Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.2.18 to 1.2.20 – The Internal Ruler

1.2.18

अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात्

(अधिदैव और अन्य (के संदर्भ) में अन्तर्यामी (परमात्मा है), क्योंकि उसके (परमात्मा के) धर्मों का कथन है)

शंका – ‘जो इस लोक का, परलोक का तथा सभी भूतों का अन्तर से नियमन (control) करता है’ – (इस श्रुति) से उपक्रम (प्रारम्भ) कर – ‘जो पृथ्वी पर रहता है पर पृथ्वी के अन्तर है, जिसे पृथ्वी नहीं जानती, जिसका शरीर पृथ्वी है, जो पृथ्वी का अन्तर से नियमन करता है, वही अमृत अंतर्यामी तुम्हारा आत्मा है’ – इत्यादि (सुना जाता है)। यहाँ अधिदैव, अधिलोक, अधिवेद, अधियज्ञ, अधिभूत तथा अध्यात्म (के संदर्भ) में किसी अन्तर-अवस्थित नियंता अन्तर्यामी को सुना जाता है। वह (अन्तर्यामी) क्या अधिदैव-आदि अभिमानी कोई देवता-आत्मा (divine being) है, या अणिमा-आदि ऐश्वर्य प्राप्त कोई योगी है, या परमात्मा है या कोई अन्य वस्तु? यह संशय (अन्तर्यामी नामक) अपूर्व संज्ञा के दर्शन के कारण है। यहाँ क्या निष्कर्ष होना चाहिए?

पू – संज्ञा के अप्रसिद्ध होने के कारण संज्ञिन् (entity for which noun is used) भी कुछ अप्रसिद्ध और अर्थान्तर (विलक्षण वस्तु) होना चाहिए।

या चूँकि अनिरूपित रूप वाले अर्थान्तर का कथन किसी भी प्रकार से संभव नहीं है और चूँकि अन्तर्यामी शब्द अन्तर में नियमन रूप (अवयवार्थ) द्वारा प्रवृत्त हुआ है और अत्यंत अप्रसिद्ध (भी) नहीं है; इसलिए अन्तर्यामी पृथ्वी आदि का अभिमानी कोई देवता होगा। और (इसीलिए) ऐसा सुना भी जाता है – ‘पृथ्वी ही इसका आयतन (abode) है, अग्निलोक नेत्र है, ज्योति मन है’ – आदि। चूँकि कार्य-करण वाला होने के कारण (यह) पृथ्वी आदि के अन्तर रह कर नियमन करता है, इसलिए देवता-आत्मा का यमयितृत्व (rulership) युक्त है।

या फिर किसी सिद्ध योगी के सर्व-प्रवेश के द्वारा (भी) यमयितृत्व हो सकता है।

परन्तु परमात्मा (नियन्ता) प्रतीत नहीं होता है क्योंकि वह कार्य-करण वाला नहीं है। यही यहाँ प्राप्त होता है।

सि – यहाँ कहा जाता है – अधिदैव आदि में जो अन्तर्यामी सुना जाता है, वह परमात्मा ही हो सकता है, कोई अन्य नहीं।

क्यों?

क्योंकि उसी के (परमात्मा के) धर्मों का कथन है। उसी परमात्मा के धर्म यहाँ निर्दिष्ट दृश्यमान हैं। पृथ्वी आदि अधिदैव आदि भेद से भिन्न सभी विकार-समूह के अन्तर रहकर यह नियमन (control) करता है, इस प्रकार परमात्मा का यमयितृत्व सिद्ध होता है क्योंकि सभी विकारों के कारणत्व से सर्वशक्ति सिद्ध होती है। ‘यही अमृत अन्तर्यामी तुम्हारा आत्मा है’ – (इस श्रुति) में अमृतत्व और आत्मत्व मुख्य रूप से परमात्मा में ही सिद्ध होता है। ‘जिसे पृथ्वी नहीं जानती’ – इसके द्वारा पृथ्वी-देवता के द्वारा अन्तर्यामी को अविज्ञेय कह कर (श्रुति) अन्तर्यामी को देवता-आत्मा से भिन्न दर्शाती है। पृथ्वी देवता तो अपने-आप को ‘मैं पृथ्वी हूँ’ ऐसा जान सकता है। तथा ‘अदृष्ट-अश्रुत’ इत्यादि कथन रूप-आदि विहीन होने के कारण परमात्मा में ही सिद्ध होते हैं।

