Brahm Sutra

Brahm Sutra Bhashya of Shankaracharya in Hindi – 1.2.21 to 1.2.23 – The One that is Unseen etc

1.2.21

अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्ते:

(अदृश्यत्व आदि गुणवान् (वस्तु) ब्रह्म है क्योंकि उसके (ब्रह्म के) धर्म का कथन है)

शंका – (मुंडक उपनिषद् में) यह सुना जाता है – ‘अब परा (विद्या) जिसके द्वारा उस अक्षर को प्राप्त किया जाता है’ – ‘वह जो अदृश्य, अग्राह्य, अगोत्र, अवर्ण, चक्षु-श्रोत्र-पाणि-पाद रहित, नित्य, विभु, सर्वगत, सुसूक्ष्म, अव्यय, भूतयोनि है, उसे धीर (पुरुष) सर्वत्र देखते हैं’। वहाँ संशय होता है कि अदृश्यत्व आदि गुणवान् तथा भूतयोनि किसे कहा गया है, प्रधान को, शारीर को अथवा परमेश्वर को?

पू – वहाँ अचेतन प्रधान का भूतयोनि होना युक्त है क्योंकि उसके (भूतयोनि के) दृष्टांतों में अचेतन (वस्तुओं) का ही ग्रहण किया गया है – ‘जिस प्रकार मकड़ी जाले को बनाती और निगल जाती है, जैसे पृथ्वी में औषधियाँ उत्पन्न होतीं हैं तथा सजीव पुरुष से केश-लोम उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार अक्षर से यह विश्व (उत्पन्न) होता है’।

आक्षेप – क्या मकड़ी और पुरुष, जो कि चेतन हैं, दृष्टांत में नहीं लिए गए हैं?

पू – हम कहते हैं, नहीं। केवल चेतन का ही वहाँ सूत्रयोनित्व (source of thread) तथा केश-लोम-योनित्व नहीं है। यह प्रसिद्ध है कि चेतन-अधिष्ठित मकड़ी तथा पुरुष का अचेतन शरीर (क्रमश:) सूत्र का तथा केश-लोम का योनि है। और पूर्व (अधिकरण) में (प्रधान में) अदृष्टत्व आदि उक्ति संभव होने पर भी द्रष्टृत्व आदि की उक्ति संभव न होने के कारण प्रधान का स्वीकार नहीं किया गया था। (पर) यहाँ (इस सूत्र में) तो अदृश्यत्व आदि धर्म प्रधान में संभव हैं। और यहाँ (प्रधान के) विरुद्ध किसी भी धर्म की प्राप्ति नहीं है।

आक्षेप – क्या ऐसा नहीं है कि – ‘जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है’ – यह वाक्य-शेष (complementary text) अचेतन प्रधान में संभव नहीं है? फिर यह किस प्रकार कहते हो कि प्रधान भूतयोनि है?

पू – यहाँ कहते हैं – ‘जिसके द्वारा (परा विद्या के द्वारा) उस अक्षर को प्राप्त करते हैं’ – ‘वह जो अदृश्य है’ – (इन श्रुतियों) में अक्षर शब्द के द्वारा अदृश्यत्व आदि गुणवान् भूतयोनि को सुनाकर फिर अंत में – ‘पर (श्रेष्ठ) अक्षर से पर’ – कहा जाएगा । वहाँ जो अक्षर-से-पर सुना जाता है वह सर्वज्ञ और सर्ववित् संभव होगा। अक्षर शब्द से निर्दिष्ट भूतयोनि प्रधान ही है। (और) अगर योनि-शब्द निमित्त (कारण) वाचक हो तो शारीर भी भूतयोनि हो सकता है क्योंकि (शारीर) धर्म-अधर्म के द्वारा भूत-समूह का उपार्जन (सृष्टि) करता है।

सि – ऐसा प्राप्त होने पर कहते हैं – जो यह अदृश्यत्व आदि गुणवान् भूतयोनि है, वह परमेश्वर ही हो सकता है, अन्य नहीं।

ऐसा कैसे जाना जाता है?

