोक्तृत्व को बताने की इच्छा से प्रवृत्त नहीं है।

फिर किसलिए (प्रवृत्त है)?

चेतन क्षेत्रज्ञ के अभोक्तृत्व तथा ब्रह्म-स्वभाव को बताने के लिए (प्रवृत्त हुयी है)। उसी अर्थ के लिए (श्रुति) सुख-दुख आदि विक्रियावान् (changeable) सत्त्व में भोक्तृत्व का अध्यारोप करती है। यह कर्तृत्व और भोक्तृत्व सत्त्व-क्षेत्रज्ञ के अलग-अलग स्वभाव के अविवेक से कृत कल्पित है। परमार्थत: तो (कर्तृत्व-भोक्तृत्व) इन दोनों में किसी में संभव नहीं; सत्त्व में अचेतन होने के कारण तथा क्षेत्रज्ञ में अविक्रिय (changeless) होने के कारण।

अविद्या-प्रति-उपस्थापित स्वभाव के कारण सत्त्व का (कर्तृत्व-भोक्तृत्व) हमेशा ही असंभव है। और श्रुति – ‘जहाँ कोई अन्य जैसा हो तो कोई अन्य को देखे’ – इस के द्वारा स्वप्न-दृष्ट-हाथी के साथ व्यवहार के समान अविद्या के विषय कर्तृत्व आदि व्यवहार को (श्रुति) दर्शाती है। ‘जहाँ इस के लिए सब कुछ आत्मा हो गया, वहाँ यह किसके द्वारा क्या देखे!’ – आदि (श्रुति) के द्वारा (श्रुति) विवेकी में कर्तृत्व आदि व्यवहार का निषेध करती है।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s