Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.2.13 to 1.2.17 – The Person in the Eye

1.2.13

अन्तर उपपत्ते:

((नेत्र) के अन्तर स्थित (वह) परमेश्वर है, क्योंकि यही सिद्ध होता है)

शंका –(छान्दोग्य उपनिषद् में) ऐसा सुना जाता है –‘उसने (सत्यकाम जाबाल ने उपकोसल को) कहा – यह जो नेत्र के अंदर पुरुष दीखता है, यह आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय है, यही ब्रह्म है। इसलिए अगर इसमें घृत या जल डालते हैं तो यह पलकों तक चला जाता है।’ यहाँ संशय होता है कि क्या यहाँ अक्षि पर स्थित किसी प्रतिबिम्बात्मा (shadowy being) का निर्देश है अथवा विज्ञानात्मा (जीव) का अथवा (अक्षि) इंद्रिय के अधिष्ठाता किसी देवता-आत्मा (divine being) का अथवा ईश्वर का (निर्देश है)? यहाँ क्या निर्णय होना चाहिए?

पू –(यह) किसी पुरुष का प्रतिरूप (reflection) कोई छायात्मा ही होना चाहिए।

क्यों?

क्योंकि उसका (छायात्मा का) दृश्यमानत्व प्रसिद्ध है और –‘यह जो नेत्र के अंदर स्थित पुरुष दीखता है’– (इस श्रुति) के द्वारा उसका (नेत्रस्थ पुरुष का) प्रसिद्धवत् उपदेश है।

या फिर विज्ञानात्मा का उपदेश भी युक्त है। ऐसा इसलिए क्योंकि चक्षु के द्वारा रूप देखने पर यही (विज्ञानात्मा) चक्षु में संनिहित (निकट प्राप्त) होता है और इस पक्ष में (विज्ञानात्मा के पक्ष में) आत्म-शब्द (का प्रयोग) भी अनुकूल होता है।

या फिर चक्षु का अनुग्राहक (सहायक) आदित्य-पुरुष यहाँ प्रतीत होता है क्योंकि –‘यह (आदित्य-पुरुष) रश्मियों के द्वारा इसमें (दक्षिण चक्षु में) प्रतिष्ठित है’– ऐसी श्रुति भी है। और अमृतत्व आदि भी देवता-आत्मा के लिए किसी प्रकार से संभव होने के कारण भी (आदित्य-पुरुष अर्थ होना चाहिए)।

और किसी भी प्रकार से ईश्वर (अर्थ) नहीं (हो सकता है) क्योंकि स्थान-विशेष का निर्देश है।

यही यहाँ (निर्णय) प्राप्त होता है।

सि – यहाँ कहते हैं कि परमेश्वर ही यहाँ अक्षि के अंतर पुरुष के रूप में उपदिष्ट है।

क्यों?

क्योंकि इसी की उपपत्ति है (because this is proved)। यहाँ उपदिष्ट गुण-समूह परमेश्वर में ही सिद्ध होते हैं। उसमें (गुणों में) आत्मत्व मुख्य रूप से परमेश्वर में ही उपपन्न है –‘वह आत्मा है। तुम वही हो।’– इस श्रुति के द्वारा। और अमृतत्व तथा अभयत्व भी परमेश्वर में अनेक बार (श्रुति में) सुने जाते हैं। उसी प्रकार, यह अक्षि स्थान परमेश्वर के अनुरूप है। जिस प्रकार परमेश्वर ‘अपहतपाप्मत्व’ आदि के श्रवण के कारण सभी दोषों से अलिप्त है, उसी प्रकार अक्षि स्थान सर्व-लेप-रहित-उपदिष्ट है –‘इसलिए अगर इसमें घृत या जल डालते हैं तो यह पलकों तक चला जाता है’– ऐसी श्रुति भी है। संयद्वाम (goal of result of actions) आदि गुण-उपदेश भी उसी में (नेत्रस्थ पुरुष में) अवकल्पित होते हैं।‘इसी को (नेत्रस्थ पुरुष को) संयद्वाम भी कहते हैं। इसी की ओर सभी वाम (कर्म-फल) जाते हैं।’– ‘यही वामनी (पुण्य-फल-प्रदाता) है क्योंकि यही सभी वामों को प्राप्त कराता है। यही भामनी (प्रकाश का नियंता-देवता) है क्योंकि यही सभी लोकों में प्रकाशित होता है।’