क्योंकि उसके (परमेश्वर के) धर्म कहे गए हैं।

‘जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है’ – यहाँ परमेश्वर के ही धर्म उच्यमान दीखते हैं। अचेतन प्रधान का अथवा उपाधि-परिच्छिन्न-दृष्टि वाले शारीर का सर्वज्ञत्व अथवा सर्ववित्त्व संभव नहीं है।

पू – क्या यह कहा नहीं गया है कि अक्षर-शब्द-निर्दिष्ट भूतयोनि से पर का ही सर्वज्ञत्व और सर्ववित्त्व है और ये (सर्वज्ञत्व और सर्ववित्त्व) भूतयोनि के विषय में नहीं कहे गए हैं।

सि – ऐसा संभव नहीं है। प्रकृत भूतयोनि का यहाँ उत्पाद्यमान् (जायमान विश्व) के प्रकृति (उपादान) रूप में – ‘अक्षर से यह विश्व होता है’ – (इस प्रकार) निर्देश है; तथा उसके बाद भी उत्पाद्यमान् के प्रकृतित्व के द्वारा ही सर्वज्ञ का निर्देश है – ‘जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है तथा जिसका ज्ञानमय तप है, उसी से यह ब्रह्म (हिरण्यगर्भ), नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते हैं’। इसलिए निर्देश की समानता (उत्पाद्यमान् का उपादानत्व) से प्रत्यभिज्ञायमानत्व के कारण प्रकृत भूतयोनि अक्षर का ही सर्वज्ञत्व और सर्ववित्त्व धर्म कहा गया है, ऐसा बोध होता है।

‘पर अक्षर से पर’ – यहाँ भी प्रकृत भूतयोनि अक्षर से पर किसी (वस्तु) का कथन नहीं है।

पू – ऐसा किस प्रकार जाना जाता है?

सि – ‘जिस (विद्या) के द्वारा (शिष्य) सत्य, पुरुष, अक्षर को जान सके, वह ब्रह्मविद्या तत्त्वत: (आचार्य के द्वारा शिष्य को) कही जाए’ – इस (श्रुति) में प्रकृत भूतयोनि, अदृश्यत्व आदि गुणवान् अक्षर की वक्तव्यत्व की प्रतिज्ञा की जाने के कारण (ऐसा जाना जाता है)।

पू – फिर – ‘पर अक्षर से पर’ – ऐसा कथन कैसे है?

सि – वह हम अगले सूत्र में कहेंगे। और यहाँ दो विद्या भी वेदितव्य कही गयी है – परा विद्या और अपरा विद्या। वहाँ ऋग्वेद-आदि लक्षणा अपरा विद्या को कहकर – ‘अब परा विद्या जिससे अक्षर की प्राप्ति होती है’ – ऐसा कहा गया है। वहाँ परा विद्या का विषय अक्षर सुना गया है। यदि परमेश्वर से अन्य (किसी) अदृश्यत्व आदि गुणवान् अक्षर की कल्पना करो तो फिर यह परा विद्या नहीं हो सकती। इस विद्या का परा और अपरा विभाग इनके फल (क्रमश:) नि:श्रेयस तथा अभ्युदय (prosperity) के द्वारा परिकल्पित किया गया है। (अब) प्रधान की विद्या (का ज्ञान) नि:श्रेयस-फला हो, यह तो कोई भी स्वीकार नहीं कर सकता। अगर ऐसा होता तो तीन विद्या की प्रतिज्ञा होनी चाहिए थी, क्योंकि तुम्हारे पक्ष (दृष्टिकोण) में तो भूतयोनि अक्षर से पर परमात्मा का प्रतिपादन है। पर यहाँ तो दो ही विद्या के वेदितव्य होने का निर्देश है। ‘भगवन् – किसके विज्ञात होने से यह सब विज्ञात हो जाता है’ – (इस श्रुति) में एक के विज्ञान के द्वारा सभी के विज्ञान की अपेक्षा की गयी है; ऐसा तो सर्वात्मक ब्रह्म के विवक्ष्यमाण (subject of discussion) होने पर ही सिद्ध होता है। एक अचेतन मात्र के आश्रय, प्रधान में अथवा भोक्ता, जो भोग्य से भिन्न है, में (एक के विज्ञान के द्वारा सबका विज्ञान) सिद्ध नहीं है। और – ‘उस (ब्रह्मा) ने सभी विद्याओं की प्रतिष्ठा, ब्रह्मविद्या, अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्व को कही’ – इस प्रकार (श्रुति) प्रधान रूप से ब्रह्मविद्या का उपक्रम कर परा-अपरा विभाग द्वारा अक्षर को प्राप्त कराने वाली परा विद्या को दर्शा कर उसका (परा विद्या का) ब्रह्मविद्यात्व दर्शाती है। इसे ‘ब्रह्मविद्या’ कहना गलत होगा अगर इसके द्वारा प्राप्तव्य अक्षर अब्रह्म हो। ब्रह्मविद्या के उपक्रम में अपरा ऋग्वेदादि-लक्षणा कर्मविद्या का उपन्यास (presentation) कर ब्रह्मविद्या की प्रशंसा के लिए निंदा वचन के कारण – ‘चूँकि यज्ञ के अठारह अंग (सोलह ऋत्विक, यजमान, यजमान की पत्नी), जिनपर अवर (inferior) कर्म आश्रित हैं, अदृढ़ होने के कारण नश्वर हैं, इसलिए जो मूर्ख “यही श्रेय है” ऐसा समझ आनंदित होते हैं, वे जरा-मृत्यु को पुन:- पुन: जाते हैं’ – इत्यादि (श्रुति) है। अपरा विद्या की निंदा कर (श्रुति) उससे विरक्त का परा विद्या में अधिकार दर्शाती है – ‘कर्म से प्राप्त लोकों की परीक्षा कर ब्राह्मण – ‘यहाँ ऐसा कुछ नहीं जो कर्म का फल नहीं, इसलिए कर्म की आवश्यकता क्या’ – इस विचार के द्वारा वैराग्य के आश्रित हो जाये। उसके विज्ञान के लिए समित्पाणि हो श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाये’।