यह जो तुमने कहा कि कार्य-करण वाला नहीं होने के करण परमात्मा का यमयितृत्व सिद्ध नहीं है – तो यह कोई दोष नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि इसके (परमात्मा के) द्वारा कार्य-करण वाले (वस्तु) का नियमन करने के कारण इसका कार्य-करण वाला होना सिद्ध है। इस प्रकार उस (परमात्मा) का अन्य नियन्ता मान कर अनवस्था दोष (infinite regression) भी नहीं है क्योंकि भेद का अभाव है। अनवस्था दोष तो तभी हो सकता है जब भेद हो।

इसलिए, परमात्मा ही अन्तर्यामी है।

1.2.19

न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापात्

((सांख्य) स्मृति से ज्ञात प्रधान भी अन्तर्यामी नहीं हो सकता है क्योंकि उसके धर्म से भिन्न धर्मों का कथन है)

पू – सांख्य-स्मृति-कल्पित प्रधान के लिए भी अदृष्टत्व आदि धर्म सिद्ध हो सकते हैं क्योंकि रूप आदि हीनता के द्वारा ही उसकी अभिधारणा (hypothesis) है। स्मृति कहती है – ‘अतर्क्य, अविज्ञेय, सर्वत्र प्रसुप्त की तरह’। सर्व-विकार-कारण होने से उसका भी नियंतृत्व सिद्ध है। इसलिए, प्रधान अन्तर्यामी शब्द (का द्योतक) है। यद्यपि ‘ईक्षतेर्नाशब्दम्’ (सूत्र) के द्वारा प्रधान निराकृत हो चुका है फिर भी यहाँ अदृष्टत्व आदि के कथन संभव होने से उसकी (प्रधान की) पुन: आशंका होती है।

सि – इसलिए यह उत्तर दिया जाता है – स्मार्त प्रधान अन्तर्यामी शब्द (का द्योतक) होने के योग्य नहीं है।

क्यों?

क्योंकि उसके धर्मों से भिन्न (धर्मों) का कथन है। यद्यपि अदृष्टत्व आदि कथन प्रधान के लिए संभव है फिर भी द्रष्टृत्व आदि का कथन संभव नहीं है क्योंकि प्रधान की अभिधारणा अचेतनत्व की है। ‘अदृष्ट द्रष्टा अश्रुत: श्रोता अमत: मन्ता अविज्ञात विज्ञाता’ यहाँ वाक्य शेष होता है। आत्मत्व भी प्रधान के लिए सिद्ध नहीं है।

पू – यदि आत्मत्व और द्रष्टृत्व के (प्रधान के लिए) असंभव होने के कारण प्रधान की अन्तर्यामी अभिधारणा नहीं है तो फिर शारीर ही अन्तर्यामी हो। शारीर चेतन होने के कारण द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, विज्ञाता होता है। और प्रत्यक् होने के कारण (शारीर) आत्मा है। और धर्म-अधर्म फल-उपभोग की उपपत्ति (सिद्धि) से (शारीर) अमृत है। अदृष्टत्व आदि धर्म शारीर में सुप्रसिद्ध हैं। दर्शन आदि क्रिया के कर्ता में प्रवृत्ति के विरोधी होने के कारण – ‘दृष्टि के द्रष्टा को देखा नहीं जा सकता’ – इस श्रुति के द्वारा भी (शारीर अन्तर्यामी है)। और (शारीर में) भोक्तृत्व के कारण कार्य-करण-संघात को अन्तर से नियमन करने का (शारीर का) सामर्थ्य भी है।

इसलिए शारीर ही अन्तर्यामी है।

सि – इसका उत्तर है –

1.2.20

शारीर चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते

(और शारीर भी (अन्तर्यामी नहीं है) क्योंकि दोनों (काण्व और माध्यंदिन) इसका (शारीर का अन्तर्यामी से) भेद पढ़ते हैं)

पूर्वसूत्र से (इस सूत्र में) ‘न’ पद की अनुवृत्ति (supply) होती है। शारीर अन्तर्यामी मन्तव्य नहीं है।

क्यों?