इस प्रकार अन्तर में (स्थित पुरुष) परमेश्वर है, यह सिद्ध होता है।

1.2.14

स्थानादिव्यपदेशाच्च

(और स्थान आदि के कथन के कारण भी (यह सिद्ध होता है))

(यह जो कहा कि) आकाश के समान सर्वगत ब्रह्म के लिए अक्षि जैसा अल्प स्थान कैसे सिद्ध हो सकता है, तो यहाँ कहते हैं – यह (कथन) अयुक्त तब होता जब यही एक स्थान इसके (ब्रह्म के) लिए निर्दिष्ट होता। इसके तो पृथ्वी आदि अन्य-अन्य स्थान भी निर्दिष्ट हैं –‘जो पृथ्वी में रहता है’– इत्यादि (श्रुति भी है)। उन्हीं (स्थानों) में चक्षु भी निर्दिष्ट है –‘जो चक्षु में रहता है’। ‘स्थानादिव्यपदेशात्’ (इस सूत्र) में ‘आदि’शब्द के ग्रहण के द्वारा यह दिखता है कि केवल स्थान (का कथन) ही ब्रह्म के लिए अनुचित नहीं है।

तो फिर और क्या अनुचित है?

नाम-रूप रहित ब्रह्म के लिए नाम-रूप का निर्देश दीखता है, जो कि अनुचित है –‘उसका नाम उत् है’–‘उसके श्मश्रु हिरण्मय हैं’। ऐसा (पहले) कहा ही गया है कि सद्ब्रह्म निर्गुण होने पर भी नाम-रूप में स्थित गुणों के द्वारा उपासना के लिए वहाँ-वहाँ सगुण रूप में उपदिष्ट है। सर्वगत ब्रह्म का भी उपलब्धि (ज्ञान, उपासना) के लिए स्थान-विशेष (का उपदेश) विरुद्ध नहीं है जैसा कि सालग्राम और विष्णु के लिए (पहले) कहा जा चुका है।

1.2.15

सुखविशिष्टाभिधानादेव च

(और ऐसा इसलिए भी क्योंकि सुख-विशिष्ट (one possessed of bliss) का कथन है)

और यहाँ यह विवाद भी नहीं करना चाहिए कि क्या इस वाक्य में ब्रह्म कहा गया है या नहीं कहा गया है। (ऐसा इसलिए) क्योंकि सुख-विशिष्ट के अभिधान (कथन) से ही ब्रह्मत्व सिद्ध है। प्रकृत-परिग्रह के न्याय से (भी यही सिद्ध होता है कि) जो सुख-विशिष्ट ब्रह्म वाक्य के उपक्रम (प्रारम्भ) में प्रस्तुत है –‘प्राण ब्रह्म है, क ब्रह्म है, ख ब्रह्म है’– उसी का यहाँ (नेत्रस्थ पुरुष के लिए) कथन है। इसके अलावा –‘आचार्य तुम्हें गति के विषय में बताएँगे’– (इस श्रुति के द्वारा अग्नियों ने आचार्य के द्वारा) गति-मात्र के कथन की प्रतिज्ञा की थी, इस कारण से भी (नेत्रस्थ पुरुष ब्रह्म ही को कहा गया है)।

पू – वाक्य के उपक्रम में सुख-विशिष्ट ब्रह्म कैसे समझा गया?