तुमने यह जो कहा कि अचेतन पृथ्वी आदि का दृष्टांत होने के कारण, दार्ष्टांतिक भूतयोनि भी अचेतन होना चाहिए; तो यह कहना अयुक्त है। (ऐसा इसलिए) क्योंकि ऐसा कोई नियम नहीं कि दार्ष्टांतिक की अत्यंत साम्यता होनी चाहिए। और (तुम्हारे अनुसार भी तो) पृथ्वी आदि दृष्टांत के स्थूल होने पर भी दार्ष्टांतिक भूतयोनि की स्थूल अभिधारणा (postulation) नहीं होती है।

इसलिए, अदृश्यत्व आदि गुणवान् भूतयोनि, परमेश्वर ही है।

1.2.22

विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ

(और (ब्रह्म के) विशेषण तथा (ब्रह्म के शारीर तथा प्रधान से) भेद के कथन के कारण अन्य दोनों (शरीर तथा प्रधान) नहीं (हो सकते हैं))

इस एक और कारण से परमेश्वर ही भूतयोनि है, न कि शारीर अथवा प्रधान।

कैसे?

विशेषण और भेद के कथन के कारण। ‘दिव्य, अमूर्त, बाह्य-अभ्यंतर-सहित, अज, अप्राण, अमन, शुभ्र पुरुष’ – (इस श्रुति) में प्रकृत भूतयोनि शारीर से विलक्षण रूप में विशेषणों से विशिष्ट है। ये दिव्यत्व आदि विशेषण अविद्या-प्रत्युपस्थापित नाम-रूप परिच्छेद (limitation) अभिमानी तथा उनके (नाम-रूप के) धर्मों को स्वात्मा में कल्पना करने वाले शारीर के लिए सिद्ध नहीं हैं। इसलिए साक्षात् औपनिषद् पुरुष (ही) यहाँ कहा गया है।

तथा (श्रुति) प्रधान से भी भेद के द्वारा (ही) प्रकृत भूतयोनि का कथन करती है – ‘पर अक्षर से भी पर’। जो अक्षर अव्याकृत, नाम-रूप-बीज शक्ति-रूप, भूत-सूक्ष्म (latent state of all elements), ईश्वर-आश्रय, उसका (ईश्वर का) उपाधि-भूत है तथा जो अविकार है और सभी विकारों से पर (श्रेष्ठ) है; उस पर (अक्षर) से पर, इस भेद के द्वारा कथन कर (श्रुति) यहाँ परमात्मा को विवक्षित दर्शाती है। यहाँ प्रधान नामक किसी स्वतंत्र तत्त्व को मानकर उससे भेद का कथन किया गया है, ऐसा नहीं समझना चाहिए (क्योंकि अव्याकृत ईश्वर-आश्रय है, स्वतंत्र नहीं)।

तो फिर क्या (किया गया है)?

अगर परिकल्प्यमान प्रधान भी श्रुति से अविरोध के द्वारा अव्याकृत-शब्द वाच्य तथा भूत-सूक्ष्म रूप में परिकल्पित किया जाता है, तो (तुम ऐसा) कल्पित करो।

इसलिए, भेद के कथन के कारण परमेश्वर ही यहाँ भूतयोनि प्रतिपादित है।

अन्य किस कारण से परमेश्वर भूतयोनि है?

1.2.23

रूपोपन्यासाच्च

(और रूप के उपन्यास (presentation) के कारण)

और – ‘पर अक्षर से पर’ – इसके बाद – ‘इसी से प्राण उत्पन्न होता है’ – (इस श्रुति में) प्राण से लेकर पृथ्वी तक तत्त्वों की सृष्टि को कह कर, उस भूतयोनि का ही सर्वविकारात्मक रूप उपन्यस्यमान दीखता है – ‘अग्नि मूर्धा है, सूर्य-चन्द्र चक्षु हैं, दिशाएँ श्रोत्र हैं, विवृत्त (revealed) वेद वाक् हैं, वायु प्राण है, विश्व हृदय है, पृथ्वी पद है, यही सभी भूतों का अंतरात्मा है’। सभी विकारों का कारण होने के कारण वह (रूप) परमेश्वर के लिए ही उचित है न कि अल्प महिमा वाले शारीर के लिए। तथा सर्व-भूत-अंतरात्मात्व (प्रधान के लिए) असंभव होने के कारण इस रूप का उपन्यास प्रधान के लिए भी संभव नहीं है। इसलिए, परमेश्वर ही भूतयोनि है, उससे इतर दो (शारीर और प्रधान) नहीं, ऐसा समझा जाता है।

पू – यह रूप-उपन्यास भूतयोनि का है, यह कैसे समझा जाता है?