यद्यपि द्रष्टृत्व आदि धर्म उसके (शारीर के) लिए संभव हैं, फिर भी घटाकाश की तरह उपाधि-परिच्छिन्न होने के कारण पूर्ण रूप से पृथ्वी आदि में अन्तर-अवस्थान तथा नियमन (शारीर के लिए) शक्य नहीं है। इसके अलावा (शतपथ ब्राह्मण के) काण्व और माध्यंदिन दोनों ही शाखा वाले अन्तर्यामी तथा शारीर में भेद को कहते हैं तथा (शारीर का) पृथ्वी की तरह अधिष्ठानत्व (habitation for Internal Ruler) और नियम्यत्व (object of control for Internal Ruler) कहते हैं – ‘जो विज्ञान में रहते हुये’ – काण्व। ‘जो आत्मा में रहते हुये’ – माध्यंदिन। ‘जो आत्मा में रहते हुये’ – इस पाठ में आत्म-शब्द शारीर का वाचक है। ‘जो विज्ञान में रहते हुये’ – इस पाठ में विज्ञान शब्द के द्वारा शारीर कहा गया है क्योंकि शारीर विज्ञानमय है। इसलिए, शारीर से अन्य ईश्वर अन्तर्यामी है, यह सिद्ध हुआ।

पू – फिर एक ही देह में दो द्रष्टा किस प्रकार सिद्ध हो सकते हैं – एक यह अन्तर्यामी ईश्वर तथा एक यह अन्य शारीर?

सि – यहाँ क्या अनुपपत्ति (असामंजस्य, असिद्धि) है?

पू – ‘इसके (अन्तर्यामी  के) सिवा कोई द्रष्टा नहीं’ – इत्यादि श्रुति वचन का विरोध है। यहाँ प्रकृत अन्तर्यामी से अन्य द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, विज्ञाता आत्मा का निषेध है।

आक्षेप – यह वचन अन्य नियन्ता के प्रतिषेध के लिए (भी तो) हो सकता है।

पू – नहीं। क्योंकि अन्य किसी नियन्ता का प्रसङ्ग नहीं है तथा श्रुति का (निषेध) वचन अविशेष (general) है।

सि – यहाँ कहते हैं – अविद्या के द्वारा प्रति-उपस्थापित कार्य-करण-उपाधि-निमित्त (ही) यह शारीर- अन्तर्यामी के भेद का कथन है, पारमार्थिकत: नहीं। प्रत्यगात्मा एक ही होता है, दो प्रत्यगात्मा संभव नहीं है। एक का ही तो उपाधिकृत भेद-व्यवहार होता है – जैसे घटाकाश और महाकाश। इसी (दृष्टिकोण) से, ज्ञातृ-ज्ञेय आदि भेद-विषयक श्रुति, प्रत्यक्ष आदि प्रमाण, संसार-अनुभव, विधि-प्रतिषेध शास्त्र ये सभी सिद्ध होते हैं। तथा – ‘जहाँ द्वैत-जैसा होता है, वहाँ अन्य-अन्य को देखता है’ – यह श्रुति भी अविद्या-विषय (in the realm of avidya) में सभी व्यवहार को दर्शाती है। ‘जहाँ इसके लिए सब आत्मा हो गया तो यह किसके द्वारा किसको देखे’ – यह श्रुति विद्या-विषय में सभी व्यवहार का निषेध करती है।

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