सि – यहाँ कहते हैं – ‘प्राण ब्रह्म है, क ब्रह्म है, ख ब्रह्म है’ ऐसा अग्नियों के वचन को सुनकर उपकोसल ने कहा – ‘मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है पर मैं क और ख को नहीं जानता’। इस पर (अग्नि का) प्रतिवचन है – ‘जिसे क कहा जाता है वही ख है तथा जो ख है वही क है’। वहाँ ख शब्द से लोक में भूताकाश निरूढ़ (वाचक, synonym) है। यदि उसके (ख के) विशेषण-रूप के द्वारा सुख-वाचक क शब्द का ग्रहण नहीं होता, तो ऐसा प्रतीत होता कि ब्रह्म-शब्द का भूताकाश में केवल प्रतीक के अभिप्राय से नाम आदि की तरह प्रयोग हुआ है। और यदि क शब्द के विशेषण-रूप में ख शब्द का ग्रहण नहीं होता तो क शब्द के विषय-इंद्रिय-संपर्क-जनित सदोष सुख के रूप में प्रसिद्धि के कारण, लौकिक सुख ब्रह्म है, ऐसी प्रतीति होती। पर एक-दूसरे को विशेषित करने के कारण क और ख शब्द सुखात्मक ब्रह्म का बोध कराते हैं। वहाँ दूसरे ब्रह्म शब्द का ग्रहण नहीं करने पर – ‘कं खं ब्रह्म’ – ऐसा कहने पर क शब्द ख शब्द का विशेषण रूप ही से उपयुक्त होने के कारण सुख (क) का गुण होगा और (ब्रह्म की तरह) ध्येय (object of meditation) नहीं होगा। ऐसा न हो, इसलिए दोनों क और ख शब्द को ‘कं ब्रह्म खं ब्रह्म’ से ब्रह्म के शिर वाला किया गया है। यहाँ इष्ट यह है कि गुण सुख भी गुणी (ब्रह्म) की ही तरह ध्येय हो। इस प्रकार, वाक्य के उपक्रम में सुख-विशिष्ट ब्रह्म उपदिष्ट है। गार्हपत्य आदि प्रत्येक अग्नि  पहले अपनी-अपनी महिमा का उपदेश कर – ‘इस प्रकार सौम्य, तुम्हें हमारी विद्या और आत्म-विद्या काही गयी’ – इस प्रकार उपसंहार करती है और समझाती हैं कि यहाँ पहले ब्रह्म का निर्देश किया गया है। ‘आचार्य तुझे गति के बारे में बताएँगे’ – इस प्रकार गति-मात्र के कथन की प्रतिज्ञा के द्वारा अर्थान्तर (another topic) की विवक्षा का वारण (निषेध) है। ‘जिस प्रकार कमल पत्र पर जल लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार ऐसा जानने वाले से पाप कर्म लिप्त नहीं होते’ – यह श्रुति अक्षि-स्थित पुरुष को जानने वाले के लिए पाप-कृत-पीड़ा-रहित बताते हुये इस (नेत्रस्थ) पुरुष का ब्रह्मत्व दर्शाती है। इससे (सिद्ध होता है कि) प्रकृत ब्रह्म की ही अक्षि-स्थानता और संयद्वामत्व आदि गुणता को कहर (श्रुति) उसको जानने वाले की अर्चि आदि गति को बताने की इच्छा से वक्ता – ‘यह जो आँख के अंदर पुरुष दीखता है, यह आत्मा है’ – ऐसा उपक्रम करता है।

1.2.16

श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च

(क्योंकि उपनिषद् को सुने हुये (पुरुष) की गति का कथन है)

इस एक और कारण से नेत्रस्थ पुरुष परमेश्वर है – उपनिषद् को सुने हुये, रहस्य और विज्ञान को सुने हुये ब्रह्मविद् की गति जो देवयान (path of gods) के नाम से श्रुति में प्रसिद्ध है – ‘अब तप के द्वारा, ब्रह्मचर्य के द्वारा, श्रद्धा के द्वारा, विद्या के द्वारा आत्मा का अन्वेषण कर आदित्य का उत्तर (दिशा) से विजय करते हैं। यही प्राणों का आश्रय है, यही अमृत है, यही अभय है, यही परम गति है क्योंकि यहाँ से पुनरागमन नहीं होता’। गीता 8.24 – स्मृति में भी (यह कहा गया) है। नेत्रस्थ पुरुष को जानने वाले के लिए उसी (मार्ग) का कथन दर्शित है। ‘चाहे उसका शव-कर्म किया जाये अथवा न किया जाये, वह मर कर अर्चि (अग्नि) को प्राप्त होता है’ – ऐसे आरंभ कर – ‘आदित्य से चंद्रमा को और फिर चंद्रमा से विद्युत् को प्राप्त होते हैं, तब अमानव पुरुष उसे यहाँ से (विद्युत् से) ब्रह्म को प्राप्त कराता है। यह देव-पथ है, ब्रह्म-पथ है। इस (मार्ग) के द्वारा इस (ब्रह्म-लोक) को प्राप्त किए हुये मानव के लिए पुनरागमन नहीं है’। इस प्रकार, ब्रह्मविद्-विषयक प्रसिद्ध गति के द्वारा नेत्रस्थ (पुरुष) का ब्रह्मत्व निश्चित होता है।

1.2.17

अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतर:

((ब्रह्म से) अन्य कोई और अनवस्थित और असंभव होने के कारण (नेत्रस्थ पुरुष) नहीं हो सकता है)

यह कहा गया था कि नेत्रस्थ पुरुष छायात्मा, विज्ञानात्मा अथवा देवतात्मा हो सकता है। यहाँ कहते हैं कि छायात्मा और अन्य यहाँ ग्रहण के योग्य नहीं हो सकते।

कैसे?