सि – प्रकरण के कारण तथा ‘एष’ शब्द से प्रकृत के अनुकर्षण (आवृत्ति-पूर्वक संबंध) के कारण भी (ऐसा समझा जाता है)। भूतयोनि का प्रकृत (बना) कर – ‘इससे प्राण उत्पन्न हुआ’ – ‘यही सभी भूतों का अन्तरात्मा है’ – (कहे गए) ये वचन भूतयोनि विषयक ही होते हैं। जैसे उपाध्याय को प्रकृत कर – ‘इससे पढ़ो, ये वेद-वेदांग पारंगत हैं’ – ये वचन उपाध्याय-विषयक होता है, उसी प्रकार (भूतयोनि के संदर्भ में भी)।

पू – अदृश्यत्व आदि गुणवान् भूतयोनि का विग्रहवत् (physical-body like) रूप कैसे संभव है?

सि – सर्वात्मत्व की विवक्षा के लिए यह (विग्रहवत् रूप) कहा जाता है न कि विग्रहवत्त्व की विवक्षा के लिए, इसलिए कोई दोष नहीं है – ‘मैं अन्न हूँ, मैं अन्नाद (eater of food) हूँ’ – इत्यादि की तरह।

अन्य (वृत्तिकार) फिर ऐसा मानते हैं कि यह भूतयोनि के रूप का उपन्यास नहीं है क्योंकि जायमानत्व (उत्पाद्यमानत्व) के द्वारा उपन्यास है। ‘इससे प्राण, मन, सभी इंद्रिय, आकाश, वायु, ज्योति, जल, विश्व को धारण करने वाली पृथ्वी उत्पन्न होते हैं’ – इस प्रकार पहले प्राण आदि से पृथ्वी पर्यंत तत्त्व समूह का जायमान के रूप में निर्देश है। और इसी प्रकार बाद में भी – ‘उसी से अग्नि (स्वर्ग) (उत्पन्न हुआ), जिसकी समिधा सूर्य है’ – (इस श्रुति) से आरंभ कर – ‘उसी से सभी औषधियाँ और रस (उत्पन्न हुये)’ – (इस श्रुति) से अन्त कर (श्रुति) जायमान रूप से ही निर्देश करती है। यहाँ ही इस अंतराल में अकस्मात् भूतयोनि के रूप का उपन्यास कैसे हो सकता है? सृष्टि (के कथन) की परिसमाप्ति के बाद सर्वात्मत्व का भी उपदेश  होता है – ‘पुरुष ही यह विश्व और कर्म है’ – (इस श्रुति) आदि के द्वारा। और श्रुति-स्मृति में (भी) तीनों लोक शरीर वाले प्रजापति के जन्म आदि का निर्देश उपलब्ध होता है – ‘पहले हिरण्यगर्भ समवर्तत (उत्पन्न हुआ) और वह उत्पन्न होकर भूतों का एकमात्र स्वामी (पति) हुआ। उसने पृथ्वी और इस स्वर्ग को धारण किया, उस एक देव की हम रुचि द्वारा सेवा करते हैं’ (ऋ॰वे॰ X.cxxi.1)। ‘समवर्तत’ इस पद का ‘अजायत (उत्पन्न हुआ)’ अर्थ है। और, ‘वह ही प्रथम शरीरी है, वह ही पुरुष कहा जाता है। वह भूतों का प्रथम कर्ता (ordainer) है। इस प्रकार प्रारम्भ में ब्रह्मा उत्पन्न हुये’। विकार-पुरुष (हिरण्यगर्भ) का भी सर्वभूत-अंतरात्मत्व संभव है क्योंकि अपने प्राण (रूप) से सभी भूतों के अंदर उसकी अवस्थिति है। अगर ऐसा मानें (कि हिरण्यगर्भ के रूप का उपन्यास है) तो इस पक्ष में ‘पुरुष ही यह विश्व, कर्म है’ इत्यादि (द्वारा) सभी रूपों का उपन्यास परमेश्वर की प्रतिपत्ति (understanding) का हेतु है, ऐसी (प्रस्तुत सूत्र) की व्याख्या करनी चाहिए।

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