अनवस्थिति (अनित्य-स्थिति) के कारण। छायात्मा का चक्षु में नित्य अवस्थान (residence) संभव नहीं है। जब कोई पुरुष चक्षु के पास होता है तब चक्षु में पुरुष की छाया दीखती है, उसके जाने के बाद उसमें नहीं दीखती है। ‘यह जो अक्षि में स्थित पुरुष है’ – यह श्रुति अपने चक्षु में संनिधान (निकटता) के कारण दृश्यमान पुरुष के उपास्यत्व का उपदेश करती है। अब यह कल्पना तो युक्त नहीं है कि उपासना काल में छाया करने वाले किसी पुरुष को चक्षु के समीप कर (उपासक) उपासना करे। ‘इस शरीर के नाश के बाद यह (छायात्मा) नष्ट होता है’ – यह श्रुति छायात्मा की भी अनवस्थितत्व दर्शाती है।

इसके अलावा, ऐसा असंभव होने के कारण भी। क्योंकि उस छायात्मा में अमृतत्व आदि गुणों की प्रतीति नहीं है।

तथा विज्ञानात्मा की भी सम्पूर्ण शरीर और इंद्रिय के साथ साधारण (general) संबंध रहने के कारण, चक्षु में ही अवस्थितत्व कहना संभव नहीं है। (परंतु) ब्रह्म का तो सर्वव्यापी होने पर भी उपलब्धि के लिए हृदय-आदि-देश-विशेष से संबंध (श्रुति में) दृष्ट है। (छायात्मा के) समान ही विज्ञानात्मा में भी अमृतत्व आदि गुण असंभव हैं। यद्यपि विज्ञानात्मा तो परमात्मा से अनन्य ही है, फिर भी अविद्या-काम-कर्म के द्वारा उसमें मर्त्यत्व और भय अध्यारोपित होने से अमृतत्व और अभयत्व सिद्ध नहीं है। और अनैश्वर्य के कारण इसमें (विज्ञानात्मा में) संयद्वामत्व आदि अनुपपन्न ही हैं।

यद्यपि देवता-आत्मा – ‘(आदित्यस्थ पुरुष) रश्मियों के द्वारा इस (नेत्रस्थ पुरुष) में प्रतिष्ठित है’ – इस श्रुति के द्वारा चक्षु में अवस्थित है, फिर भी उसका आत्मत्व तो संभव नहीं है क्योंकि वह (देवता-आत्मा) बाह्य (पराग) स्थित है। और (देवता-आत्मा के) उत्पत्ति-प्रलय के श्रवण के कारण अमृतत्व आदि भी संभव नहीं है। देवताओं का अमरत्व तो चिर-काल-अवस्था (long life) की अपेक्षा से (कहा गया) है। उसका (देवता-आत्मा का) ऐश्वर्य भी परमेश्वर-आश्रित है न कि स्वाभाविक, (जैसा कि) – ‘उसके भय से वात बहता है, उसके भय से सूर्य उदित होता है, उसके भय से अग्नि और इन्द्र क्रियावान् हैं तथा मृत्यु, पाँचवाँ, दौड़ता है’ – आदि मंत्र-वर्णन है।

इसलिए, नेत्रस्थ पुरुष को परमेश्वर ही समझना चाहिए।

इस पक्ष (point of view) से, ‘दृश्यते (आँख के अंदर जो पुरुष दीखता है)’ शब्द का प्रसिद्ध (वस्तु) की तरह जो प्रयोग है वह शास्त्र आदि की अपेक्षा से है। यह ‘दृश्यते’ विद्वानों का विषय होने के कारण अज्ञानियों के प्रति प्ररोचनार्थ (रुचि-उत्पादकार्थ) व्याख्यायित है (ऐसा समझना चाहिए)।

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